अपनी बात

प्रेमावतार परमहंस योगानन्द जी का जन्मदिनः योगदा आश्रम में अनुभूति ऐसी कि जैसे योगानन्द स्वयं अपने जन्मोत्सव को देखने योगदा भक्तों के बीच में अवतरित हो गये हो

प्रेमावतार परमहंस योगानन्द जी का जन्मदिनः योगदा आश्रम में अनुभूति ऐसी कि जैसे योगानन्द स्वयं अपने जन्मोत्सव को देखने योगदा भक्तों के बीच में अवतरित हो गये हो। आज मैं और मेरी धर्मपत्नी दोनों प्रातःकाल में ही रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम पहुंच गये। हम दोनों के पांव सर्वप्रथम गुरुजी की कक्ष की ओर चले। गुरुजी के कक्ष के बाहर हम दोनों ने देखा कि बड़ी संख्या में परमहंस योगानन्द जी के भक्त ध्यानमग्न थे। उनके चेहरे पर ध्यान की मुद्रा ने चमक ला दी थी।

उसके बाद हम दोनों लीची वृक्ष के पास पहुंचे। जहां उनके भक्तों ने अपनी कलाकारी से उस स्थल को दिव्यता प्रदान करने की कोशिश की थी। वहां देखने को यह मिला कि आज का दिन और दिनों से कुछ विशेष लग रहा था। विशेष हो भी क्यों नहीं? आज गुरुजी का जन्मदिन जो हैं। हम दोनों ने देखा कि प्रत्येक भक्त अपना मोबाइल निकालता और उस स्थान की एक झलक को सदा के लिए कैद करने के लिए क्लिक करता और फिर मोबाइल में आई उक्त छवि को निहारता रहता। गुरु जी की छवि को निहारते समय उसके आंखों की निर्मलता और चेहरे पर फैली मुस्कान सब कुछ बता देती कि उक्त योगदा भक्त के हृदय में क्या चल रहा है?

फिर हम दोनों स्मृति मंदिर पहुंचे। थोड़ा सा ध्यान लगाया और फिर पहुंच गये शिव मंदिर, जहां स्वामी गोकुलानन्द अपने प्रेमावतार परमहंस योगानन्द जी का विशेष पूजन में लगे थे। पुरोहित जिस प्रकार से उन्हें दिशा-निर्देश देते, वे पूजा करते चले जाते और इधर योगदा संन्यासियों का समूह अपने दिव्य भजनों से पूरे आश्रम को योगानन्दमय करने का प्रयास में लगा था।

इन संन्यासियों द्वारा गाये जा रहे एक-एक भजन, योगदा भक्तों के हृदय को पवित्र करते चले जा रहे थे और उनके हृदय में परमहंस योगानन्द जी की छवि को स्थापित करते चले जा रहे थे। इन संन्यासियों का भजन, ठीक उस प्रकार का अनुभव करा रहा था, जैसे कोई भक्त, भारत की पवित्र नदियों में डूबकी लगाकर स्वयं को धन्य कर रहा होता है, वैसे ही संन्यासियों द्वारा गाये भजन वहां उपस्थित प्रत्येक भक्तों ही नहीं, बल्कि वहां चर-अचर सभी जगत में योगानन्द जी की छवि को स्थापित करते चले जा रहे थे।

सर्वप्रथम तो ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द ने भजन प्रस्तुत किये। उनके भजन थे – गुरुदेव योगानन्द आओ, हम चरण शरण में आये हैं, हमें पार लगा जाओ। गुरुदेव पार लगा जाओ …। उसके बाद उन्होंने गाया – जय गुरु जय मां जय जय मां, जय गुरु जय मां जय जय मां …। फिर ओम् गुरु जय जय, प्रेमावतार जय जय, परमहंस जय जय, योगानन्द जय जय …।

ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द के बाद भजन की रसधार को नियमित किया, ब्रह्मचारी भास्करानन्द ने। भास्करानन्द द्वारा गाये भजन से वहां बैठे सारे योगदा भक्त सुध-बुध खो बैठे। उनका पहला भजन था – गुरुदेव गुरुदेव गुरुदेव देव गुरुदेव, गुरुदेव मेरे गुरुदेव …। दूसरा भजन था – ओम गुरु योगानन्द, जय गुरु योगानन्द …। तीसरा भजन था – करुणामय गुरुदेव योगानन्द, परमहंस आनन्द रूप प्रेम अवतारा … और अंतिम भजन था … जय गुरु जय गुरु जय गुरु जय, जय गुरु जय गुरु जय गुरु जय …।

भजन के बीच के क्रम में जब पुरोहित ने हवन के लिए समस्त संन्यासियों को बुलाया तो भजन का क्रम कुछ देर के लिए रुका। सारे संन्यासी अपने प्रिय गुरुदेव परमहंस योगानन्द की नाम की आहुतियां देने के लिए शिव मंदिर के नजदीक बने यज्ञशाला में पहुंचे। यज्ञशाला में दी जा रही आहुतियां और उनसे निकलनेवाली ज्वाला और धुएं समस्त आश्रम को पवित्र किए जा रही थी। साथ ही परमहंस योगानन्द जी के आश्रम में होने का एहसास करा रही थी।

ठीक इसके बाद परमहंस योगानन्द जी की फिर विशेष पूजा अर्चना और उसके साथ-साथ भजन की रसधार बहना शुरु हुआ और फिर परमहंस योगानन्द जी की आरती शुरु हुई। ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे … से सारा आश्रम गुंजायमान हो गया। सभी आनन्द में डूबे थे। सभी के हाथों में पुष्प और बिल्वपत्र और हृदय में भक्ति के भाव का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। बाद में गुरुदेव के प्रति पुष्पांजलि की गई और फिर शुरु हुआ परमहंस योगानन्द जी का भंडारा।

पास में बने श्रवणालय के पास ही पंडाल लगाये गये थे। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं, योगानन्द जी के चाहनेवालों, योगानन्द जी के प्रसाद में दिव्यता को देखनेवालों की लंबी लाइन लग गई। जितनी लंबी पुरुषों की थी, उससे कही ज्यादा महिलाओं की थी। आज आश्रम की ओर से भंडारा में जुटनेवाली संख्याओं को लेकर अच्छी और विशेष व्यवस्था की गई थी। कई सेवार्थी इससे जुड़े हुए थे। किसी को भी प्रसाद पाने में दिक्कत न हो। हमने देखा कि संन्यासियों का समूह स्वयं इसका निरीक्षण करने में लगे थे।

इधर जैसे ही हमदोनों आश्रम से बाहर की ओर निकले, तो देखा कि हमदोनों के घर पहुंचने तक बच्चों, महिलाओं व पुरुषों की एक लंबी शृंखला योगदा सत्संग आश्रम की ओर धीरे-धीरे ससर रही थी। इनके भाव को देखकर स्पष्ट रुप से पता चल रहा था कि इनके पांव कहां जा रहे हैं। सभी के चेहरे पर दिव्यता और मुस्कान व भक्ति का संगम तथा गुरुजी के प्रसाद को ग्रहण करना है और समस्त कष्टों से मुक्त होने का भाव, सब कुछ कह दे रहा था। शायद उन्हें पता था कि वर्ष के प्रथम सप्ताह में मननेवाला गुरुजी का आज जन्मदिन, उन्हीं के कष्टों को दूर करने के लिए आया है, गुरुजी ने उन पर कृपा कर दी है।

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