बिना एकेडमिक कौंसिल, बिना सीनेट, बिना सिंडिकेट से पारित कराये और बिना राज्यपाल के हस्ताक्षर के ही, राज्यपाल के ही हाथों रांची विश्वविद्यालय ने दो व्यक्तियों को मानद उपाधि थमा दी
रांची विश्वविद्यालय का कल यानी बुधवार को 39वां दीक्षांत समारोह था। जो ऐतिहासिक रहा। ऐतिहासिक इसलिए कि इस दीक्षांत समारोह में दो विशिष्ट अतिथियों को रांची विश्वविद्यालय ने मानद उपाधि दे दी। ये महानुभाव थे – आईआईएम कोलकाता के निदेशक प्रो. आलोक राय और दूसरी थी राष्ट्रीय शेक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान की कुलपति डा. शशिकला वंजारी।
बताया जा रहा है कि इन दोनों महानुभावों को बिना राज्यपाल के हस्ताक्षर के ही राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार के हाथों मानद उपाधि थमा दी गई। सूत्र तो यह भी बता रहे है कि रांची विश्वविद्यालय ने इन्हें मानद उपाधि देने में विश्वविद्यालय एक्ट 2026 के नये नियमों की भी अवहेलना कर दी गई। नियम में यह प्रावधान है कि बिना एकेडमिक कौंसिल, सीनेट और सिंडिकेट से पास कराये आप किसी को मानद उपाधि नहीं दे सकते।
लेकिन इन दोनों महानुभावों को मानद उपाधि देने में इस एक्ट की भी अवहेलना की गई। सूत्र बता रहे है कि मानद उपाधि देने के पूर्व न तो एकेडमिक कौंसिल, न ही सिंडिकेट से इसे पारित कराया गया और रही बात सीनेट की तो सीनेट की बैठक आज तक नहीं हुई, ऐसे में सीनेट से पास कराने का तो सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में इन महानुभावों को दिये गये मानद उपाधि पर सवाल उठने शुरु हो गये हैं।
सवाल तो रांची विश्वविद्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह पर भी उठ रहे हैं कि आखिर बिना नियमों के पालन कराये मानद उपाधि कैसे दे दी गई और लेनेवाले बिना राज्यपाल के हस्ताक्षर के उसे स्वीकार कैसे कर लिये। सूत्र तो ये भी बता रहे है कि जब आयोजकों को अपनी गलती का पता चला तो मंच पर ही वे राज्यपाल से हस्ताक्षर करने का आग्रह किया। लेकिन राज्यपाल ने उक्त आग्रह को अस्वीकार कर दिया।
