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BCCL के E-Block को बोर्ड की मंजूरी, 2027 से 27 वर्षों में 376 मिलियन टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य, कतरास, कुसुंडा, सिजुआ क्षेत्र का भविष्य खतरे में, विजय झा ने कहा मेगा प्रोजेक्ट के पहले हो सामाजिक प्रभाव का आकलन

भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) की महत्वाकांक्षी E-Block कोयला परियोजना को कोल इंडिया बोर्ड की मंजूरी मिल गई है। परियोजना के तहत वर्ष 2027 में खनन शुरू किए जाने की संभावना है। करीब 27 वर्षों के लिए तैयार की गई इस परियोजना में लगभग 376 मिलियन टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

परियोजना को 16 वर्ष और 11 वर्ष के दो चरणों में बांटा गया है। योजना के पहले चरण में करीब 180 मिलियन टन कोयले के उत्पादन का अनुमान है। उत्पादित कोयले को वॉशरी-ग्रेड कोयले के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ऐसे में यह परियोजना देश की घरेलू कोकिंग कोयला जरूरतों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

E-Block के तहत लगभग 18.18 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खनन गतिविधियां संचालित करने की योजना है। परियोजना में करीब 15 मिलियन टन प्रतिवर्ष की खनन क्षमता प्रस्तावित है। इसके साथ लगभग 1,628.89 मिलियन घन मीटर ओवरबर्डन हटाने का भी प्रावधान है। परियोजना आकलन में करीब 29 प्रतिशत रिटर्न का अनुमान लगाया गया है। इससे BCCL को दीर्घकाल में आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है।

E-Block के गठन के साथ कतरास, सिजुआ और कुसुंडा क्षेत्रों की कई मौजूदा कोलियरियों और परियोजनाओं को एकीकृत किया जाएगा। कतरास क्षेत्र की आकाशकिनारी और AKWMC, जबकि सिजुआ क्षेत्र की मोदीडीह, तेतुलमारी, सांद्राबांस जोरा और निचितपुर परियोजनाएं इसके दायरे में शामिल होंगी।

इसके अलावा कुसुंडा क्षेत्र की ईस्ट बसुरिया, बसुरिया और खास कुसुंडा तथा गोदुडीह के कुछ हिस्से भी नई खनन व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे। इससे मौजूदा परिचालन ढांचे में व्यापक पुनर्गठन होने की संभावना है। परियोजना के लिए करीब 1,930 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होगी, जिसमें लगभग 1,361 हेक्टेयर भूमि BCCL के पास पहले से उपलब्ध है। शेष भूमि के लिए अधिग्रहण और पुनर्वास की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

परियोजना योजना के अनुसार पात्र भू-स्वामियों को लागू नियमों के तहत मुआवजा और रोजगार संबंधी लाभ दिए जाने का प्रावधान है। परियोजना से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है। योग्यता और भर्ती आवश्यकताओं के आधार पर माइनिंग सरदार, ओवरमैन, इलेक्ट्रिकल और सर्वे जैसे तकनीकी एवं पर्यवेक्षी पदों पर स्थानीय युवाओं को अवसर मिल सकते हैं।

धनबाद-चंद्रपुरा रेल लाइन से दूर खनन की योजना

E-Block परियोजना में धनबाद–चंद्रपुरा (DC) रेल लाइन को भी ध्यान में रखा गया है। BCCL ने रेल लाइन के अलाइनमेंट से दूर स्थित क्षेत्रों में खनन की योजना बनाई है, ताकि खनन गतिविधियों का रेलवे ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। कोयले के परिवहन के लिए एक समर्पित रेलवे साइडिंग का भी प्रस्ताव है। इससे परियोजना से उत्पादित कोयले को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने में सुविधा मिलने की उम्मीद है।

भारत में घरेलू कोकिंग कोयला उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच E-Block परियोजना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। BCCL के लिए यह परियोजना भविष्य के उत्पादन में बड़ा योगदान दे सकती है। एक ही बड़े ब्लॉक के अंतर्गत विभिन्न खनन क्षेत्रों को एकीकृत करने से संसाधनों के बेहतर उपयोग और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था का लाभ मिलने की उम्मीद है।

BCCL के CMD मनोज कुमार अग्रवाल ने परियोजना पर कहा कि E-Block कतरास, कुसुंडा और सिजुआ क्षेत्रों को एक साथ लाएगा और देश की कोकिंग कोयला आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर सृजित होने की बात भी कही।

E-Block परियोजना सिर्फ एक नई खनन परियोजना तक सीमित नहीं है। इसके क्रियान्वयन से कतरास–सिजुआ–कुसुंडा कोयला क्षेत्र के बड़े हिस्से के खनन ढांचे में बदलाव होगा। इसमें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, रोजगार सृजन, परिवहन एवं अन्य बुनियादी ढांचे का विकास तथा मौजूदा खनन इकाइयों का पुनर्गठन शामिल है।

27 वर्षों में 376 मिलियन टन उत्पादन के लक्ष्य के साथ E-Block BCCL की दीर्घकालिक खनन योजनाओं में एक प्रमुख परियोजना के रूप में सामने आया है। योजना के अनुसार क्रियान्वयन होने पर परियोजना से BCCL के कोकिंग कोयला उत्पादन आधार को मजबूत करने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास को भी गति मिलने की उम्मीद है।

विजय झा ने उठाए सवालः 18 किमी दायरे में आने वाले क्षेत्रों का हो व्यापक सर्वे, पुनर्वास स्थल पर स्कूल, अस्पताल, बाजार, बिजली-पानी समेत सभी सुविधाएं सुनिश्चित करने की मांग

प्रस्तावित मेगा कोयला परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और संभावित विस्थापन को लेकर सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) कराने की मांग तेज हो गई है। प्रख्यात समाजसेवी विजय झा ने कहा है कि किसी भी बड़े परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण से पहले प्रभावित क्षेत्र का व्यापक सामाजिक सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए, ताकि विस्थापन के बाद लोगों के सामने शिक्षा, रोजगार, आवास और बुनियादी सुविधाओं का संकट उत्पन्न न हो।

उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत सामाजिक प्रभाव आकलन की व्यवस्था है। उनके अनुसार प्रस्तावित परियोजना के दायरे में आने वाले क्षेत्रों में पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि वहां कितने परिवार, आवासीय एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठान, स्कूल, कॉलेज, बैंक, धार्मिक स्थल, बाजार, सामाजिक संस्थाएं, खेल मैदान, पार्क, श्मशान और कब्रिस्तान आदि मौजूद हैं।

विजय झा के अनुसार सामाजिक प्रभाव आकलन केवल परिवारों की संख्या तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें प्राथमिक से लेकर प्लस टू विद्यालय, कॉलेज, कोचिंग संस्थान, जन वितरण प्रणाली की दुकानें, खटाल, धार्मिक स्थल, सामाजिक संस्थाएं और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का भी विस्तृत सर्वे होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सर्वे के आधार पर प्रस्तावित पुनर्वास स्थल का पूरा खाका तैयार किया जाना चाहिए। विस्थापित परिवारों को जहां बसाया जाए, वहां स्कूल, बाजार, अस्पताल, थाना, सड़क, बिजली, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाएं पहले से सुनिश्चित हों।

स्थानीय प्रतिनिधियों को सर्वे में शामिल करने की मांग

विजय झा ने कहा कि सामाजिक प्रभाव आकलन के लिए गठित समिति में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भागीदारी होनी चाहिए। पंचायत क्षेत्र में पंचायत समिति के सदस्यों, जिला परिषद क्षेत्र में संबंधित प्रतिनिधियों तथा नगर निगम क्षेत्र में पार्षदों को समिति में शामिल किया जाना चाहिए। स्थानीय प्रतिनिधियों की भागीदारी से जमीनी स्थिति का बेहतर आकलन संभव होगा।

18 किलोमीटर के दायरे का हो ब्लू प्रिंट

प्रस्तावित मेगा प्रोजेक्ट के संदर्भ में विजय झा ने धनबाद के करीब 18 किलोमीटर के दायरे में आने वाले वार्ड संख्या एक से 13 तक के क्षेत्रों का व्यापक सामाजिक प्रभाव आकलन कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि स्थानीय प्रशासन को BCCL और नगर निगम के प्रतिनिधियों तथा वार्ड पार्षदों के सहयोग से क्षेत्र का सर्वे कराना चाहिए। उनके मुताबिक इस सर्वे का ब्लू प्रिंट सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि प्रभावित लोगों को यह स्पष्ट हो सके कि विस्थापन की स्थिति में उनके परिवार, बच्चों की शिक्षा और आजीविका की व्यवस्था किस प्रकार की जाएगी।

कतरास के 12 स्कूलों में 7,596 बच्चे, विजय झा ने उठाया सवाल

विजय झा ने बताया कि उन्होंने हाल में कतरास के पचगढ़ी बाजार क्षेत्र में एक सर्वे किया, जिसमें 12 स्कूलों में करीब 7,596 बच्चे अध्ययनरत पाए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि इस क्षेत्र का अधिग्रहण होता है और लोगों को विस्थापित किया जाता है, तो इन बच्चों की शिक्षा का क्या होगा।

उन्होंने कहा कि यह आंकड़ा केवल वार्ड संख्या तीन के एक छोटे हिस्से से संबंधित है। वार्ड एक से 13 तक के पूरे क्षेत्र का सर्वे कराया जाए तो यहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या काफी अधिक हो सकती है। उनके अनुसार इस क्षेत्र में करीब पांच लाख की आबादी रहती है और केंदुआ, करकेंद, कतरास, पांडेडीह, तेतुलमारी, सिजुआ, बांसजोड़ा और जोगता जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र परियोजना के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं।

पुनर्वास से पहले बिजली-पानी की जरूरत का आकलन जरूरी

झा ने कहा कि इतनी बड़ी आबादी के पुनर्वास के लिए केवल मकान उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। नई जगह पर कितने लोगों के लिए कितने घर चाहिए, कितने स्कूल और बाजार चाहिए, कितनी बिजली और पानी की आवश्यकता होगी, कितने बिजली उपकेंद्र स्थापित करने होंगे तथा पुलिस एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की कितनी जरूरत होगी—इन सभी का पहले से आकलन जरूरी है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा आबादी वर्षों में विकसित हुई है और यहां लोगों की जरूरतों के अनुरूप पूरा सामाजिक एवं आर्थिक ढांचा तैयार हो चुका है। ऐसे में बड़े पैमाने पर विस्थापन की स्थिति में नए स्थान पर समान स्तर का ढांचा विकसित करने में लंबा समय लग सकता है।

प्रदूषण को लेकर भी जताई चिंता

प्रस्तावित ओपनकास्ट खनन से पर्यावरण और प्रदूषण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी झा ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर ओपनकास्ट खनन और आउटसोर्सिंग गतिविधियां बढ़ने से क्षेत्र में प्रदूषण का दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने धनबाद में वायु प्रदूषण की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि बड़े पैमाने पर खुली खदानें संचालित होने पर लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। हालांकि उन्होंने प्रदूषण के वर्तमान स्तर और भविष्य के स्वास्थ्य प्रभावों के संबंध में विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

अंडरग्राउंड माइनिंग पर पुनर्विचार की मांग

विजय झा ने सरकार और कोल इंडिया से प्रस्तावित परियोजना की खनन पद्धति पर पुनर्विचार करने तथा अंडरग्राउंड माइनिंग को प्राथमिकता देने की मांग की। उन्होंने कहा कि धनबाद में लंबे समय से भूमिगत खनन का इतिहास रहा है और भविष्य की योजनाओं में भी इस विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि विकास और खनन के साथ-साथ धनबाद की आबादी, पर्यावरण, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संरचना की सुरक्षा भी सुनिश्चित करना जरूरी है। उनके अनुसार बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण से पहले प्रभावित क्षेत्रों का पारदर्शी सामाजिक प्रभाव आकलन और पुनर्वास का ठोस खाका सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि परियोजना से प्रभावित लोगों को अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता मिल सके।

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