अपनी बात

धनबाद में हो रहे नगर निकाय चुनाव में भाजपा के शीर्षस्थ केन्द्रीय व प्रदेशस्तरीय नेताओं का तेल निकालने में लगे धनबाद के ही कट्टर भाजपाई

धनबाद में हो रहे नगर निकाय चुनाव ने अगर सर्वाधिक किसी राष्ट्रीय दल को पीड़ा पहुंचाई हैं, तो वो हैं भाजपा। राजनीतिक पंडितों ने तो भाजपा की इस पीड़ा को देखकर अब खुलकर कहना शुरु कर दिया है कि इस बार के नगर निकाय चुनाव में मेयर पद के लिए खड़े भाजपा के कई कट्टर भाजपाइयों ने भाजपा के शीर्षस्थ केन्द्रीय व प्रदेशस्तरीय नेताओं का तेल निकालना शुरु कर दिया है। तेल निकालना मतलब समझते हैं न। कि इसे भी समझाना पड़ेगा। अगर नहीं समझते हैं तो किसी हिन्दी के अध्यापक या प्राध्यापक या किसी बुढ़-पुरनिया के पास पहुंच जाइये, वो बढ़िया से आपको समझा देगा कि तेल निकालना क्या होता है?

कुछ राजनीतिक पंडितों ने तो यह भी कहना शुरु कर दिया है भाजपा की हालत वर्तमान में “भई गति सांप छछूंदर केरी” वाली हो गई हैं। जो भाजपा सोचती थी कि उसके यहां अनुशासन है, वो जो कहेगी, उसके कार्यकर्ता मानेंगे, नेता मानेंगे। उस भाजपा की सारी हेकड़ी अब निकल चुकी है और भाजपा के इस हेकड़ी को किसी ने निकाला है तो वो कोई दूसरा दल नहीं हैं और न ही कोई दूसरे दल के कार्यकर्ता हैं। बल्कि ये शुद्ध भाजपाई ही है, जो कल तक खुद को भाजपा का कट्टर समर्थक, भाजपा का सिपाही कहने से गर्व महसूस करते नहीं थकते थे, आज हो रहे नगर निकाय चुनाव में इन्होंने लगता है कि कसम खा ली है कि वे अपने केन्द्र व प्रदेश के बड़े नेताओं को सबक सिखाकर ही मानेंगे।

हालांकि भाजपा के इन कट्टर समर्थकों/कार्यकर्ताओं व पूर्व विधायकों को सबक सिखाने के लिए प्रदेश के नेताओं ने इनमें से कुछ को (सभी को नहीं), चेहरा देखकर, प्रेम पत्र यानी कारण बताओ नोटिस जारी किया है। लेकिन प्रदेश के नेताओं द्वारा जारी इस प्रेम पत्र या कारण बताओ नोटिस का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। कुछ तो इस प्रेम पत्र अर्थात् कारण बताओ नोटिस पर यह भी कहने से नहीं चूक रहे कि कही ऐसा न हो कि ये प्रेम पत्र भेजनेवाले खुद ही पार्टी में अकेले न रह जाये, क्योंकि भाजपा कार्यकर्ताओं में अपने प्रदेश व केन्द्र के नेताओं के खिलाफ इतना गहरा आक्रोश कभी नहीं देखा गया।

धनबाद नगर निगम के मेयर पद के लिए वर्तमान में 29 उम्मीदवार मैदान में हैं। जिनमें आठ तो भाजपाई ही हैं। जो किसी न किसी रूप में कभी न कभी भाजपा में रहे हैं या वर्तमान में जिनकी भाजपा में सक्रिय भूमिका रही और वर्तमान में भाजपा के प्रदेश व केन्द्र के नेताओं की हठधर्मिता से आक्रोशित होकर भाजपा को इस बार सबक सिखाने में तन-मन-धन से जुट चुके हैं। जिसके कारण रांची से लेकर दिल्ली भाया धनबाद तक के भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के हाथ-पांव फूल गये हैं।

कई ने तो विद्रोही24 को खुलकर कहा कि ये सारे के सारे प्रदेश के नेता उन्हें बंधुआ मजदूर समझने की भूल कर बैठे हैं, जिसके कारण इस बार उन्होंने सबक सिखाने की ठान ली है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस बार के चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहे, फिर भी जो प्रमुख राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दल हैं, उन्होंने इस नगर निकाय चुनाव में ताल ठोक रखी हैं। ऐसे में आनेवाले समय में ये कहने को तो कुछ भी कहेंगे, जीतेंगे तो कहेंगे कि उनकी पार्टी को जीत मिली और हारेगे तो कहेंगे कि ये चुनाव तो दलीय आधार पर हुआ नहीं था। लेकिन वे यह नहीं भूल रहे कि जनता जान चुकी है कि भाजपा ने धनबाद में किसे समर्थन दे रखा है और किसे समर्थन नहीं मिलने के कारण उन्होंने उन नेताओं को प्रेम पत्र जारी किया हैं, जो इस नगर निकाय चुनाव में ताल ठोक कर भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को चुनौती दे रहे हैं।

सबसे पहला नाम भृगु नाथ भगत का है। ये भाजपा के विभिन्न संगठनों के प्रमुख पदों पर वर्षों रहे हैं। कभी केन्द्रीय मंत्री रही और धनबाद से भाजपा की सांसद रही रीता वर्मा के ये सांसद प्रतिनिधि भी रहे हैं। आज मेयर का चुनाव लड़ रहे हैं और भाजपा द्वारा दिये गये उम्मीदवार के समक्ष सीना तान कर खड़े हैं।

दूसरा नाम मुकेश पांडेय का है। ये दो बार भाजपा युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जिला प्रमुख होने के साथ-साथ, तीन दशक तक इन्होंने भाजपा की सेवा दी हैं। मेयर चुनाव लड़ रहे हैं। अमित अग्रवाल को कौन नहीं जानता, संघ से जुड़े रहे हैं, जो भाजपा स्वयं को राजनीतिक दल कहती है, वो संघ की है एक राजनीतिक इकाई हैं, ये किसी को भूलना नहीं चाहिए। अमित अग्रवाल मेयर पद पर खड़ा होकर भाजपा को चुनौती दे रहे हैं।

पूर्व मेयर रह चुके चंद्रशेखर अग्रवाल, जो कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभास्थल बनवाने से लेकर, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के किचेन तक की पॉलिटिक्स में सक्रिय रहे, बेचारा अंत-अंत तक भाजपा में रहा, ये सोचकर कि वो पूर्व में धनबाद का मेयर रहा है, उसकी अच्छी पकड़ हैं, भाजपा उसे ही अपना समर्थन देगी, भाजपा ने गच्चा दे दिया। बेचारा क्या करता, अंत में झामुमो का दामन पकड़ लिया। झामुमो का दामन पकड़ने से फिलहाल कमोबेश ठीक स्थिति में हैं। भाजपा के लिए ये परेशानी का सबब बन चुके हैं। शांतनु चंद्रा उर्फ बबलू पासवान – भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के उपाध्यक्ष रहे, जब तक देखा कि उन्हें कोई भाव नहीं दे रहा, उन्होंने भी भाजपा से तौबा कर ली और मेयर चुनाव में कूद गये।

संजीव सिंह, धनबाद के सिंह मेंशन से जुड़ा, जाना माना नाम, झरिया से भाजपा के पूर्व विधायक रहे हैं। जेल में रहने के कारण भाजपा ने झरिया से इनकी पत्नी रागिनी सिंह को चुनाव लड़वाया। रागिनी सिंह वर्तमान में झरिया से भाजपा की विधायक है। संजीव सिंह ने एक नहीं सुनी और मेयर का चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा के लिए ये इतने बड़े चुनौती बनकर उभरे हैं कि प्रदेश नेताओं की हालत पतली हो गई हैं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि संजीव सिंह से कैसे लड़े, उन्हें कैसे समझाएँ।

और अब बात रवि चौधरी की – कभी भाजपा नेता थे, फिलहाल कांग्रेस में हैं। लोग बताते है कि इनका बेटा भाजपा में हैं। लेकिन कट्टर भाजपा नेता सत्येन्द्र सिंह इनका पूरा ऑफिस संभाल रहे हैं। पूर्व में सत्येन्द्र सिंह भाजपा जिलाध्यक्ष, प्रदेश कार्यसमिति में भी रहे हैं और धनबाद के वर्तमान भाजपा सांसद ढुलू महतो के लोकसभा चुनाव में सर्वेसर्वा थे।

ये सारे लोग भाजपा के पीठ में रोज इतनी कील ठोक रहे हैं कि भाजपा कराह रही हैं। लेकिन भाजपा को इस दर्द से छुटकारा नहीं मिल रहा। छुटकारा मिलेगा भी कैसे? भाजपा ने संजीव कुमार अग्रवाल को जो समर्थन दे दिया है। जिनका चुनाव चिह्न हरी मिर्च है। लोग तो यह भी चुस्की लेने से नहीं चूक रहे, कि जिसका चुनाव चिह्न ही हरी मिर्च है। जो जुबान पर आते ही, जुबान को तीखा कर देता है। चुनाव जीतने के बाद यह व्यक्ति और कितनी कड़वी घूंट पिलायेगा। कुल मिलाकर देखा जाये। तो भाजपा की धनबाद की मेयर सीट उसके हाथ से निकलती दिख रही, क्योंकि उसके जो तारणहार थे, वे ही छ्टिककर कब के अलग हो चुके हैं।

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