राजनीति

नेता प्रतिपक्ष के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी ने पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता के खिलाफ फिर दागा गोला, कहा मदद माँगते समय के आँसू किसी के चरित्र का प्रमाण नहीं होते

झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री और वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी इन दिनों पूरे फॉर्म में हैं। रह-रहकर वे सोशल साइट के माध्यम से पूर्व पुलिस महानिदेशक अनुराग गुप्ता के खिलाफ गोले दागे जा रहे हैं। आज भी उन्होंने सोशल साइट पर एक गोला दागा है।

उस गोले में क्या है, उसे बिना पढ़े आप नहीं समझ सकते। लेकिन बातों ही बातों में इतना तो जरुर समझ आ जाता है कि इस बार उन्होंने पूर्व पुलिस महानिदेशक अनुराग गुप्ता के चरित्र पर ही धावा बोल दिया है। इस दौरान उन्होंने कई लोगों के नाम भी उजागर किये हैं। आखिर उन्होंने क्या लिखा हैं, लीजिये आप खुद पढ़िये…

‘मदद माँगते समय के आँसू किसी के चरित्र का प्रमाण नहीं होते। असली पहचान तब होती है, जब संकट टल जाता है और मददगार की ज़रूरत खत्म हो जाती है। बात उन दिनों की है, जब झारखंड के बेहद चर्चित और विवादों से घिरे आईपीएस अधिकारी अनुराग गुप्ता को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी ने निलंबित कर रखा था। उन पर विभागीय कार्रवाई चल रही थी, जिसका संचालन वरिष्ठ आईपीएस एमवी राव जी कर रहे थे। मेरी जानकारी के अनुसार, यह कार्रवाई बाबूलाल मरांडी जी की शिकायत के सिलसिले में शुरू हुई थी।

एक रात करीब दस बजे मेरे एक छोटे भाई समान व्यक्ति का फेसटाइम पर कॉल आया। उधर से कहा गया—“भैया, लीजिए, ज़रा इनकी बात सुन लीजिए और भगवान के लिए मदद करवा दीजिए।” फिर उन्होंने जिस व्यक्ति को फ़ोन दिया, वह मुझसे गिड़गिड़ाते हुए कहने लगा—“दया कीजिए हम पर। मेरी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं है। बहुत कष्ट में हूँ।”

भगवान के नाम पर मदद की गुहार लगाते हुए उन्होंने जो पारिवारिक मजबूरी बताई, उसे यहाँ सार्वजनिक करने की इजाज़त मेरा ज़मीर आज भी नहीं देता। किसी की निजी पीड़ा को उसके विरुद्ध हथियार बनाना मेरे संस्कार नहीं हैं। लेकिन उस बातचीत की जानकारी मेरे अलावा स्वयं उन्हें, उस व्यक्ति को जिसके मोबाइल से बात हुई, और बाद में बाबूलाल मरांडी जी तथा एमवी राव जी को भी थी।

मुझसे भगवान के नाम पर दया और मदद की गुहार लगाने वाले वह व्यक्ति कोई और नहीं, अनुराग गुप्ता थे। मुझे बताया गया कि एमवी राव जी ने उन्हें स्पष्ट कर दिया था कि नियमानुसार मुख्य शिकायतकर्ता बाबूलाल मरांडी जी का पक्ष लिए बिना विभागीय कार्रवाई पूरी नहीं की जा सकती।

अगले दिन मैंने बाबूलाल मरांडी जी से बात की। अपनी आदत के अनुसार पिछली रात की बातचीत और पूरा घटनाक्रम उन्हें शब्दशः बता दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी अधिकारी से उनकी कोई निजी शिकायत न है और न शायद कभी आगे रहेगी। मैंने यह बात एमवी राव जी को बताई। उन्होंने कहा कि जाँच संचालन पदाधिकारी के रूप में वे मरांडी जी की मूल शिकायत के संबंध में उनका पक्ष लेना चाहेंगे।

मैं उस समय नहीं चाहता था कि यह प्रसंग सार्वजनिक हो और करीब दो वर्षों से निलंबन झेल रहे किसी अधिकारी की और बेइज़्ज़ती या जगहँसाई हो। एमवी राव जी भी मेरी इस सोच से सहमत थे। इसके बाद राव जी ने मरांडी जी के नाम इस विषय में बयान देने का एक अनुरोध पत्र तैयार किया। उस पत्र का उचित और तथ्यपरक जवाब मैंने मरांडी जी के निर्देश तथा उनके बताए अनुसार तैयार किया।

उसमें उनकी ओर से कहा गया कि रोज़ मिलने वाले लोगों में से कुछ लोगों ने उन्हें जो सीडी उपलब्ध कराई थी, उसे उन्होंने शिकायत पत्र के साथ चुनाव आयोग को भेज दिया था। इससे अधिक उनके पास कहने को कुछ नहीं था। यह पूरा प्रसंग गोपनीय रहे, इसलिए एक रात एमवी राव जी मेरी गाड़ी से, मेरे ड्राइवर के साथ, मरांडी जी के यहाँ गए और संबंधित कागज़ी कार्रवाई पूरी हुई।

इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी मेरे अलावा मरांडी जी, एमवी राव जी, गुप्ता जी और मेरे उस छोटे भाई समान करीबी को थी, जिसने गुप्ता जी तक यह मदद पहुँचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह प्रसंग मैं इसलिए बता रहा हूँ कि किसी की मजबूरी पर की गई मदद और उसके आचरण पर दिया गया चरित्र प्रमाणपत्र—दो अलग बातें हैं। हमने मानवीय संवेदना दिखाई थी; भविष्य के हर आचरण का समर्थन नहीं किया था।

बाद में गुप्ता जी निलंबन मुक्त हुए। मेरी समझ में, विभागीय प्रक्रिया पूरी कराने में इस पहल ने उनकी सहायता की थी। लेकिन उसके बाद उनका जो व्यवहार मैंने देखा, उसने मदद के उस पूरे अनुभव को कड़वा बना दिया। उन्होंने दूसरे तो दूसरे मेरे उस छोटे भाई समान करीबी के साथ भी विश्वासघात किया, जिसने संकट के समय उनकी मदद कराने के लिए सबसे अधिक प्रयास किया था। गुप्ता जी ने उस मददगार की पीठ में बिना वजह आदतन ऐसा छुरा घोंपा कि वो शायद मरते दम तक वो सदमा नहीं भूल पाये।

जिस व्यक्ति ने उनकी परेशानी को अपनी परेशानी समझा, जिसके आग्रह पर मैंने बात सुनी और आगे पहल की, उसी के प्रति उनका बाद का आचरण मेरे लिए सबसे अधिक पीड़ादायक था। संकट में हाथ जोड़ना आसान है; संकट बीतने के बाद उस हाथ की मर्यादा रखना चरित्र की परीक्षा है। उपकार चुकाना हर किसी के बस में नहीं होता, लेकिन उपकार करने वाले के साथ विश्वासघात न करना तो न्यूनतम इंसानियत है।

उनके उस व्यवहार को देखकर मुझे जयचंद और मीरजाफर जैसे नामों से जुड़ा विश्वासघात याद आया। यह मेरे अनुभव से उपजी पीड़ा और मेरे आकलन की अभिव्यक्ति है। मैं यहाँ अपने अनुभवों में से एक प्रसंग रख रहा हूँ, ताकि लोग सुनें, समझें और स्वयं निर्णय करें कि संकट के समय दिखाई गई विनम्रता तथा संकट बीतने के बाद के आचरण में कितना अंतर हो सकता है। मेरे लिए यह अनुभव “भेड़ की खाल में भेड़िया” वाली कहावत की याद दिलाने वाला था।

जब गुप्ता जी निलंबित थे, तब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी समेत किन लोगों के बारे में क्या बातें करते थे? जिन लोगों ने उन्हें पहले तवज्जो दी थी, उनके बारे में कैसी भाषा इस्तेमाल करते थे? क्या-क्या ऐसी बातें, षड्यंत्र और गतिविधियाँ थीं, जिन्हें मैंने साज़िशपूर्ण माना? इनमें से कई प्रसंग मेरे सामने के हैं। उनका मैं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। इसलिए मेरी बात केवल सुनी-सुनाई चर्चा पर आधारित नहीं है।

पद मिल जाने से पुराना आचरण मिट नहीं जाता और कुर्सी लौट आने से चरित्र को नई शुरुआत का प्रमाणपत्र नहीं मिल जाता। जिन लोगों ने मुश्किल समय देखा है, उन्हें सबसे पहले अपनी उस मुश्किल और उसमें साथ देने वालों को याद रखना चाहिए। आज सीआईडी जाँच को गलत दिशा में ले जाने, झारखंड के छात्रों-बेरोज़गारों के साथ अन्याय करने और मामला उजागर करने वाले मस्ताना को ही गिरफ्तार कर जेल भेजकर जाँच रफ़ा दफ़ा करने के जो आरोप उठ रहे हैं, उनकी निष्पक्ष जाँच और स्पष्ट जवाब आवश्यक हैं। मेरे निजी अनुभव इन आरोपों का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन उनके आचरण को लेकर मेरी गंभीर आशंकाओं की वजह अवश्य हैं।

छात्रों का भविष्य किसी अधिकारी की सुविधा, किसी सत्ता की प्रतिष्ठा या किसी के निजी हित से छोटा नहीं है। यदि जाँच को भटकाया गया है, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि सच सामने लाने वाले को ही निशाना बनाया गया है, तो उसकी भी स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। इस पूरे प्रसंग का सबक साफ़ है—किसी की मजबूरी देखकर मदद कीजिए।

लेकिन उसके आँसुओं को ईमानदारी का प्रमाण मत मान लीजिए। भरोसा उसकी गुहार पर नहीं, संकट टलने के बाद उसके व्यवहार पर कीजिए और मदद पाकर मुकर जाने वालों के लिए नसीहत—जिस दिन कुर्सी का सहारा छूटता है, उसी दिन याद आता है कि अपने आचरण से कितने दरवाज़े खुद बंद कर आए हैं। आज बस इतना ही। किस्से अभी कई हैं….आगे फिर कभी…’

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