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फिल्म “हनुमान अंश” ने फिल्मों की एक नई परिभाषा गढ़ दीः रवि शंकर पांडेय

रवि शंकर पांडेय डालटनगंज में रहते हैं। प्रख्यात साहित्यकार, कवि, लोकतंत्र सेनानी है। उनसे मेरी बराबर आत्मीय बातचीत होती रहती है। उनका हृदय बड़ा ही पवित्र है। खूब लिखते हैं। कुछ दिन ही पहले उनसे मेरी बातचीत हुई। बातचीत का केन्द्र था – फिल्म हनुमान अंश। उन्होंने कल ही इस फिल्म को सपत्नीक देखा है और इस फिल्म को लेकर अपने विचार सोशल साइट पर व्यक्त किए हैं। मेरा विचार है कि रवि शंकर पांडेय के मनोभाव को सभी को पढ़ना चाहिए। रवि शंकर पांडेय द्वारा लिखित मनोभाव इस प्रकार है…

“फिल्म “हनुमान अंश” की एक छोटी सी समीक्षा लिखने से पूर्व मैं अपने बारे में यह जानकारी देना चाहूंगा कि फिल्म दर्शक के रूप में मेरी आयु 64 साल की हो गई है। डालटनगंज के मोहन सिनेमा में सन् 1964 में मैंने जो पहली फिल्म देखी थी वह दारा सिंह और मुमताज की फिल्म थी सैमसंग। तब मोहन सिनेमा के सेकेण्ड क्लास के टिकट का दाम साढ़े तेरह आना था और बालकनी का एक रूपया बारह आना। हाल यदि हाऊस फुल हो जाता तो पूरा कलेक्शन पांच सौ रुपए के आस पास ही होता होगा और कल चार सौ अस्सी रुपए में मैंने दो टिकट लिए और अपनी पत्नी के साथ यह पूरी फिल्म देखी।

1964 से 2026 के बीच मेरी जो जीवन यात्रा रही उस यात्रा का एक अहम हिस्सा फिल्मों से भी जुड़ा रहा है। हजारों फिल्में देखी। स्कूल लाइफ में फिल्म देखने का एक ऐसा जुनून था कि जिस दिन फिल्म बदलती उसी दिन उस फिल्म को देख लेता था। इस क्रम में कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि स्कूल की फीस के पैसे से फिल्म देख ली और स्कूल से नाम कट गया। पिता जी को जब मालूम हुआ तो उन्होंने जम कर मेरी पिटाई कर दी और मैं घर से भाग कर मुंबई चला गया।

दो तीन दिन में लौट कर वापस भी आ गया। तथापि फिल्म देखने की रफ्तार कम नहीं हुई‌‌। फिल्म देखने की रफ्तार तब कम हुई जब छात्र आंदोलन से जुड़ा और जेल यात्रा का क्रम शुरू हुआ। आपातकाल में पूरे उन्नीस महीनों तक जेल में रहा। फिर रांची पटना और मुंबई। मुंबई में पंद्रह साल रहा। फिल्म जगत से जुड़ कर भी काम किया। मुंबई में फिर एक बार फिल्म देखने की रफ्तार बढ़ी। अमूमन प्रत्येक शनिवार और रविवार को फिल्म देख लेता था। परंतु इस पूरे फिल्म दर्शकीय यात्रा में कोई बीस पच्चीस फिल्मों को याद करता हूं। जिससे अत्यधिक प्रभावित हुआ।

जैसे गाइड, मदर इंडिया, गंगा जमुना, जिस देश में गंगा बहती है, दो बीघा जमीन, प्यासा, बागवां, अवतार इत्यादि। उनमें छठे दशक की एक फिल्म थी “चित्रलेखा”। उस फिल्म में अशोक कुमार प्रदीप कुमार मीना कुमारी और महमूद की अहम भूमिका थी। बाक्स आफिस पर यह पिटी हुई फिल्म थी। परंतु एक आम दर्शक की तरह मैं फिल्म देखने का अभ्यासी नहीं रहा कि भीड़ देख कर फिल्म देखी। महान फिल्मकार सत्यजित रे की हिंदी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी भी फ्लॉप फिल्मों की सूची में अव्वल रही है। तथापि वह फिल्म भी मेरी पसंदीदा फिल्मों में एक है। इसी नजरिए से मैंने फिल्म “हनुमान अंश” भी देखी।

छोटा बैनर। सभी कलाकार नये। फिल्म की प्रोड्यूसर अनुप्रिया नागर नई‌। निदेशक विशाल चतुर्वेदी भी नये। बाबा नीम करोली की अतुलनीय भूमिका निभाने वाले शोभिनव सत्या भी नये। डाक्टर रामनन्दन भोंसले की भूमिका निभाने वाले चंदन आनंद भी नये। महंतजी की भूमिका निभाने वाले अनिल रस्तोगी, रामदुलारी की भूमिका निभाने वाली पूर्णिमा तिवारी, छोटे महाराज का किरदार निभाने वाले (बाल कलाकार) विहान शोडगे, इंस्पेक्टर धर्म सिंह की भूमिका निभाने वाले गुलशन पांडे भी नये। बालीवुड के किसी चर्चित कलाकार का इसमें कहीं भी समावेश नहीं हुआ। संगीत साधु सुशील तिवारी की है वह भी चर्चित नाम नहीं।

कारण? फिल्म छोटे बजट की थी। मात्र दो करोड़ के बजट की। इतना तो किसी बड़े बैनर की फिल्म के एक गीत को फिल्माने में लग जाते हैं। तथापि इस फिल्म ने मंथर गति से चलना शुरू किया और बाद में गरुड़ गति को प्राप्त कर लिया। तो क्या यह हनुमान जी कृपा थी? यद्यपि मैं नियमित हनुमान चालीसा का पाठ करता हूं। तथापि यह मानने को तैयार नहीं कि फिल्म चलाने में हनुमान जी ने कोई कृपा की होगी। तब दूसरा कारण? फिल्म Ambition के तहत नहीं Mission के तहत बनी। मिशन अर्थात एक पवित्र एवं बहुआयामी लक्ष्य को सामने रख कर। बगैर किसी लाग लपेट के मैं बिंदास कह सकता हूं कि फिल्में युवा मानस को बुरी तरह प्रभावित करती है।

यह हास्यास्पद है कि युवा पीढ़ी में से कोई अमिताभ बच्चन का फैन हैं तो कोई शाहरुख और सलमान का‌‌। कोई दीपिका पादुकोण का तो कोई माधुरी दीक्षित का। हिंसा, बलात्कार, चोरी, डकैती, अपहरण, नशाखोरी आदि की ट्रेनिंग देने में भी फिल्मों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिसका भुक्तभोगी आज का पूरा समाज है। तब सवाल यह भी कि फिल्म मेकर ऐसी फिल्मे क्यों बनाते हैं? क्यों कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग ऐसी ही फिल्म देखना चाहता है। तब सवाल यह भी कि दर्शक हिंसा एवं अश्लीलता से ओतप्रोत फिल्में क्यों देखना चाहता है? क्योंकि ड्रग्स की तरह उसे फार्मूला फिल्मों की आदत लग गई है, जिससे वह स्वयं नहीं निकल सकता।

स्वस्थ एवं गहराई के साथ मानव मनोविज्ञान को प्रभावित करने वाली फिल्में ही वर्षों से बहती चली आ रही धारा को मोड़ सकती है। एक नई दिशा दे सकती है। “हनुमान अंश” उसी दिशा में किया गया जोखिम भरा एक लघु प्रयास है। जोखिम भरा इसलिए क्योंकि प्रोड्यूसर ने हनुमान जी के प्रति आस्थावान हो कर यह रिस्क ले लिया। हनुमान जी को कलियुग का जाग्रत देवता माना जाता है। जो बिना बुलाए रामकथा में पहुंच जाते हैं। सो टीम “हनुमान अंश” के बीच भी वे पहुंच गए होंगे। ऐसा माना जा सकता है। तभी तो दो करोड़ की लागत वाली फिल्म ने तीन सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस कर लिया है। इसने मुंबईया फिल्म की पूरी परिभाषा ही बदल दी है‌।

आश्चर्य नहीं, कि आने वाले दिनों में धार्मिक फिल्मों की बाढ़ आ जाये। तो क्या उन फिल्मों की भी ऐसी ही सार्थक परिणति होगी? आवश्यक नहीं। टीम हनुमान अंश की तरह भाव भी शुद्ध होना चाहिए। धार्मिक फिल्मों में भी मैंने कतिपय दृश्यों में फूहड़ता देखी है, जो इस फिल्म में नहीं।‌ इसने सनातनवाद, साधकवाद और संतवाद की एक नई परिभाषा गढ़ी है, जिसने दर्शकों के एक बड़े वर्ग के मानस का प्रभावित किया। मैंने देखा कि लोग न केवल परिवार के साथ इस फिल्म को देखने आए अपितु परिवार की चार पीढ़ियों (दादा-दादी, पोता-पोती, भाई बहन, सास-बहू और गोद का बालक भी) के साथ फिल्मी पंडाल (क्षमा करें हाल लिखना भूल गया) में समवेत हो गये।

फिल्म की यह एक नई परिभाषा है। कई बार ऐसा हुआ है कि मैं पत्नी के साथ फिल्म देखने तो चला गया। परन्तु हाल में कई बार असहज होने की स्थिति बनी। मैं नहीं कहता कि भारत की पूरी आबादी रामभक्त हो जाय। मगर उसे राष्ट्रभक्त अवश्य होना चाहिए। राम का अर्थ क्या है? रा यानी राष्ट्र शक्ति और म मतलब मातृशक्ति। हनुमान ने जो कहा कि – राम काज कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम। प्रकारान्तर से उसके गहरे अर्थ का गहरा भाव है। भक्ति, शक्ति, श्रद्धा, संस्कृति ये सभी मातृरूप हैं और सनातन के पोषक हैं। आज नई पीढ़ी के मानस को नया दिशा बोध देना होगा। उनके मानस को प्रक्षालित करना होगा। सिनेमा की भी इस सांस्कृतिक चेतना में महती भूमिका हो सकती है। इस लिहाज से फिल्म “हनुमान अंश” एक अभिनव फिल्मी क्रांति है।

और, इसी क्रम में मैं मस्त मौला पत्रकार कृष्ण बिहारी मिश्र को मैं साधुवाद देना चाहूंगा। जिन्होंने मुझे फोन करके फिल्म हनुमान अंश देखने के लिए प्रेरित किया। हालांकि मेरी श्रीमतीजी जब से मोहन सिनेमा में फिल्म लगी तभी से टिकट बुक करवाने का आग्रह कर रही थी। परंतु कृष्ण बिहारी मिश्र ने मुझे फिल्म देखने के लिए बाध्य कर दिया ‌‌। कहां कल ही टिकट बुक करवा लीजिए और मैं उस फक्कड़ के आग्रह को टाल नहीं सका‌। मैं चाहूंगा कि हमारे शहर के लोग पूरे परिवार के साथ इस फिल्म को देखें।”

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