नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी का अनुराग गुप्ता पर हमला जारी, परत दर परत खुल रहे पूर्व पुलिस महानिदेशक के कार्य प्रणाली से लोग हो रहे दो-चार
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी का पूर्व महानिदेशक अनुराग गुप्ता पर हमला जारी है। एक से एक कहानी सामने आ रही है। लोग इन कहानियों में रुचि ले रहे हैं। रुचि लेने का कारण है ही ऐसा क्योंकि बात किसी सामान्य अधिकारी की नहीं हो रही। एक पुलिस महानिदेशक पद से अवकाश प्राप्त हो चुके एक ऐसे पुलिस अधिकारी की है, कि सत्ता किसी की रही, उसने सत्ता का रसास्वादन हमेशा किया।
सुनील तिवारी का कहना है कि उनका हमला जारी रहेगा। एक्स हैंडल पर वे लिखना जारी रखेंगे वे इस बार चुप रहनेवाले नहीं। कहानियां अनेक है। धीरे-धीरे उनकी कड़ियां प्रसारित होगी। आज दो कड़ियां जनता के बीच उन्होंने रख दी है। लोगों को जानना चाहिए कि झारखण्ड में बड़े पदों पर बैठे पुलिस अधिकारी किसके लिए काम कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं और उसका परिणाम जनता कैसे भुगत रही है। सुनील तिवारी ने आज एक्स हैंडल पर जो लिखा, वो इस प्रकार है…
“कहा जाता है कि अपराधी नेचर का आदमी जब एक बार अपराध करके “4P” (पद, पावर, पहुँच और पैसे) के दम पर बच निकलता है, तो वह फिर आदतन बार-बार अपराध करता रहता है। कुछ ऐसी ही कहानी है झारखंड DGP पद तक पहुँचने वाले रिटायर्ड IPS अनुराग गुप्ता की। अमूमन रिटायर हो जाने के बाद किसी अधिकारी के पिछले कामकाज की चर्चा नहीं होती। पर झारखंड में हुए JSSC की परीक्षाओं के घोटाले में पहले की CID जाँच (जो अनुराग गुप्ता ने की थी) में घोटाला नहीं होने की बात सामने आई।
फिर जब दिल्ली की तर्ज़ पर झारखंड में भी ZEN-G का अभूतपूर्व ऐतिहासिक आंदोलन हुआ, तो CID की जाँच की दिशा ही बदल गई। यह बात सामने आने लगी कि घोटाला तो हुआ, पर अनुराग गुप्ता ने ग़लत जाँच कर हाईकोर्ट तक को गुमराह कर दिया। छात्रों-बेरोज़गारों के साथ अन्याय किया गया। अब जब ताबड़तोड़ गिरफ्तारियाँ होने लगीं, यह बात सामने आ गई कि नियुक्ति में बड़े पैमाने पर पैसे का लेन-देन कर नौकरियाँ बेच दी गई थीं, तो गुप्ता जी का इस बारे में दिया गया यह पिछला बयान फिर से वायरल होने लगा और ये आज सबसे बड़े विलेन के रूप में छात्रों, बेरोज़गारों और आम लोगों के निशाने पर आ गए हैं।
अब तो इनकी भी गिरफ्तारी की माँग हो रही है। पर गुप्ता जी के पूरे सेवाकाल में एक के बाद एक कारगुज़ारियाँ जानने वाले अफ़सरों का मानना है कि ये काम करना झारखंड की पुलिस या CID के बूते से बाहर जान पड़ता है। हालाँकि गुप्ता जी की कारगुज़ारी के ज़माने में गूगल के सर्च पन्नों का बोलबाला नहीं था। फिर भी इनके बारे में काले कारनामों के अनगिनत चर्चे मिल जाएँगे। इन्हें पैंतीस सालों से जानने वाले इनके समकक्ष के एक अधिकारी ने अपने अनुभवों का हवाला देते हुए बताया कि शातिर दिमाग़ के गुप्ता जी का शायद ही ऐसा कोई सगा होगा, जिसके साथ उन्होंने दगा नहीं किया होगा।
लेकिन IPS की नौकरी में आने के शुरुआती दिनों में इन्हें अपराध करने और उससे बच निकलने का स्वाद चखने का मज़ा मिल गया, तो ये आदतन बार-बार ग़लत काम करने और जुगाड़ लगाकर बच निकलने के एक्सपर्ट हो गए। आज हम इनके द्वारा एक अपराधी को साँप से कटवाने के आरोप वाले मामले की नीचे चर्चा कर रहे है। क़िस्से और भी हैं, जिन्हें हम समय-समय पर सामने लाने का काम करते रहेंगे, ताकि लोगों को यह पता चले कि अगर वर्दी पहनने वाला व्यक्ति ही अपराध करने-कराने लगे, तो वह समाज को कितना नुक़सान पहुँचा सकता है?
और यहीं से आने वाली पीढ़ी, खासकर प्रशासनिक और पुलिस सेवा में जाने वाले नौजवानों के लिए सबसे बड़ा सबक शुरू होता है। कुर्सी कितनी भी बड़ी हो, एक दिन छूटती जरूर है। वर्दी उतरती है, पद चला जाता है, पावर खत्म होती है, पहुँच कमजोर पड़ती है और पैसे की ताकत भी हर जगह काम नहीं आती। उसके बाद आदमी के साथ केवल उसके कर्मों का इतिहास चलता है। इसलिए “4P” के नशे में कभी यह भ्रम मत पालिए कि आज बच गए तो हमेशा बचते रहेंगे। व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाकर बच निकलना निर्दोष होने का प्रमाण नहीं होता और न ही ताकत के दम पर दबा दिया गया सवाल हमेशा के लिए मर जाता है।
नई पीढ़ी याद रखे कि वर्दी ताकत दिखाने का लाइसेंस नहीं, जनता द्वारा सौंपा गया विश्वास है। कुर्सी किसी की जागीर नहीं, कुछ समय के लिए मिली जिम्मेदारी है। गलत काम करके बच निकलने की पहली सफलता पर खुश होने के बजाय डरना चाहिए, क्योंकि वही सफलता आदमी के भीतर अगले गलत काम का दुस्साहस पैदा करती है। धीरे-धीरे उसे लगने लगता है कि कानून दूसरों के लिए है और वह स्वयं कानून से ऊपर है। यहीं से पतन शुरू होता है। पद पर रहते हुए आदमी दूसरों का हिसाब लिख सकता है, लेकिन समय ऐसा मुंशी है जो एक दिन उसका अपना हिसाब भी खोल देता है। इसलिए आने वाली पीढ़ियाँ ऐसे तमाम प्रकरणों को केवल किसी अधिकारी की कहानी समझकर न पढ़ें, बल्कि इसे चेतावनी समझेंः- पद चला जाएगा।
पावर चली जाएगी। पहुँच खत्म हो जाएगी। पैसा भी साथ नहीं जाएगा। लेकिन कर्मों की कहानी पीछे रह जाएगी। और अंततः आदमी की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह कितनी बड़ी कुर्सी तक पहुँचा था, बल्कि इससे होती है कि कुर्सी से उतरने के बाद लोग उसे सम्मान से याद करते हैं या उसके कारनामों के उदाहरण देकर उसके नाम पर थूकते हैं और अगली पीढ़ी को नसीहत देते हैं। समय की अदालत में “4P” की पैरवी नहीं चलती है, वहाँ आखिर में फैसला कर्म ही सुनाते हैं।”
सुनील तिवारी आगे लिखते हैं कि “शुक्र मनाइये कि गुप्ता जी ने जाँच को “खा-पका जाने” के चक्कर में मस्ताना तो मस्ताना सत्तासीन हस्तियों को ही जेल नहीं भेज दिया! इसे भी उनकी बड़ी मेहरबानी मानिये उन लोगों पर, जिन्होंने इनके पूरे सेवाकाल से जुड़े विवादों और पुराने इतिहास को जानते-बूझते हुए भी इन्हें बार-बार ऊँचे, ताकतवर और महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया। और मैं यह बात किसी चौराहे की गप, सुनी-सुनाई कहानी या केवल अख़बार पढ़कर नहीं कह रहा। पत्रकारिता और उसके बाद राजनीतिक सलाहकार की भूमिका में मेरे और गुप्ता जी के बीच ऐसे अनेक प्रसंग रहे हैं, जिनका मैं स्वयं साक्षी अथवा प्रत्यक्ष जानकार रहा हूँ।
उन्हीं वर्षों के अनुभव और प्रसंगों के आधार पर मेरी यह राय बनी है। कभी अवसर मिला तो उन प्रसंगों पर भी विस्तार से लिखूँगा। मेरा अनुभव तो यही कहता है कि यदि इनका बस चलता और कथित “वाजिब मेहनताना” मिल जाता, तो मस्ताना की कौन कहे, साज़िश और षड्यंत्र का ऐसा ताना-बाना बुना जा सकता था कि कहानी सुनकर लोग दाँतों तले उँगली दबा लें! असल नसीहत उन सत्ताधीशों के लिए है जो किसी व्यक्ति का अतीत और कार्यशैली जानते हुए भी उसे ताकत की कुर्सी सौंपते हैं और फिर उसी ताकत का स्वाद चखने पर हैरान होते हैं।
डूबते बिच्छू को हथेली देकर बचाना इंसानियत है, लेकिन उसका स्वभाव जानते हुए बार-बार अपनी हथेली पर बैठाना नादानी। बिच्छू तो अपने स्वभाव से डंक मारेगा ही। सवाल बिच्छू से ज्यादा उस हाथ का है, जिसने सब जानते हुए उसे हथेली पर जगह दी। सत्ता के लिए ये सबक है कि गलत आदमी को ताकत देना आसान है, लेकिन उस ताकत का डंक किसे और कब लगेगा, यह तय करना फिर आपके हाथ में नहीं रहता।”
