धनतेरस की आहट, सोने की चाहत और अखबार की कारगुजारियां
मैं जहां रहता हूं। उस मुहल्ले में एक सज्जन कल से परेशान है। उनकी पत्नी ने धनतेरस को लेकर, एक लंबी लिस्ट थमा दी है। लिस्ट में सोने के आभूषण की झरी लगी हुई है। अब उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि वे करें तो क्या करें? एक ओर पत्नी है, दूसरी ओर धनतेरस का त्यौहार है और तीसरी ओर उनकी पॉकेट है, जो जवाब दे रही है। वो समझ नहीं पा रहे कि वे अपनी पत्नी को कैसे समझाएं?
पत्नी ऐसी हैं कि अगर उनकी बात नहीं मानी जाये, तो वे तत्काल विध्वंसकारिणी का रूप ग्रहण कर लेंगी, धनतेरस का त्यौहार है, तो कुछ न कुछ लेना ही है और पॉकेट में एक धेला नहीं हैं, जो कुछ खरीद सकें। दूसरी ओर अखबारों ने दीवाली और धनतेरस को लेकर ऐसा माहौल बना दिया है कि उस माहौल ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। अब जरा देखिये। एक अखबार है, जो रांची से प्रकाशित है। नाम है -प्रभात खबर।
इस अखबार ने लाइफ सिटी पर एक समाचार छापी है। समाचार है – धनतेरस पर राशि के अनुसार क्या खरीदना होगा शुभ। अब इस अखबार ने इस प्रकार के समाचार को स्थान देकर, कैसे अपने समाज में अंधविश्वास फैलाई है, आप स्वयं देखिये। क्या ये अखबार बता सकता है कि भारत के किस धर्म शास्त्र में राशि के अनुसार धनतेरस के दिन क्या खरीदने के लिए कहा गया है? और अगर ऐसा लिखा है तो यह भी लिखा होगा कि धनतेरस पर राशि के अनुसार कौन सा अखबार वर्ष भर लेना श्रेयस्कर होगा?
अखबार ने इस पर शोध करके लोगों को यह जानकारी क्यों नहीं दे दी। यहां के लोग वर्ष भर धनतेरस के दिन उसी अखबार को वर्ष भर पढ़कर, अपनी सेहत सुधार लेते, खुद को आर्थिक तौर पर मजबूत कर लेते। चूंकि हमारे देश में मूर्खों की जमात अधिक है और इन मूर्खों को मूर्खतापूर्ण आलेख/समाचार पढ़ने में ही आनन्द आता है। जिस कारण इस अखबार ने मूर्खता की ज्योत जलाकर सभी को धनतेरस के दिन अज्ञानता की ओर धकेल दिया है।
अब सवाल धनतेरस या दीपावली मनानेवाले हिन्दू जनमानस से। क्या आपने भारत के महान ऋषियों/मणीषियों/महान आत्माओं को सोने की चेन, अंगूठी पहने देखा है। उत्तर होगा – नहीं। संतों-महात्माओं को स्वर्णाभूषणों से क्या काम? एक संत थे – कुंभन दास। वे तो साफ कहते थे – संतन को कहा सीकरी सों काम? आवत जात पनहियां टूटी, बिसरि गयो हरि नाम।
और जो कुंभन दास को नहीं जानते। वे बताएं कि महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री आदि महान हस्तियों के गले या हाथों में स्वर्णाभूषण देखा हैं या महाननेत्री सरोजिनी नायडू, इन्दिरा गांधी, कमला नेहरु आदि के गले या हाथों में स्वर्णाभूषण देखा है और जब नहीं देखा तो फिर आपको इस प्रकार की स्वर्णाभूषणों के पीछे छटपटाहट क्यों? क्यों किसी अखबार या किसी मूर्ख के कहने पर सोना-चांदी की चाहत में स्वयं को ईश्वर से दूर कर ले रहे हो।
अरे इसी रांची में रामकृष्ण मिशन और योगदा सत्संग की मठें संचालित हैं। जरा वहां के संन्यासियों को जाकर देखो कि उनके गले या हाथों में कितने स्वर्णाभूषण दिखाई पड़ते हैं। सोना से आज तक किसका भला हुआ है। तुम स्वयं को ही सोना क्यों नहीं बना लेते हो। जैसे रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा, स्वामी विवेकानन्द, परमहंस योगानन्द, लाहिड़ी महाशय, युक्तेश्वर गिरि जैसे असंख्य महान संतों ने अपने जीवन को सोने से भी बेहतर बनाकर मोक्ष को प्राप्त कर लिया।
