राजनीतिज्ञों व मीडियाकर्मियों ने झारखण्ड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन से कहा – हमको मुफ्त का पास दे, पास दे, पास दे रे, मुफ्त का पास दे …
जिन मीडियाकर्मियों और राजनीतिज्ञों को आज रांची में हो रहे भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच के मुफ्त के पास उनकी इच्छानुसार भारी मात्रा में मिल चुके हैं। उन पर ये लोकोक्ति सही सिद्ध हो रही हैं – मिल गये तो अंगूर मीठे हैं, और जिनको पास नहीं मिले तो उनके लिए अंगूर खट्टे हैं, वाली लोकोक्ति शत प्रतिशत सिद्ध हो रही हैं। जिन मीडियाकर्मियों और राजनीतिज्ञों को मुफ्त के पास मिले हैं। वे उसका मंगलसूत्र बनाकर अपने गले में धारण किये हुए हैं, साथ ही उसका एक सेल्फी लेकर फेसबुक पर चिपका रहे हैं।
कुछ उन पास को लेकर फेसबुक पर ऐसा ढिंढोरा पीट रहे हैं। जैसे लगता हो कि उन्हें जन्नत नसीब हो गया हो और जिन्हें कुछ भी नहीं मिला, वे झारखण्ड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन पर आरोपों का बौछार लेकर सोशल साइट पर बैठ गये हैं, जहां उनके समर्थकों का साथ भी मिल रहा है। लेकिन इन सब से अलग कुछ लोग ऐसे भी हैं कि इन बेकार की पास पर ध्यान न देकर, अपनी धुन में मगन हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि ये पास मूर्खता के चिह्न के अलावे और कुछ भी नहीं हैं। न तो ये आनन्द दे सकती हैं और न ही किसी का पेट भर सकती है। हां, समय जरुर नष्ट करवा सकती है।
इसी बीच समाचार यह है कि रांची में हो रहे भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच को लेकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी अपना मुंह खोला है। उन्होंने कल यानी शनिवार को अपने सोशल साइट फेसबुक पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए लिखा है कि …
“कल रांची में भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच अंतर्राष्ट्रीय एकदिवसीय मैच खेला जाना है। झारखंड में इस तरह का आयोजन होना गर्व का विषय है। लेकिन इस मैच को देखने आने वाले दर्शकों के साथ अन्याय हुआ है। न तो उन्हें ऑनलाइन टिकट ठीक से उपलब्ध करवाए गए और न ही ऑफलाइन। ऑफलाइन टिकट काउंटर को तय समय से एक दिन पहले ही बंद कर दिया गया, जबकि ऑनलाइन टिकट महज कुछ ही सेकेंड में खत्म हो गए।

JSCA ने आखिर किस हिसाब से दर्शकों को टिकट उपलब्ध करवाने का काम किया है? ऐसी स्थिति में लोग निराश हैं। सुनने में यह भी आ रहा है कि टिकटों की कालाबाज़ारी हो रही है और उन्हें वास्तविक कीमत से तीन से चार गुना अधिक दाम पर बेचा जा रहा है। यह एक गंभीर मामला है।”
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के इस वक्तव्य पर उनके ही सोशल साइट पर उनके समर्थकों ने उनका खुलकर साथ दिया है। जमकर झारखण्ड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन पर अपना गुस्सा उतारा है। जबकि कुछ का कहना है कि सच्चाई यह है कि इस बार पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को भी पास के टोटे पड़ गये हैं। जिसका प्रभाव उनके सोशल साइट पर दिखाई पड़ रहा हैं। नहीं तो, पूर्व में ऐसा उनके द्वारा कभी नहीं लिखा गया।
जबकि क्रिकेट के टिकटों की कालाबाजारी कोई नई बात नहीं हैं। जहां आवश्यकता से अधिक लोग पहुंचेंगे और इन बेकार की चीजों में दिलचस्पी लेंगे तो फिर उन्हें टिकटों की कालाबाजारी का भी स्वाद लेना ही पड़ेगा। नहीं तो स्टेडियम से अच्छा तो आप क्रिकेट का आनन्द अपने घर पर टीवी सेट पर भी ले सकते हैं, वो भी स्टेडियम से बेहतर। तो ऐसे में कालाबाजारी में टिकट खरीदने के लिए किसने कहा?
अब रही बात मीडिया और राजनीतिज्ञों की, आप स्टेडियम में जाकर भी क्या करेंगे? रांची का कौन ऐसा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया है, जिसे आज के क्रिकेट मैच के प्रसारण का अधिकार मिला है? प्रिंट मीडिया में कौऩ लोग हैं, जो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों के पास जाकर या पहुंच कर उनका साक्षात्कार ले लें। अरे ये लोग तो सुना है कि अपने इंटरव्यू को भी व्यवसायिक रूप में इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि वे जानते है कि ये मीडियावाले उनके इंटरव्यू का व्यवसायिक इस्तेमाल करेंगे।
मतलब बात अर्थ की है और इस अर्थ युग में कोई किसी को नहीं पहचान रहा और क्रिकेट में प्रेम व सद्भावना कब का चला गया है, वो तेल लेने। अब तो क्रिकेटर भी दिखाने के लिए भारत से खेलते हैं और मन में इच्छा होती है कि इस क्रिकेट से इतना पैसा कमा लो कि बाद में भारत छोड़कर विदेश में रहने का प्रबंध कर लिया जाये। ऐसे में मीडिया हो या राजनीतिज्ञ या क्रिकेटर कौन सत्य के लिए काम कर रहा है, सभी अपने-अपने स्वार्थ में टिके हैं।
ये अलग बात है कि कभी-कभी देश का झंडा थोड़ा इनके कारण ऊंचा हो जाता हैं। नहीं तो, ऐसे लोगों से दूरियां बनाने में ही ज्यादा फायदा है। आज भी इन क्रिकेटरों से कही ज्यादा महान वे वैज्ञानिक हैं जो देश की सुरक्षा के लिए नये-नये खोज कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र में नई-नई खोज कर रहे हैं। अंतरिक्ष व तकनीकी क्षेत्र में भारत का मान बढ़ा रहे हैं। लेकिन हमलोगों ने आज तक किसी वैज्ञानिकों का सम्मान किया?
अरे क्रिकेट के लिए मुफ्त के पास की सोच रखनेवालों आप या आपके बच्चे किसी दस भारतीय वैज्ञानिकों के नाम भी बता पायेंगे। उत्तर होगा -नहीं। लेकिन क्रिकेटरों की बात होगी तो वे उनके खानदान तक के नाम बता देंगे। इसलिए क्रिकेट के पास के लिए रोना-धोना बंद करिये। मैच में ज्यादा दिलचस्पी है तो जाकर टीवी सेट से चिपक जाइये। वहां आपको रिप्ले का भी मजा मिलेगा। स्टेडियम में क्या कर लीजियेगा। वहां तो आपको एक सिंघाड़ा और पानी पर भी पानी फिर जायेगा। जानते हैं न, वहां इन सभी की कीमत क्या है?
एक पाठक ने तो अभी-अभी विद्रोही24 को यह लिखकर भेजा है कि हमने अफसरों को काहे छोड़ दिया। झारखण्ड के बड़े-बड़े पदाधिकारियों ने भी भोकाल मचाकर रखा है। उन्हें भी अपने-अपने बीवी-बच्चों, यहां तक की नौकर-चाकर के लिए भी मुफ्त का पास चाहिए, वो भी मुफ्त भोजन के साथवाला। मतलब ये स्थिति हो गई है। एक पास के लिए लोगों ने अपनी इज्जत तक दांव पर लगा दिया।

आपका विश्लेषण बहुत ही सराहनीय एवं वास्तविकता से ओत-प्रोत है।मेरा भी यही मानना है कि स्टेडियम में भूखे-प्यासे रहकर परेशान होने से करोड़ गुणा बेहतर है घर पर टी०वी० में देखना। स्टेडियम में भी कई ऐसे अवसर आते है, जहाँ जबतक टी०वी० पर रिप्ले न देख लें, समझ में नहीं आयेगा।