ईश्वर को पाना आपका जन्मसिद्ध अधिकार, उन्हें अपना प्रेम सौंपकर ही आप आनन्द में रह सकते हैं, ऐसे नहीं: ब्रह्मचारी सौम्यानन्द
रांची के योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी सौम्यानन्द ने कहा कि आप क्या चाहते हैं, ये आपके ऊपर निर्भर करता है, आप ईश्वर को चाहते हैं या नहीं, ये आपके ऊपर है? जब आप क्रिया योग, भक्ति और सच्चरित्रता से भरे जीवन की शुरूआत करते हैं। गुरु जी के बताए तकनीक को अपनाते हुए, निरन्तर इसका अभ्यास करते हैं। तब आपका जीवन और आनन्दमय हो उठता है। दरअसल ऐसा कहकर ब्रह्मचारी सौम्यानन्द योगदा भक्तों को दिव्य चेतना में जीने की कला का पाठ पढ़ा रहे थे।
उन्होंने कहा कि स्वामी भक्तानन्द तो बराबर कहा करते थे कि प्रार्थना, भगवान का भजन, परमहंस योगानन्द द्वारा बताई गई प्रविधियों का निरन्तर अभ्यास, स्थिरता और भक्ति ये पांच चीजें ऐसी है कि व्यक्ति को ईश्वर के निकट सहजता पूर्वक लाकर खड़ा कर देती है। उन्होंने कहा कि परमहंस योगानन्द जी कहा करते थे कि ईश्वर से मित्रता करना सीखिये। साधना को कभी हलके में मत लीजिये। बल्कि इसे हृदय से स्वीकार करते हुए अपने गुरु के मार्गदर्शन में जीवन को सफल बनाने की कोशिश करें। जीवन को सफल बनाने का मतलब सिर्फ और सिर्फ ईश्वर प्राप्ति है।
ब्रह्मचारी सौम्यानन्द ने कहा कि हं-सः, ओम् प्रविधि का अभ्यास कभी नहीं छोड़े। जीवन में कष्ट आये, तो रोइये मत। रोने-धोने से कुछ भी नहीं होता, लेकिन जैसे ही आप रचनात्मक होकर ईश्वर को पाने का प्रयास करते हैं, तो आप आनन्द में आकर वो हर चीज प्राप्त कर लेते हैं, जो चीजें प्राप्त करना आपके लिए आसान नहीं होती।
उन्होंने इसी बीच एक बहुत सुंदर बात कही। उन्होंने कहा कि ईश्वर आप से कभी नहीं कहेंगे कि आप सब कुछ छोड़कर मुझसे प्रेम करो। ईश्वर तो सिर्फ ये चाहते है कि बिना किसी प्रोत्साहन के आप उन्हें अपना प्रेम दें। उन्होंने यह भी कहा कि इस संसार की रचना का एकमात्र रहस्य भी यही है। सच्चाई यह भी है कि बिना ईश्वर को अपना प्रेम सौंपें, आप खुश भी नहीं रह सकते।
ब्रह्मचारी सौम्यानन्द ने कहा कि दया माता कहती थी कि बिना दिव्य चेतना के जीने की कला सीखें, कोई भी संत ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आप ईश्वर को प्राप्त करने में कितने समय दिये हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होता। महत्वपूर्ण वो पल होता है, कि आपने उन पलों को कैसे जिया। हर कोई संन्यासी या हर कोई गृहस्थ नहीं हो सकता। सभी की अपनी-अपनी जीवन यात्राएं हैं। आप स्वयं को दिव्य चेतना में रखकर ईश्वर को याद करेंगे तो ये जीवन यात्राएं सफल होती दिखेंगी।
उन्होंने कहा कि हमें अपने जीवन के प्रत्येक पलों में अपने गुरु व ईश्वर को अपने साथ संजो कर रखना चाहिए। हमें ईश्वर के प्रेम, आनन्द व करुणा में रहना सीखना चाहिए। जब आपके जीवन में ईश्वर का प्रवेश हो जाता है, तो दुख हो या सुख, आप पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ध्यान में जो आनन्द या शांति मिलती हैं, वो अन्यत्र नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि वे अंतरंगों में अंतरंग और प्रियतमों से भी प्रियतम हैं। इसलिए उनके लिए ही जीना सीखें। आपका ईश्वर के प्रति प्रेम के लिए गहरी तड़प होनी चाहिए। ठीक उसी तरह, जैसे एक लालची व्यक्ति धन के लिए तड़पता रहता है। हमेशा याद रखिये, ईश्वर को पाना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्हें पाने को हम कितने जागरुक है, ये ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सबसे बड़ी बाधा चंचल मन, संसारिकता में रहने की आदत, आपके ध्यान की प्रवृत्ति का मैकेनिकल हो जाना तथा शुष्कता है। फिर भी आप अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से इन सारी बाधाओं को पारकर ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं।
