भाजपा के मुख्य सचेतक नवीन जायसवाल की नागपुरी भाषा में टॉपर होने और अंधाधुंध धन की प्राप्ति पर उठते सवाल से भाजपा की लुटिया गोल होने की संभावना
भारतीय जनता पार्टी के विधानसभा में मुख्य सचेतक नवीन जायसवाल इन दिनों सुर्खियों में हैं। सुर्खियों में रहने के कारण कई हैं। पहला तो उनकी डिग्री और दूसरा अचानक उनके जीवन स्तर में आई हाई लेवल भूचाल है। दरअसल एक आरटीआई एक्टिविस्ट विशाल कुमार यादव जो दूबे कालोनी, नामकुम रेलवे स्टेशन, रांची के निवासी है। उन्होंने हटिया के भाजपा विधायक नवीन जायसवाल की डिग्री को लेकर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए धुर्वा स्थित जगन्नाथ नगर महाविद्यालय के जन सूचना अधिकारी से कुछ सवाल पूछे थे। जिसका जवाब आया, तो बवाल होना ही था।
सूचना के अधिकार से पता चला कि जनाब नवीन जायसवाल नागपुरी भाषा में टॉप किये हैं। नवीन जायसवाल ने 23 अक्तूबर 2018 को दाखिला लिया था और इनका सत्र 2018-21 था। सूचना के अधिकार से ही यह भी पता चला कि विद्यार्थियों को परीक्षा फार्म भरने के समय विश्वविद्यालय के नियमानुसार विभागाध्यक्ष अपने स्तर पर अग्रसारित किये थे। अग्रसारित करने के समय उपस्थिति को संज्ञान में लिया जाता है। तत्कालीन विभागाध्यक्ष के सेवानिवृत्ति के पश्चात संबंधित उपस्थिति पंजी विभाग के संज्ञान में नहीं हैं।
सूचना के अधिकार से यह भी पता चला कि सत्र 2018-21 की कुछ परीक्षाएं विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित सेंटर पर आयोजित की गई थी। सत्र 2018-21 में कुछ परीक्षाएं कोरोना काल की वजह से विभागाध्यक्षों द्वारा अपने स्तर पर आयोजित की गई थी। विद्यार्थियों की उपस्थिति पत्रक भी महाविद्यालय के परीक्षा विभाग के संज्ञान में नहीं हैं।
भाजपा विधायक नवीन जायसवाल नागपुरी भाषा में 8.27 सीजीपीए के साथ टॉप किये हैं। हालांकि नवीन जायसवाल ने कई पत्रकारों को अपने जवाब में अपना पक्ष रखते हुए साफ कहा है कि उनकी डिग्री सही है, कोई भी इसकी जांच करा सकता है। लेकिन जो सूचना के अधिकार के तहत जवाब प्राप्त हुए हैं। वो सवाल खड़े कर देते हैं।
पहला सवाल यह कि जे एन कॉलेज के इक्जामिनेशन कंट्रोलर का यह कहना कि 2018-21 में कुछ परीक्षाएं कोरोना काल की वजह से विभागाध्यक्षों द्वारा अपने स्तर पर आयोजित की गई थी। विद्यार्थियों का उपस्थिति पत्रक महाविद्यालय के परीक्षा विभाग के संज्ञान में नहीं हैं और दूसरा विद्यार्थियों को परीक्षा फार्म भरने के समय विश्वविद्यालय के नियमानुसार तत्कालीन विभागाध्यक्ष अपने स्तर पर अग्रसारित किये थे, अग्रसारित करने के समय उपस्थिति को संज्ञान में लिया जाता है। तत्कालीन विभागाध्यक्ष के सेवानिवृत्ति के पश्चात उपस्थिति पंजी विभाग के संज्ञान में नहीं हैं।
भाजपा के कट्टर विरोधी झामुमो, कांग्रेस के नेता और सोशल साइट पर कई विद्वान तो भाजपा विधायक नवीन जायसवाल के डिग्री पर ही सवाल खड़ा करते हुए कहते है कि अगर ये नागपुरी भाषा में टॉपर हैं तो ये क्यों नहीं यूपीएससी के इक्जामिनेशन में बैठकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में चले जाते हैं, ताकि इनकी महान विद्वता का वहां भी पता चल जाये। कुछ तो यह भी कह रहे है कि नागपुरी भाषा में तो इन्हें कभी सदन में बोलते नहीं देखा और न ही किसी सार्वजनिक मंच पर नागपुरी भाषा में बात रखते हुए देखा। ऐसे में ये नागपुरी भाषा में टॉप कैसे कर गये, संदेह तो जगता ही है?
सोशल मीडिया पर सक्रिय और खांटी राजनीतिज्ञ हिमांशु कुमार तो साफ कहते है कि “कभी नागपुरी में भाषण दीजिए, हुजूर। नागपुरी के टॉपर हैं आप। समस्या यह नहीं है कि अनपढ़ झूठ पर झूठ बोले जा रहा है, समस्या यह है कि शिक्षित ताली बजा रहे हैं।” हिमांशु कुमार यह भी कहते है कि आखिर हटिया में पढ़े लिखे लोग ज्यादा निवास करते हैं। लेकिन बड़ा सवाल – मोदी जी के नाम पर कब तक? एक संगठित गिरोह राज्य में सक्रिय है। जिसका मूल उद्देश्य ही केवल धन अर्जित करना और अपने परिवार की खुशहाली है. जागो युवा जागो – बदलो झारखण्ड।

हिमांशु तो एक फोटो देकर राजद विधायक दल के नेता सुरेश पासवान के विधानसभा में दिये गये उस बयान का जोरदार समर्थन करते हैं कि पूरे विधायक आवास के फर्नीचर के लिए दस लाख रुपये होनी चाहिए। वे कहते है कि सुरेश पासवान ने गलत क्या मांगा? हटिया के विधायक के घर के केवल एक सोफा की कीमत इस फोटो को देखकर लगाया जा सकता है। इसकी कीमत दस लाख भी हो सकता है। केवल एक सोफा अगर लाखों का हो सकता है तो सुरेश पासवान ने गलत क्या मांगा? अभी विधायक को मात्र तीन लाख रुपये मिलते हैं और एक अबुआ आवास का कीमत दो लाख।

विधायक नवीन जायसवाल की अंधाधुध धनवर्द्धन को लेकर हाल ही में एक व्यक्ति ने भारत निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को पत्र भी लिखा है और इनके द्वारा दी गई हलफनामे में दी गई प्रापर्टी की जांच कराने की भी मांग की है। जिन्होंने भारत निर्वाचन आयोग को पत्र दिया है। उनका कहना है कि नवीन जायसवाल की अधिकांश संपत्ति राजनीति में आने के बाद की है। उन्हें बताना चाहिए कि रांची में ही उनका करोड़ों का महल कैसे बन गया? ऐसा महल तो उनसे ज्यादा दिनों तक राजनीति करनेवाले उनके ही पार्टी के विधायकों या मंत्री या मुख्यमंत्री रह चुके लोगों के पास नहीं हैं। कहीं उन्हें अलादीन का चिराग तो नहीं मिल गया और अलादीन का चिराग मिला भी तो यह सिर्फ भाजपा के नवीन जायसवाल जैसे नेताओं को ही क्यों मिला? सामान्य भाजपा कार्यकर्ता या उनके ही समान विधायक या मंत्री या सचेतक रहे, अन्य लोगों को वो अलादीन का चिराग क्यों नहीं मिलता?
