यह संसार ईश्वर ने दुख सहने के लिए नहीं, मनोरंजन के लिए बनाया है, जो व्यक्ति लोकहित को ध्यान में रख छोटा या बड़ा काम करते हैं, यही कर्म निष्काम कर्म कहलाता है, जो ईश्वर को प्रिय हैः स्वामी ईश्वरानन्द
आप चाहे अथवा न चाहे अगर आपने जीवन धारण किया हैं तो जीवन के इस संग्राम में युद्ध तो होना ही है, चाहे परिणाम कुछ भी हो। जीवन में आलस्य व अकर्मण्यता किसी भी प्रकार से ठीक नहीं। ईश्वर ने इस संसार को दुख सहने के लिए नहीं बनाया, बल्कि मनोरंजन के लिए बनाया है। जो लोग लोकहित, सेवा भाव को लेकर निष्काम भाव से कोई भी काम चाहे वो छोटा हो या बड़ा करते रहते हैं, दरअसल उनका ही कर्म निष्काम कर्म के रूप में जाना जाता है, ऐसे लोग ईश्वर को बहुत ही प्रिय है। ये बातें आज रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कही।
चूकि कल यानी सोमवार को गीता जयंती हैं। मोक्षदा एकादशी है। इसलिए उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेखित निष्काम कर्म अर्थात् आत्मा के मुक्ति का मार्ग विषय पर अपनी बातें केन्द्रित रखी। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति ध्यान करते हुए अपनी चेतना को ईश्वर से जोड़ते हैं, दरअसल वैसे ही लोगों पर ईश्वरीय कृपा बरसती हैं, वही लोग निष्काम कर्म से स्वयं को जोड़ पाते हैं। उन्होंने कहा कि सभी कार्यों में सर्वश्रेष्ठ कार्य खुद को ईश्वर से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि गीता का प्रत्येक अध्याय का अपना-अपना नाम है। जैसे पहले अध्याय का नाम अर्जुन विषाद योग हैं तो दूसरे अध्याय का नाम सांख्य योग है।
उन्होंने कहा कि गीता में सांख्य का मतलब सांख्य दर्शन नहीं है। बल्कि यहां इसका मतलब है – संपूर्ण ज्ञान या सम्यक ज्ञान या दिव्य ज्ञान। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि तुम नाहक दुखी हो रहे हो। आत्मा न मरती है, न जन्म लेती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय में आत्मा के स्वरूप का दर्शन कराया है। वे कहते हैं कि अगर किसी को आत्मा के बारे में अनुभव करना है तो उसे योग का अभ्यास करना होगा। उसे योगी होना होगा। दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण योग का संकेत देते हैं। वे कहते हैं कि योग विज्ञान के थोड़े अभ्यास से मनुष्य संसार के महान भय से मुक्त हो जाता हैं।
स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि संसार में जैसे ही व्यक्ति का जन्म होता है। वो जन्म लेते ही, जीवन-मरण के बीच में नाना प्रकार की चिन्ताओं से मनुष्य गुजरने लगता है, इन चिन्ताओं से मुक्त होने का नाम है – निष्काम कर्म। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति को उचित कर्म कैसे करने चाहिए? कर्म करने की मनोवृत्ति कैसी होनी चाहिए? परमहंस योगानन्द जी ने इस बारे में बहुत सही ढंग से बताया। परमहंस योगानन्द जी ने कहा है कि सामाजिक, नैतिक व आध्यात्मिकता के आधार पर कर्म को करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक युद्ध महाभारत युद्ध के समय हुआ और दूसरा युद्ध प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में लड़ रहा हैं, जो महाभारत युद्ध की तरह ही हैं। इस पर विजय कैसे प्राप्त करें? श्रीमद्भगवद्गीता उसी का सार है। हमारे अंदर दो प्रकार की प्रवृत्तियां होती हैं। एक सकारात्मक और दूसरी नकारात्मक। सकारात्मक प्रवृत्तियां पांडवों की प्रतीक हैं, जबकि नकारात्मक प्रवृत्तियां कौरवों की प्रतीक हैं। इस द्वंद्व को भला कौन नकार सकता है?
स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि अर्जुन यहां आत्मसाक्षात्कार के प्रतीक है। श्रीकृष्ण परमात्मा है, जो हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। जिसने आत्मसाक्षात्कार कर लिया, ईश्वर प्राप्त कर लिया। वो विजयी है। जो इसमें सहायता करते हैं वो पांडव हैं और जो अवरोध पैदा कर रहे हैं। वे कौरव हैं। उन्होंने कहा कि निष्काम कर्म यानी बिना किसी कामना के कर्म करना, दरअसल यही भारतीय संस्कृति है। हमलोग कोई पूजा पाठ करते हैं। तो उसमें आरती के दौरान आरती गीत गाते हैं और क्या कहते हैं? तन-मन-धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा, तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा, ओम् जय जगदीश हरे…। अर्थात् मेरा कुछ भी नहीं, आपने जो दिया, वो ही मैंने आपको अर्पण किया। मैं तो सिर्फ निमित्त मात्र हूं। मेरे अंदर जो भी कर्म करने की शक्ति और क्षमता जो आपने दी हैं। उसमें हम कहीं नहीं हैं। दरअसल यही निष्काम कर्म है। हमें कोई भी कर्म करना है, तो यह मानकर करना है कि यह ईश्वरीय कर्म है, इसमें हम कही कुछ नहीं। जो भी व्यक्ति इस प्रकार से कर्म करते हैं, वो कर्म करने के बावजूद निर्लिप्त होते हुए स्वयं को स्वयं से मुक्त कर देते हैं।
उन्होंने कहा कि जब हम निष्काम भाव से काम करते हैं तो इह लोक और परलोक दोनों में हम सफल होते हैं। हमें आशीर्वाद प्राप्त होता हैं। इसलिए हमें निष्काम भाव से कर्म करने चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्म करते वक्त कभी फल की चिन्ता नहीं करें, क्योंकि जो आप चाहेंगे, वही फल मिलेगा, इसकी संभावना शत प्रतिशत सही होगी। ऐसा नहीं हैं। क्योंकि फल आपके पूर्व जन्म और इस जन्म में हो रहे कर्मों के आधार पर प्राप्त होगा। इसलिए कर्म करते रहिये। अकर्मण्यता के शिकार मत बनिये। मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य पद-प्रतिष्ठा या धन कमाना नहीं हैं। बल्कि ईश्वर को प्राप्त करना व मोक्ष को प्राप्त करना है। जब हम ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं और उसके बाद जो आनन्द प्राप्त होता है, उस आनन्द का कोई विकल्प नहीं होता।
उन्होंने कहा कि हम जो भी करते हैं, वो आनन्द पाने के लिए ही करते हैं। यही ईश्वर का प्रतिरूप है, यही मोक्ष है और यहां तक पहुंचने का नाम है – निष्काम कर्म। जब तक हमारी चेतना में सचित बीज बचे हुए हैं। तब तक उन्हें भष्मीभूत करने के लिए हमें जन्म लेना पड़ेगा। जब तक हमारे अंदर इच्छाओं का कोई भी बीज बचा रहेगा। उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमें जन्म लेना पड़ेगा। लेकिन जैसे ही निष्काम भाव से हम कर्म करना शुरु करेंगे। ये सभी चीजें स्वतः समाप्त हो जायेगी।
उन्होंने एक दृष्टांत दिया कि जैसे कोई पंछी किसी डाल पर बैठकर गाता रहता है और उसके उस गान से किसी को प्रभावित करने की इच्छा नहीं रहती, बस वो गाता रहता है। ठीक उसी प्रकार भक्त भी पंछी की तरह बिना किसी अपेक्षित लाभ के निष्काम कर्म में लगा रहता है और इस प्रकार उसका जीवन आनन्द से भर उठता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर की योजना में दुख नहीं हैं, बल्कि माया की योजना में दुख है।
उन्होंने कहा कि अगर आपके काम से लोकसेवा हो रही है या आप जो काम कर रहे हैं और उसमें ये ध्यान रख रहे है कि आपके द्वारा किया गया कर्म क्या सही है या क्या गलत? तो यह भी ध्यान के द्वारा ही सुनिश्चित होगा। यह भी मन को शांत करने से ही अंतर्ज्ञान प्राप्त होगा, जिसके आधार पर आप सही या गलत का फैसला कर सकेंगे। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। किसी भी भेड़चाल में न पड़ें। जिस काम के लिए आप भेजे गये हैं। वो काम करें। ईश्वर को समर्पित करते हुए काम करें। इससे स्वार्थवाली प्रवृत्ति खत्म हो जायेगी।
स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि ईश्वर की उपस्थिति में ही आप प्रेम व आनन्द महसूस करेंगे। ईश्वर को तन, मन, धन से प्राप्त करने की कोशिश होनी चाहिए, वो भी निष्काम कर्म द्वारा। जब आप ईश्वर को प्राप्त कर लेंगे तो आप पायेंगे कि उनके आगे सब कुछ फीका है। उन्होंने कहा कि जब परमहंस योगानन्द जी ने ईश्वर को पा लिया तो वे वैराग्य की ओर जाना चाहते थे। तभी उनके गुरु युक्तेश्वर गिरि ने उन्हें समझाया कि जो तुमने पाया है। उसका आनन्द केवल तुम उठाओगे। औरों को इसका रसपान नहीं कराओगे। स्वामी युक्तेश्वर गिरि के इस वक्तव्य को सुनकर परमहंस योगानन्द जी ने अदम्य संकल्प लिया कि उन्होंने जो भी प्राप्त किया है। वे जन-जन तक पहुंचायेंगे।
स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने परमहंस योगानन्द और युक्तेश्वर गिरि के बीच हुए उस संवाद का भी जिक्र किया। जब परमहंस योगानन्द हिमालय की यात्रा के लिए निकल गये थे और बाद में जब लौटे, तो उन्हें लगा कि उनके गुरु युक्तेश्वर गिरि उनसे नाराज होंगे। लेकिन जब उन्होंने अपने गुरु युक्तेश्वर जी से वार्तालाप किया। तो वे आश्चर्य में पड़ गये। युक्तेश्वर जी का कहना था कि क्रोध केवल इच्छा के अवरोध से उत्पन्न होता है। क्योंकि मैं किसी से अपेक्षा नहीं करता। मैं अपने स्वार्थ के लिए तुम्हारा कल्याण नहीं चाहुंगा।
स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि केवल हम यहीं सोच अपने आप में रखें, जैसा कि युक्तेश्वर गिरि जी की सोच थी, दुनिया से सारा क्लेश ही खत्म हो जाये। इससे बड़ा और सुंदर निष्काम भाव का दूसरा उदाहरण कुछ हो ही नहीं सकता। जो निष्काम भाव से काम करता है, उसे पद प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं कर सकती।
स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि दुनिया चलाना ईश्वर का काम है। हमारा नहीं। अगर ईश्वर कह रहा है कि अभी तुम्हें मेरे साथ चलना है, तो क्या दिक्कत है, महान संत या योगी जो होते हैं, वे तो तनिक देर ही नहीं करते। परमहंस योगानन्द जी तो अपने अंतिम समय में लोगों से बातचीत करते हुए समाधिस्थ हो गये। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो निष्काम कर्म को दूसरे रूप में लेते हैं। ऐसे लोग न इस जन्म में और न दूसरे जन्म में कुछ कर पाते हैं। वे अपना भविष्य भी नष्ट कर लेते हैं। जो शास्त्रों का बहाना बनाकर अकर्मण्यता का शिकार हो जाये, वे अपना ही अहित करते हैं। जबकि जो व्यक्ति साधनारत होकर, अंतर्मुखी हो जाता है, जिसे ईश्वर का प्रेम मिल रहा होता है। ऐसे लोगों में कुछ लोग वहीं रुक जाते हैं। आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करते। अकर्मण्यता के शिकार हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि किसी भी हाल में रुको नहीं। अनन्तता की ओर बढ़ते जाओ।
स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि समत्व भाव ही योग है। आत्मा परमात्मा के साथ एक हो जाये, योग है। योग वह मनःस्थिति है, जिसमें रहकर हमें निष्काम कर्म करना है। भक्त को ईश्वर में तल्लीन होकर अपना कर्म करना चाहिए। अपने मन की पृष्ठभूमि में रखकर कर्म करना है। ये तभी होगा, जब आप ध्यान करेंगे। उन्होंने कहा कि संसार में रहो, लेकिन सांसारिक बन कर मत रहो। माया से असहयोग करना सीखों तो आपको माया खुद ही मुक्त कर देगी।
