झामुमो का चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप, 2026 के बंगाल चुनाव में निर्वाचन आयोग ने भाजपा की ओर से बंगाल के लोगों का मताधिकार छीनने का लिया ठेका
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के केन्द्रीय महासचिव व प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने आज रांची में प्रेस कांफ्रेस कर कहा कि हमारा देश लोकतंत्र के बुनियाद पर खड़ा है और उसका अनूठा उत्साहवर्द्धक दिन मतदान का दिन होता है। जिसे संपन्न कराने का दायित्व भारत निर्वाचन आयोग को है। आज केरलम, पुडुचेरी और असम में मतदान संपन्न हुए हैं। 23 और 29 अप्रैल को बंगाल में मतदान होने हैं।
सुप्रियो ने कहा कि गत 25 जनवरी, जिस दिन राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। भारत निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ-साथ सिटीजन फोरम, सिटीजन आर्गेनाइजेशन आदि के साथ-साथ मिलकर एक सेमिनार आयोजित की थी। जिसका टैग लाइन है – एक भी वोटर छूटे नहीं।
सुप्रियो ने कहा कि जो आजकल बंगाल में हो रहा है। वो हमलोगों को 80-90 के दौर में ले जा रहा है। उस दौर में जो राजनीतिक दल में जो बाहुबली किस्म के लोग होते थे या जो क्लब चलाते थे या जिनका थोड़ा बहुत मुहल्ले में प्रभाव रहता था, राजनीतिक दल के लोग उनसे संपर्क करते थे और उन्हें जिम्मा सौंपते थे कि वे अपने इलाके के बूथ में उनके लिए वोट दिलवाने का काम करें या जो लोग उन्हें वोट नहीं दे रहे हैं, उन्हें बूथ तक जाने से रोंके। जिसे बूथ कैप्चरिंग का नाम दिया गया, रिगिंग का नाम दिया गया।
सुप्रियो ने कहा ठीक उसी प्रकार आज 2026 में बंगाल के चुनाव में यह ठेका निर्वाचन आयोग ने उठा लिया है और यह ठेका उसे भाजपा के द्वारा मिला है कि बंगाल के लोगों का मताधिकार छीन लें। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 इस बात की गारंटी देता है कि जो भारत का नागरिक है, पागल नहीं है, बैंक करप्ट नहीं है, सजायाफ्ता कैदी नहीं है, वो वोट दे सकता है, बशर्तें उसकी उम्र 18 से कम नहीं हो, जो उपर के हैं, वो मतदान कर सकते हैं। लेकिन बंगाल में क्या हुआ एसआईआर के नाम पर 53 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिये गये। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक रिवीजन होगा। 32 लाख लोगों के नाम लॉजिकल रूप से निष्पादित नहीं किये गये। 27 लाख लोगों को तो सीधे कह दिया गया कि आप वोट नहीं दे सकते, अब आपको ट्रिब्यूनल में जाना पड़ेगा।
सुप्रियो ने कहा कि ये ट्रिब्यूनल साउथ 24 परगना के जोका में जहां कैंसर हास्पिटल में हैं। वहां बनाया गया। जहां 19 ट्रिब्यूनल है। वहां जाकर इन 27 लाख लोगों को अपना नागरिकता सिद्ध करनी पड़ेगी। यानी जो कल तक 27 लाख लोग स्वतंत्र थे, अब वे स्वतंत्र नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जो नामांकन कर सकते थे। उन्हें नामांकन से रोका गया। अंत में, वे सुप्रीम कोर्ट गये, जहां सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिली, तब जाकर वे नामांकन कर पाये। यह पहला मामला चुनाव आयोग द्वारा प्रारंभ किया गया, भाजपा के समझौते के तहत, जहां 27 लाख वोट काट दिये गये। इन्हें केवल मताधिकार से ही वंचित नहीं किया गया, बल्कि उनकी नागरिकता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया। जो बहुत ही गंभीर बात है।
सुप्रियो ने कहा कि ये सारी घटनाएं अशुभ संकेत की ओर इशारा कर रहे हैं। ये अलार्मिंग सिचुएशन है। क्या ये देश में लोकतंत्र बच पायेगा? संविधान की रक्षा हो पायेगी, ये बहुत बड़ा प्रश्न अभी हम सभी के सामने हैं। चुनाव आयोग के एक्स हैंडल पर जो पोस्ट आ रहे हैं, वो सरकारी भाषा नहीं हो सकती, क्योंकि सरकारी भाषा और राजनीतिक दल की भाषा को हम खुब समझते हैं। मतलब साफ है कि दीनदयाल पथ से चलकर अशोका रोड तक ये सभी चीजें आ रही है और यहां से जारी हो जा रही है। अब हम सोचने पर मजबूर हैं कि देश की जनता का अधिकार कैसे बचेगा?
