अपनी बात

कब तक उधार की प्रतिभा पर गुमान रहेगा झारखण्ड की उच्च शिक्षा को, सरोज शर्मा बनीं रांची विश्वविद्यालय की कुलपति

राज्यपाल-सह-झारखण्ड राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार द्वारा आज झारखण्ड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुच्छेद 10 (2) में प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए प्रो. सरोज शर्मा, प्राध्यापक एवं संकायाध्यक्ष, स्कूल ऑफ एजुकेशन, जीजीएस इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, द्वारका, नई दिल्ली को राँची विश्वविद्यालय, राँची का कुलपति नियुक्त किया गया है।

राज्यपाल के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी नितिन मदन कुलकर्णी के हस्ताक्षर से इस संबंध में नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है। हो सकता है कि सरोज शर्मा शीघ्र पदभार भी ग्रहण कर लें। लेकिन राज्यपाल के इस फैसले ने झारखण्ड में उच्च शिक्षा की दयनीय दशा की पोल खोलकर रख दी है। साथ ही यह भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि इसके लिए जिम्मेवार किसको ठहराया जाये? झारखण्ड के सारे विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल को, राज्यपाल सचिवालय को या हेमन्त सरकार को।

ज्यादातर लोग जो उच्च शिक्षा से जुड़े हुए हैं। उसके लिए वे राज्यपाल व राज्यपाल सचिवालय को ही दोषी ठहराते हैं। एक प्राध्यापक ने इस संबंध में विद्रोही24 को बताया कि सच्चाई यही है कि वर्तमान में पूरे झारखण्ड में कुछ को छोड़कर, कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हैं, जो किसी विश्वविद्यालय के कुलपति के लायक हो, जो अर्हता पूरी कर सकें। क्योंकि 2008 में असिस्टेंट प्रोफेसर बहाल हुए थे।

वर्तमान में 2026 चल रहा हैं, आश्चर्य है कि काबिलियत होने के बावजूद इन असिस्टेंट प्रोफेसरों को एक महीने पहले सीनियरिटी मिली है, वो भी अभी कागज पर ही है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि ये हाल 2008 के असिस्टेंट प्रोफेसरों का ही नहीं, बल्कि 1996 में बहाल असिस्टेंट प्रोफेसरों का भी हैं, जिन्हें अब तक प्रमोशन नहीं मिला, यानी प्रोफेसर नहीं बन सकें और न ही कुलपति की अर्हता पूरी कर सकें। ज्यादातर लोग इसमें विभागाध्यक्ष बनने के लायक ही नहीं हैं।

90 फीसदी विश्वविद्यालय के विभागों के विभागाध्यक्ष, वो असिस्टेंट प्रोफेसर ही हैं, यानी सब के सब प्रभारी हैं, कई तो प्रभारी बनकर ही रिटायर्ड हो गये। सच्चाई यही है कि असिस्टेंट प्रोफेसर कभी भी विभागाध्यक्ष नहीं हो सकता। कुलपति क्या बनेंगे? ये हाल केवल विभागों का ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासनों का भी है। जहां कुलपति समेत कुल सचिव, वित्त अधिकारी, परीक्षा नियंत्रक, सीसी, डीसी और अन्य सभी अधिकारी, सभी प्रभार में हैं।

मतलब, यहां हायर एजुकेशन को मजाक बना दिया गया है और इसे मजाक बनाने का सिलसिला कब थमेगा, कोई बता नहीं सकता? बोलने के लिए तो जो भी नये-नये लोग आते हैं, खूब हांकते हैं। लेकिन करते अपने मन की है। उच्च शिक्षा को सुधारने की मंशा उनकी कभी नहीं रहती। कुछ लोग यह भी कहते है कि पूरे झारखण्ड में अगर पांच-छह लोग हैं भी कुलपति बनने लायक, तो वे अब रिटायर्ड होने की स्थिति में हैं। ऐसे में झारखण्ड को कहीं न कहीं से उधारी तो लेनी ही होगी।

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