धर्म

तप बुरे स्वादों व अशुद्धियों को काटकर हमें ब्रह्म के अनन्त लोक की ओर ले जाने को प्रेरित करता है, तप कैसे की जाये, यह बालक ध्रुव से सीखें : ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द

रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम के श्रवणालय में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने कहा कि गति दिव्य चेतना को खत्म कर देती है। जो गहरा ध्यान करते हैं, उन्हें चोट पहुंचाती है। ध्यान के समय गति को विराम दें। ध्यान के समय मूवमेंट कदापि न करें।  उन्होंने कहा कि पतंजलि के योगसूत्र पर आधारित योग की ही शिक्षा योगदा सत्संग में दी जाती है। इसके चार अध्याय है – समाधि, साधना, विभूतियां और कैवल्य।

उन्होंने बताया कि समाधि में योग के अर्थ, उसके उद्देश्य और चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित करने के उपाय बताये गये हैं। साधना में योग के अष्टांग नियमों की चर्चा की गई है। विभूति में धारणा, ध्यान, समाधि और योग साधना के प्राप्त होनेवाले सिद्धियों को बताया गया है। जबकि कैवल्य में मोक्ष, आत्मा के स्वरूप और उसकी स्वतंत्रता का वर्णन किया गया है।

ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने कहा कि योग के अष्टांग मार्गों में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की चर्चा की गई है। इस अष्टांग मार्ग का अनुसरण करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है। उन्होंने अष्टांग मार्ग के निहित नियम की चर्चा करते हुए कहा कि नियम पांच प्रकार के होते हैं – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान अर्थात् ईश्वर के प्रति समर्पण।

ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने योगदा भक्तों के बीच योग दर्शन के पांच नियमों में से तप की विशेषता की चर्चा की, साथ ही बताया कि तप किसी भी व्यक्ति-विशेष के लिए कितना महत्वपूर्ण है? उन्होंने तप की महत्ता की चर्चा के क्रम में बालक ध्रुव की कथा विस्तार से सुनाई, कि कैसे बालक ध्रुव ने अपने तप से भगवान नारायण को प्राप्त कर लिया।

उन्होंने बताया कि राजा उत्तानपाद की दो पत्नियां थी। एक सुरुचि और दूसरी सुनीति। सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम और सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था। एक बार जब ध्रुव के मन में अपने पिता के गोद में बैठने की इच्छा जागी। तब वो राजा उत्तानपाद के गोद में जा बैठा। जिस पर उसकी सौतेली मां सुरुचि ने बालक ध्रुव को उत्तानपाद के गोद से यह कहकर हटा दिया कि वो अपने पिता के गोद में बैठने योग्य नहीं हैं।

बालक ध्रुव रोता हुआ अपनी मां सुनीति के पास जा पहुंचा और सारी बातें बताई। मां सुनीति ने बालक ध्रुव को समझाया और कहा कि उसे अपने पिता से भी बड़ी गोद जो नारायण का गोद है। वहां बैठने की इच्छा होनी चाहिए। मां सुनीति ने बालक ध्रुव को वन जाकर भगवान नारायण के गोद में बैठने के लिए तप करने को कहा। यहीं नहीं, सुनीति ने बालक ध्रुव को समझाया और कहा कि भीख ही मांगनी है तो नारायण अर्थात् भगवान से मांगों।

सुनीति ने बालक ध्रुव से यह भी कहा कि दुख सावधान करने आता है, न कि कष्ट देने आता है। दुख हमारा मार्गदर्शन करता है। आज से तू मेरा नहीं नारायण का पुत्र है, मैं तुम्हें आज ही उन्हें अर्थात् नारायण को सौंपती हूं। सुनीति ने बालक ध्रुव को वनगमन के समय यह भी कहा कि जहां भी उसे संत मिलें, वो उन्हें साष्टांग प्रणाम करेगा, क्योंकि जो संत होते हैं। वो सभी का हित करते हैं। वो पिता तुल्य होते हैं।

ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने बालक ध्रुव की कथा को विस्तार में ले जाते हुए कहा कि जैसे ही बालक ध्रुव वन को निकले। कहा जाता है कि जैसे ही आप स्वयं को भगवान को सौंप देते हैं। भगवान को आपकी चिन्ता होने लगती है। बालक ध्रुव के पास नारद जो स्वयं नारायणमय हैं। पहुंच गये। बालक ध्रुव की नारायण को प्राप्त करने की अभूतपूर्व इच्छा देखी, वे द्रवित हो गये। उन्होंने बालक ध्रुव को नारायण को प्राप्त करने के लिए दिव्य मंत्र बताये और उन्हें मानस पूजा करने को उद्यत किया।

ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने बालक ध्रुव की कथा को थोड़ा विराम देते हुए परमहंस योगानन्द जी के बाल चरित्र की यहां थोड़ा चर्चा कर दी कि कैसे परमहंस योगानन्द जी बाल्यावस्था में जब वे गोरखपुर में थे। गोरखपुर में उनके घर में पारिवारिक उत्सव था। लेकिन वे पारिवारिक उत्सव से बेखबर गोरखनाथ मंदिर में ध्यान करने निकल गये थे। जब परिवार के लोगों ने घर में बालक मुकुंद (परमहंस योगानन्द जी के बचपन का नाम) को नहीं देखा तो घबरा गये। बालक मुकुंद की खोज होने लगी, पर वे मिले कहा, गोरखनाथ मंदिर में।

ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने ऐसे ही परमहंस योगानन्दजी से जुड़ी कई कथाएं सुनाई। फिर बालक ध्रुव के तप की चर्चा करते हुए कहा यदि पूर्ण हृदय से ईश्वर की कोई प्रार्थना करें तो इसी जन्म में ईश्वर मिलना संभव है। एकाग्रता से ध्यान करिये। ईश्वर जरुर मिलेंगे। परमहंस योगानन्दजी तो जब भगवान कृष्ण को देखते थे तो वे कहा करते थे कि पीड़ित मानव भगवान कृष्ण के दिव्य बांसुरी के धुन को कभी नहीं सुन सकती। उसके लिए उन्हें अपना हृदय पवित्र करना ही होगा, अपने हृदय में ईश्वर प्राप्ति की ललक जगानी ही होगी।

ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने कहा कि बालक ध्रुव की तपस्या से प्रभावित होकर नारायण उन्हें मिलते है। वे अपने शंख से बालक ध्रुव के गालों को स्पर्श करते हैं। बालक ध्रुव नारायण को देखकर आनन्दित हैं। वे उनकी वंदना कर रहे हैं। भगवान नारायण बालक ध्रुव को 36 हजार वर्षों तक यहां राज करने और उसके बाद वैंकुण्ठ चलने का उन्हें वरदान देते हैं। लेकिन ध्रुव तो ये सब पाना ही नहीं चाहते। फिर भी भगवान नारायण का आदेश हैं। वे उसका पालन करते हैं। बालक ध्रुव की तपस्या से सारा परिवार उनका नारायणमय हो उठा है। नारायण की कृपा सभी पर पड़ी है। यह है तप का फल।

ब्रह्मचारी सच्चिदानन्द ने कहा कि तप बुरे स्वादों व अशुद्धियों को काटकर हमें अनन्त की ओर ले जाता है। हमें आत्मानुशासन सिखाता है। ब्रह्म के अनन्त लोक की ध्रुव जैसा तप करने से ही प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा से किया गया तप सात्विक, बाह्याडम्बर के लिए किया गया तप राजसी और मूर्खता या किसी को हानि पहुंचाने के लिए किया गया तप तामसी कहलाता है।

उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय के कुछ श्लोकों को उद्धृत करते हुए कहा कि तप का कभी भी परित्याग न करें, क्योंकि ये बुद्धिमान व्यक्ति को पवित्र करता है। बिना विचलित हुए सहन करना भी एक प्रकार का तप है। हमेशा सात्विक भोजन करें। भगवान का नाम हमेशा जपते रहें, चाहे आप कोई भी काम ही क्यों न कर रहे हों। उन्होंने कहा कि हमारी माताएं जब भी भोजन बनाएं तो उस वक्त नाम जप करते रहे, क्योंकि इससे भोजन पवित्र हो जाता है। अगर कोई समस्या आ जाये, तो बिना उद्विग्न हुए उस समस्या का हल निकालें। तप द्वारा अपने इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीखें और समभाव में रहें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *