धर्म

योगदा की ऊर्जान्वित करनेवाली व्यायाम, हं-सः, ओम् तकनीक तथा क्रिया योग के सहारे कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का कायाकल्प कर सकता हैः निगमानन्द

आप कहीं भी रहें। आपकी परिस्थितियां कैसी भी क्यों न हो। आप भयंकर विपदाओं से ही क्यों न जूझ रहे हो। आप शत्रुओं से ही क्यों न घिरे हो। लेकिन आप ध्यान करते हैं। आपके ध्यान में गहराई है। तो आप उन परिस्थितियों में भी आनन्द में ही रहेंगे। संतुलन में ही रहेंगे। आपको कोई भी परास्त नहीं कर सकता। आप अपने लक्ष्य को पाने में शत प्रतिशत सफल रहेंगे। ये बातें आज रांची के योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए योगदा भक्तों के बीच स्वामी निगमानन्द गिरि ने कही।

स्वामी निगमानन्द ने आज योगदा भक्तों को विभिन्न प्रकार के दृष्टांतों से बताया कि कैसे इस अशांत विश्व में स्वयं को शांत रखते हुए मानसिक संतुलन को बनाये रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज के इस युग में हर व्यक्ति अशांत है। सभी समस्याओं में जकड़े हैं। सभी की समस्याएं अलग-अलग है। लेकिन जैसे ही वे ध्यान करते हैं। वे धीरे-धीरे उन समस्याओं से मुक्त होने लगते हैं। जो समस्याएं उनके लिए परेशानी का सबब बनती हुई नजर आ रही थी। उसी में वे आनन्द भी ढूंढ लेते हैं। यहीं ध्यान की सबसे बड़ी विशेषता है।

उन्होंने कहा कि जो लोग ध्यान करते हैं। इसका मतलब ये भी नहीं कि उनके जीवन में समस्याएं आयेंगी ही नहीं। समस्याओं का आना अलग बात है और उसका हल निकालना तथा हल निकालने के वक्त स्वयं को आनन्द में रखना अलग-अलग बाते हैं। स्वामी निगमानन्द ने इसी बीच स्वामी विवेकानन्द और विल कॉक्स से जुड़ी एक कहानी बताई कि कैसे एक अमरीकी कवियित्री एला विलकॉक्स ने स्वामी विवेकानन्द के वेदांत और सार्वभौमिक भाईचारे के संदेश को आत्मसात् करते हुए उनके सिद्धांतों को अपनी कविताओं में शामिल किया। जिससे उनका जीवन तो आध्यात्मिकता से प्रभावित हुआ ही। पश्चिमी देशों को भी स्वामी विवेकानन्द के वेदान्त को जानने में सुविधा महसूस हुई और इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन को आध्यात्मिक तरीके से संतुलन बनाये रखा।

स्वामी निगमानन्द ने कहा कि अगर आप किसी बातों या समस्याओं को लेकर रोयेंगे, तो आपको जीवन भर अकेले रोना पड़ेगा और हसेंगे तो आप जीवन भर हंसते रहेंगे और दूसरों को प्रेरित भी करेंगे। उन्होंने कहा कि ध्यान के द्वारा आप स्वयं को ही नहीं, बल्कि दुनिया तक को बदल सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमेशा याद रखिये कि व्यवसायिक हो या विद्यार्थी, हर के जीवन में उतार-चढ़ाव आता रहता है। हमेशा व्यवसाय में लाभ ही नहीं होता, कभी हानि भी उठानी पड़ती है। उसी प्रकार विद्यार्थी के जीवन में सफलता और असफलता लगी रहती है। ऐसे में जीवन में संतुलन का होना जरुरी है।

उन्होंने कहा कि योग क्या हैं? योगश्चितवृत्तिनिरोधः अर्थात् मन की उतार-चढ़ाव या उसके अंदर पनपने वाले विचारों को रोकने अथवा शांत करने का नाम ही योग है। उन्होंने कहा कि दयामाता 1931 में परमहंस योगानन्द जी के सम्पर्क में आई। वो कहती थी कि उनके अंदर बहुत सारे दुर्गुण थे। लेकिन जैसे ही वो परमहंस योगानन्द जी के संपर्क में आई। ध्यान करना शुरु किया। वो सारे दुर्गुण स्वतः दूर होते चले गये। उन दुर्गुणों को हटाने के लिए उन्हें कोई विशेष प्रयास करना नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि योगदा में बताई जानेवाली ऊर्जान्वित करनेवाली व्यायाम, हं-सः व ओम् तकनीक तथा क्रिया योग ये चार ऐसी शाखाएं हैं, जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का कायाकल्प कर सकता है।

स्वामी निगमानन्द ने कहा कि ध्यान के अनेक पायदान हैं। उन पायदानों पर ध्यान दीजिये और ध्यान की गहराइयों में उतरते जाइये। अचानक आप सोचेंगे कि आपको तुरन्त इसका फायदा मिल जाये, तो ये संभव नहीं। लेकिन आपको नियमित अभ्यास करना होगा। आपको ध्यान में रुचि जगानी होगी। उसमें क्वालिटी लानी होगी और फिर आप वो प्राप्त करेंगे, जो आपने सोचा भी नहीं होगा। ये है, ध्यान की विशेषता।

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