गर्व करिये! जो रंतिदेव के श्लोक को शुद्ध-शुद्ध नहीं लिख सकता, उसे मिलेगा बनारस में वर्ष 2026 का आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान
लो भाई, मयंक मुरारी को अब वर्ष 2026 का आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान भी मिलने जा रहा है। प्रभात खबर ने इस खबर को आज प्रमुखता से छापा है। प्रभात खबर के अनुसार यह जानकारी विद्याश्री न्यास के सचिव डा. दयानिधि मिश्र ने उन्हें उपलब्ध कराई है। कहा गया है कि न्यास की ओर से सर्वसम्मति से डा. मयंक को इस बार यह सम्मान देने का निर्णय लिया गया है। यह सम्मान आगामी 13 जनवरी को विद्यानिवास जी की जयंती पर बनारस में मयंक मुरारी को प्रदान किया जायेगा।
भाई, आजकल तो पुरस्कार कैसे और किसे उपलब्ध कराई जाती है? ये तो अब बच्चा-बच्चा जानता है। लेकिन इस एआई के युग में वर्तमान में किसी को भी, कोई संस्था अब बेवकूफ नहीं बना सकता, चाहे वो स्वयं को कितना भी काबिल क्यों न समझता हो। क्योंकि आजकल तो जिसे सम्मान मिलता है, वो खुद अपनी बुद्धिमता का शानदार प्रदर्शन सोशल साइट फेसबुक आदि पर कर देता है। जिससे लोग जान जाते है कि जिस व्यक्ति को पुरस्कार दिया जा रहा है। वो उक्त पुरस्कार को पाने के लिए कितने योग्य/अयोग्य है?
आजकल तो कई अखबार वाले चाहे वो टाइम्स ऑफ इंडिया हो या प्रभात खबर, अपनी-अपनी दुकानदारी चलाने के लिए, पुरस्कार बांटने की कलाकारी सीख ली है। ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे। लेकिन साहित्य जगत से जुड़ी संस्थाएं भी, ऐसा करने लगे, तो किसी का भी दिमाग घूम सकता है।
अब जरा मयंक मुरारी का फेसबुक देखिये। जो नीचे दिया गया है। यह सात दिसम्बर को उन्होंने खुद लिखा है। क्या लिखा है जरा पहले पढ़ लीजिये, तब हम इनके लिखने का पोस्टमार्टम करेंगे। वे लिखते हैं ….
“न त्वहं कामये राज्यं न च स्वर्गं सुखानि च।
नवभारत टाइम्स ने झारखंड की विकास-यात्रा में समाज विकास के हमारे कार्यों को उत्कृष्ट माना है। आज एक कार्यक्रम में इसके प्रतिफल स्वरूप रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ से सम्मान मिला जो उषा मार्टिन के समाज परिवर्तन के अभियान की सफलता की स्वीकृति है, साथ ही हमारे एप्रोच और इनिशिएटिव के सही होने का परिचायक है।
यात्रा कहां से शुरू हुई और किस पड़ाव की ओर बढ़ रही है। सृजन का एक पक्ष लेखन है तो दूसरा पक्ष सेवा है। कदाचित समाजसेवा, ग्रामीण गरीबों का दुख कम करना और उनके जीवन में थोड़ा उजाला और प्रगति लाने के लिए नियति ने मुझे निमित्त बनाया, उषा मार्टिन इसमें सहयोगी बना, प्रबंधन का विश्वास मिला। यात्रा जारी रहे..!
रंतिदेव का प्रसिद्ध श्लोक है, जिसमें वे कहते हैं कि उन्हें न तो राज्य की कामना है, न स्वर्ग या पुनर्जन्म की…!
न त्वहं कामये राज्यं न च स्वर्गं सुखानि च।
न चापि पुनर्र्भजं वांछां वासुदेवस्त्वहं ततः।।
एवं सर्वेषु भूतेषु…नारायण-परायण:।।
मैं तो बस यही चाहता हूँ कि सभी प्राणियों के कष्ट दूर हों, और मैं सभी प्राणियों के हृदय में निवास करूँ और उनके दुख को दूर करूँ। उन्होंने कहा, “जब तक दुख से पीड़ित लोग धरती पर हैं, मुझे उठा कर मत ले जाना। मैं यहीं रहूँगा और उनके दुखों को दूर करूँगा।
यह कहानी हमें बताती है कि नियति कैसे काम करती है। हर अगली घटना, पिछली घटना से जुड़ी है और हर मौजूदा घटना भविष्य की किसी घटना से। सबकुछ पूर्व नियोजित है। जैसे एक स्क्रिप्ट लिखी हुई है जिस पर जिंदगी की पिक्चर चल रहा है। किसकी किस्मत में आगे क्या लिखा है ये किसी को नहीं मालूम। जो लिखा है,उस रॉल का शिद्दत से निभाना है, बस…!”

तो आपने देखा कि ये आलेख है, 7 दिसम्बर 2025 का, जो मुरारी मयंक ने फेसबुक पर लिखे। अब सवाल उठता है कि जिस व्यक्ति को ये नहीं पता कि रंतिदेव जी का श्लोक क्या है? वो रंतिदेव के श्लोक को उलट-पुलट कर लिखता है। उनके लिखे श्लोकों/कथनों का वो सही-सही अर्थ भी नहीं बता पाता। क्या ऐसा व्यक्ति पं. विद्यानिवास मिश्र जैसे व्यक्ति के नाम से मिलनेवाली पुरस्कारों को पाने के योग्य हैं? क्या कोई भी चिंतक या लेखक को ये अधिकार है कि वो एक महान दृष्टा का श्लोक या उनके कथन को जैसे-तैसे लिख दे?
रंतिदेव ने तो लिखा/कहा है कि –
“न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।”
और मयंक मुरारी ने अपने फेसबुक में क्या लिखा और इसका अर्थ क्या लिखा, वो इसी आलेख में ऊपर दिया गया है। आप खुद मिला लें या रांची में ही किसी संस्कृत के विद्वान से जाकर मिल लें कि क्या मुरारी मयंक ने जो श्लोक लिखे हैं या उसके अर्थ लिखे हैं, वो सही-सही हैं। आपको स्वयं पता लग जायेगा।
मयंक मुरारी ऐसी गलतियां एक बार नहीं, कई बार की है। जिसका प्रमाण विद्रोही24 के पास है। समय-समय पर विद्रोही24 ने उसे उजागर भी की है। लेकिन वो कहा जाता है कि जो सिक्का चल गया, वो चल गया और जो नहीं चला, तो वो गया काम से। चाहे वो सिक्का कैसा भी क्यों न हो। प्रभात खबर ने मयंक मुरारी के बारे में लिखा है कि मयंक मुरारी को कई पुरस्कार मिल चुके हैं।
लेकिन जो भी पुरस्कार मिले हैं। उसके मूल में उषा मार्टिन ही है। क्योंकि अखबार उद्योग से मिलनेवाले ज्यादातर पुरस्कार ऐसे ही उद्योग से जुड़े होनेवाले लोगों को मिलते हैं, जिसका आधार सहजीविता होता है। ऐसे भी रांची में इसी प्रकार के चिन्तक व लेखक भरे पड़े हैं। जिन्हें पुरस्कार भी थोक रूप से मिल रहे हैं। कल इन्हें इसी प्रकार से पद्यश्री अवार्ड भी मिल जाये तो आश्चर्य भी मत करियेगा, क्योंकि एक राजनीतिज्ञ ने हमसे कहा कि मेरा नाम नहीं छापियेगा, वो तो अब हमसे पद्मश्री अवार्ड दिलवाने के लिए पैरवी करवा रहा था। भाई, इसी को कहते हैं, घोर कलियुग।
