अपनी बात

ये हैं रांची के पत्रकार, जो राज्यपाल से लगाते हैं गुहार, दे दीजिये हमें भी लाइसेंसी हथियार

शायद रांची के पत्रकारों को कलम-पेन्सिल, लैपटॉप-कम्प्यूटर, पुस्तक-पुस्तिकाओं, कैमरा-बूम आदि से मन भर गया है। अब उन्हें पिस्तौल व रिवॉल्वर भी चाहिए। तभी तो आज लोक भवन में जाकर पत्रकारों के कल्याण के नाम पर बनी एक संस्था वाइस ऑफ जर्नलिस्टस ने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मिलकर गुहार लगाई कि उन्हें आत्मरक्षा के लिए वैध शस्त्र चाहिए और इसके लिए यानी वैध शस्त्र लाइसेंस की प्रक्रिया को सरल एवं पारदर्शी बनाया जाये।

पत्रकारों के इस मांग को देख राज्यपाल और लोकभवन में कार्य करनेवाले बड़े-बड़े पदाधिकारियों के मन-मस्तिष्क में हलचल पैदा हो गई। वे सोचने लगे कि भला पत्रकारों को कब से पिस्तौल-रिवाल्वर की जरुरत पड़ गई? कुछ विद्वत जनों से जब विद्रोही24 ने बातचीत की तब उनका कहना था कि पत्रकार, अगर वो सचमुच में पत्रकार है तो कभी रिवाल्वर-पिस्तौल यानी वैध शस्त्र की डिमांड किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से नहीं करेगा? और अगर करता है तो वह प्रथम दृष्टया पत्रकार नहीं हो सकता।

वाइस ऑफ जर्नलिस्ट नामक संस्था ने केवल वैध शस्त्र की ही डिमांड नहीं रखी। बल्कि ऐसी-ऐसी मांग रखी दी है कि उसे राज्यपाल कभी पूरी नहीं कर सकते और न ही संबंधित विभागों को उन तक अग्रसारित कर सकते है कि इनकी मांगे पूरी हो। एक विद्वत जन का कहना था कि वाइस ऑफ जर्नलिस्ट की मांग को पढ़कर कोई भी व्यक्ति हंसेगा।

मांग ऐसी होनी चाहिए, जो सही मायनों में मांग की तरह हो। अब पत्रकारों को उचित मूल्य पर मकान/आवास की सुविधा उपलब्ध हो। अगर पत्रकार सही मायनों में गरीब है, तो सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना या राज्य सरकार ने अबुआ आवास योजना चला ही रखी है, वे इसका लाभ क्यों नहीं उठाते? उनके लिए स्पेशल अलग से मकान सरकार क्यों उपलब्ध करायेगी?

अब आगे देखिये, इस संगठन ने राज्यपाल से गुहार लगाई है कि जिन राज्यों में पत्रकारों के लिए पेंशन योजना लागू नहीं हैं. वहां इसे लागू कराने की पहल की जाये। अब झारखण्ड के राज्यपाल किन-किन राज्यों में जाकर ऐसा करने का अनुरोध करेंगे। क्या वे पूरे देश के 28 राज्यों के राज्यपाल है? अरे भाई, कहां जा रहे हो? किनसे डिमांड कर रहे हो? भला ये तो विचार कर लो। खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कह रहे हो और चौथे स्तंभ जैसी तुम्हारी बुद्धि भी नहीं दिख रही।

आगे देखिये पत्रकारों के बच्चों की फीस में छूट, बस व ट्रेन में छूट, स्वास्थ्य बीमा व बेहतर चिकित्सा, कार्यस्थल की सुविधा तो भाई ये सब केवल पत्रकारों को ही क्यों, यहां के किसान-मजदूरों ने कौन सा पाप किया है कि उन्हें ये सुविधा नहीं मिले और आपको दे दी जाये। आप पत्रकार है और उसके लिए भी डिजिटल पत्रकारिता, प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकी सुविधाएं सरकार ही प्रदान करें तो फिर आप या आप जहां काम कर रहे हैं और सुविधा लाभ ले रहे हैं, वे क्या करेंगे?

ये तो वही बात हुई कि लाद द, लदवा द, घर तक पहुंचा द। अरे कुछ तो आप या आपकी संस्था जहां काम कर रहे हैं। वो करेगी। कि सरकार ही अखबार खुलवाएं, सरकार ही आपको उसमें नौकरी पर रखे और सरकार ही आप की सारी जिम्मेदारी का वहन करें तो फिर सरकार ने अपने लिए आकाशवाणी और दूरदर्शन बना ही रखे हैं, वो अपना काम कर ही रही है, आप आराम करें। आपको बेवजह तूफां खड़ा करने की क्या जरूरत है? और जब पत्रकारिता में इतना ही प्राब्लम हैं तो आप पान या चाय की दुकान खोलकर अपना जीवन निर्वहण क्यों नहीं करते। इसमें तो आपको कोई दिक्कत ही नहीं होगी और न कोई आपको कष्ट होगा। थोड़ा इस ओर भी तो कदम उठाकर देखिये।

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