साधना संगम के समापन अवसर पर लॉस एंजिल्स से योगदा भक्तों को संबोधित करते हुए स्वामी चिदानन्द गिरि ने कहा जीवन में संतुलन योग का दूसरा नाम
भारत के चार प्रमुख नगरों उत्तर प्रदेश के नोएडा, कोलकाता के दक्षिणेश्वर, तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई और महाराष्ट्र के इगतपुरी में पिछले पांच दिनों से चल रहे साधना संगम के समापन के अवसर पर अमरीका के लॉस एंजिल्स स्थित एसआरएफ मुख्यालय से ऑनलाइन संबोधित करते हुए एसआरएफ व वाईएसएस के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द गिरि ने योगदा के हजारों भक्तों को कहा कि दरअसल जीवन में संतुलन का नाम ही योग है। आप संतुलन को योग भी कह सकते हैं, जीवन में संतुलन योग का दूसरा नाम है।
स्वामी चिदानन्द गिरि ने साधना संगम से जुड़े व क्रिया दीक्षा ले रहे सारे योगदा भक्तों को समझाया कि जीवन में संतुलन का होना कितना आवश्यक है और यह किस प्रकार ईश्वर और प्रकृति के साथ बेहतर संबंध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्वामी चिदानन्द गिरि ने योगदा सत्संग सोसाइटी में हमेशा होनेवाले भजन ‘स्पिरिट एंड नेचर, डांसिग टूगेदर’ का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे कोई व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक चेतना को सर्वश्रेष्ठ कर ईश्वर के साथ आनन्दमय हो जाता है।
स्वामी चिदानन्द गिरि ने योगदा सत्संग पाठमाला के पन्द्रहवें और 64वें लेशन को योगदा भक्तों के बीच रखते हुए कहा कि इन पाठमालाओं में संतुलित आध्यात्मिक जीवन जीने की कला और उसके महत्व को समझाया गया है। योगदा भक्त इन पाठमालाओं से अपने जीवन को कैसे संतुलित किया जा सकता है, उससे सीख ले सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इन पाठमालाओं में संतुलित आध्यात्मिक जीवन जीने की उचित कला में दक्ष बनने के लिए एक ऐसी दिनचर्या को अंगीकृत करने को कहा गया है। जिसमें आप सर्वप्रथम ईश्वर के साथ एकाकार हो सकें। दूसरा, आपका तथा आपके परिवार, आपके पड़ोसियों तथा आपके राष्ट्र व अन्य सभी का स्वास्थ्य उत्तम रहे। तीसरा, एक ऐसा संतुलित मन हो जिससे आपका आत्मोत्थान हो सकें, क्योंकि अनवरत् रूप से स्वयं को सुधार करते रहनेवाला व्यक्ति ही दिन-प्रतिदिन प्रसन्न से प्रसन्नतर बनता चला जाता है। चौथा, आपके, आपके परिवार, आपके समाज तथा देश व सम्पूर्ण विश्व के लिए समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो। उन्होंने बताया कि चिरस्थायी प्रसन्नता जीवन में सफलता का सर्वोत्तम मापदंड है, और यह ध्यान का अभ्यास एवं योग से संभव है।
स्वामी चिदानन्द गिरि ने कहा कि परमहंस योगानन्द द्वारा दिये गये लेशन, सही में संतुलित जीवन के लिए मास्टर क्लास है। यह हमें शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक आनन्द प्रदान करते है और इन सभी के लिए प्राणायाम, स्वयं द्वारा सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का होना और आध्यात्मिकता की ओर स्वयं को निरन्तर ध्यान की प्रवृत्ति को जागृत करना होगा।
उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार हर व्यक्ति अपनी-अपनी कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ रहा है। उसे वह लड़ाई स्वयं लड़नी है और उसे विजय भी प्राप्त करनी है। लेकिन यह विजय बिना गुरु और ईश्वर की मदद के बिना संभव नहीं है। उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ध्यान के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि हम सभी जो गुरु जी द्वारा दी गई प्रविधि का अभ्यास करते हैं, वे विश्व शांति की स्थापना में अपना अपना योगदान दे रहे हैं। साधना द्वारा हम स्वयं शांत चित्त होते हैं, फिर यही शांति परिवार, समाज, देश और विश्व स्तर को प्रभावित करता है। गुरु और ईश्वर, गुरु के बताये गये मार्ग, ध्यान में गहराई का होना, क्रिया योग को अपनाना, गुरु के बताये गये लेशन का अध्ययन, ये सभी हमारे सहायक होते हैं।
उन्होंने कहा कि परमहंस योगानन्द जी द्वारा दी गई इनर्जेटिक एक्सरसाइज हमारी शरीर को आध्यात्मिकता की ओर ले जाने में सहायक सिद्ध होते हैं। बशर्ते उसमें मशीनीकरण की जगह भावनात्मक रूप से लगाव हो। क्रियायोग व ओम् तकनीक की सहायता व प्रतिज्ञापन के नियमित अभ्यास से हम स्वयं को संतुलित कर सकते हैं।
उन्होंने सभी से कूटस्थ जिसे तीसरा नेत्र भी कहा जाता है, के माध्यम से ईश्वरीय स्पन्दन को महसूस करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि गुरु और ईश्वर दोनों आपको सहायता करने के लिए तैयार है, कि आप संतुलित जीवन के माध्यम से आध्यात्मिक आनन्द को प्राप्त कर सकें। लेकिन ये सभी आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप इसे किस रूप में ले रहे हैं। जय गुरु।
