कहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष “मीडिया-चस्का सिंड्रोम” के शिकार तो नहीं, क्योंकि कल उनके द्वारा किया गया कार्य “मीडिया-प्यास” का चरम उदाहरण
कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति को उसकी हैसियत, योग्यता और जनसमर्थन से कई गुना बड़ा पद थमा दिया जाता है, तो वह सिर्फ उतावला नहीं होता—धीरे-धीरे खुद को ब्रह्मांड का केंद्र समझने लगता है। झारखंड भाजपा अध्यक्ष आदित्य साहू का हाल देखकर लगता है कि यह कहावत शायद उन्हीं के इंतज़ार में लिखी गई थी।
महज करीब 2500 वोट लाकर चुनाव हारने वाले व्यक्ति को सीधे प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी मिल जाए, तो भला मन में यह गलतफहमी क्यों न जन्म ले कि अब मुख्यमंत्री की कुर्सी भी बस दो कदम दूर है! सुना जा रहा है कि मुख्यमंत्री बनने की इसी कथित “रणनीति” के सिलसिले में हजारीबाग के किसी एस्ट्रोलॉजर तक भी पहुँच गए।
अब ज्योतिषी ने क्या बताया, यह तो वही जानें, लेकिन शायद कुछ ऐसा कहा होगा— “बेटा, कुंडली में मुख्यमंत्री बनने का योग ढूँढना पड़ेगा… तब तक मीडिया में बने रहो, बयान देते रहो और सुर्खियों को ही जनसमर्थन समझते रहो!” शायद यही कारण रहा होगा कि कल की घटना तो इस “मीडिया-प्यास” का चरम उदाहरण बन गई।
विधायक जनार्दन पासवान के बेटे से जुड़े कॉलेज विवाद की पूरी सच्चाई सामने आने से पहले ही आदित्य साहू कथित अपहरण का दावा करते हुए वीडियो स्टेटमेंट और प्रेस रिलीज़ लेकर मैदान में कूद पड़े। न पूरी जाँच, न पर्याप्त पुष्टि—बस कैमरा दिखा और बयान हाज़िर! बाद में जब मामला कुछ और निकलने की बातें सामने आईं, तो सवाल उठना स्वाभाविक था—आखिर इतनी जल्दी किस बात की थी?
लगता है इन दिनों एक नई राजनीतिक बीमारी तेजी से फैल रही है—“मीडिया-चस्का सिंड्रोम”। इस बीमारी का पहला लक्षण है—रोज अखबार में नाम चाहिए। दूसरा—कैमरा देखते ही बयान निकल पड़ता है। तीसरा—हर घटना में सबसे पहले अपना चेहरा दिखना चाहिए। और अंतिम चरण में नेता को भ्रम होने लगता है कि अखबार की कटिंग जमा करते-करते एक दिन राष्ट्रीय नेता और फिर मुख्यमंत्री बन जाएगा!
लेकिन राजनीति का पुराना नियम है—अखबार में जगह खरीदी या बनाई जा सकती है, जनता के दिल में नहीं। आदित्य साहू फिलहाल इसी “मीडिया-चस्के” के गंभीर चरण में दिखाई पड़ रहे हैं। खुद को सुर्खियों में बनाए रखने के लिए आए दिन नए-नए फरमान चर्चा में हैं। पहले प्रवक्ताओं की जंबो कमिटी बना दी गई। इतनी बड़ी कि शायद प्रवक्ता खुद एक-दूसरे को पहचानने में ही आधा कार्यकाल निकाल दें!
फिर कथित तौर पर फरमान—“जिस दिन प्रदेश अध्यक्ष प्रेस कॉन्फ्रेंस करें, उस दिन कोई प्रवक्ता बयान नहीं देगा।” वाह! लोकतांत्रिक संगठन में मीडिया मैनेजमेंट का क्या अद्भुत मॉडल है! मतलब अध्यक्ष जी बोलें तो बाकी सब “मौन-व्रत” धारण कर लें। शायद डर यह हो कि कहीं कोई प्रवक्ता उनसे ज्यादा तथ्यपूर्ण, ज्यादा समझदार या ज्यादा असरदार बयान न दे बैठे और अगले दिन अखबार में तस्वीर थोड़ी छोटी न छप जाए!
अब चर्चा यह भी है कि अपने कुछ खास समर्थकों और हाँ-में-हाँ मिलाने वालों को प्रवक्ता बनाकर सूची और लंबी करने की तैयारी है। दूसरी तरफ प्रवक्ताओं को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से रोकने जैसी बातें सामने आ रही हैं। यानी पद प्रवक्ता का रहेगा, काम शायद तालियाँ बजाने का!
भाजपा IT सेल के इनचार्ज राहुल अवस्थी ने सुदीव्य सोनी के संदर्भ में जो आपत्तिजनक और बेतुका बयान दिया, उसके बाद उन्हें हटाने की तैयारी की चर्चा हुई। यदि गलत बयान और पार्टी की फजीहत पद से हटाने का पैमाना है, तो यही पैमाना ऊपर से नीचे तक समान रूप से लागू होना चाहिए।
क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष के हिस्से में भी विवादों और जल्दबाजी वाले बयानों की सूची छोटी नहीं बताई जा रही—कभी हजारीबाग की घटना पर अतिरंजित बयान, कभी आंदोलन का ऐलान और दो दिन बाद वापसी, कभी बिना पूरी पुष्टि के सनसनीखेज दावा। राजनीति में उत्साह अच्छी चीज है, लेकिन अति-उत्साह अक्सर आत्मघाती गोल करवा देता है।
अब तो राजनीतिक गलियारों में मजाक-मजाक में यह चर्चा भी सुनाई पड़ने लगी है कि कहीं JMM की कोई लॉबी मन ही मन यह दुआ तो नहीं कर रही— “हे प्रभु! भाजपा चाहे जो बदल दे, प्रदेश अध्यक्ष मत बदलना!” क्योंकि विपक्ष के लिए इससे सुविधाजनक स्थिति और क्या होगी कि उसका राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अपनी ही गलतियों, अधकचरे बयानों और मीडिया-स्टंट से खुद अपनी पार्टी की फजीहत करवाता रहे!
ऐसी स्थिति में विपक्ष को रणनीति बनाने की जरूरत ही क्या है? आराम से बैठिए, चाय पीजिए और अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार कीजिए! नसीहत बस इतनी-सी है— कुर्सी बड़ी मिलने से आदमी बड़ा नहीं हो जाता। अखबार में रोज फोटो छपने से जनाधार नहीं बनता। कैमरे के सामने रोज बोलने से नेतृत्व सिद्ध नहीं होता और ज्योतिषी की कुंडली में “राजयोग” निकल भी आए, तो जनता की कुंडली में नाम होना ज्यादा जरूरी है।
राजनीति में पद संयोग से मिल सकता है, लेकिन कद केवल योग्यता, संयम, समझदारी और जनसमर्थन से बनता है। वरना आदमी मुख्यमंत्री बनने का सपना देखते-देखते कब अपनी ही पार्टी के लिए विपक्ष का सबसे उपयोगी “अप्रत्यक्ष सहयोगी” बन जाता है—उसे खुद पता भी नहीं चलता! इसलिए अध्यक्ष जी, कैमरे से थोड़ा कम और जमीन से थोड़ा ज्यादा प्रेम कीजिए। राजनीति में फ्लैश की चमक कुछ सेकंड की होती है। लेकिन गलत बयान और गलत फैसले का दाग बहुत दिनों तक दिखाई देता है।
