परिसीमन के बहाने कांग्रेस बंधु तिर्की और शिल्पा को आगे कर CM हेमन्त को ठिकाने लगाने में लगी, ईसाई मिशनरियों का भी मिला इसमें सहयोग, चर्चा शुरू झारखण्ड में आदिवासियों का बड़ा नेता अब कौन?
कांग्रेस पार्टी ने झारखण्ड में बहुत बड़ी चाल चली है। कांग्रेस ने बंधु तिर्की और उनकी बेटी जो राज्य में कृषि मंत्री भी है, शिल्पा नेहा तिर्की को आगे कर परिसीमन के बहाने पूरे राज्य में विलुप्त हो चुकी कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की ठानी है। इसमें गुपचुप तरीके से ईसाई मिशनरियों का भी सहारा लिया जा रहा है। ईसाई मिशनरियां इसमें सक्रिय भी है। क्योंकि ये भाजपा को झारखण्ड में देखना पसन्द नहीं करती, साथ ही राज्य में हिन्दू संस्कृति व भाजपा को फलते-फूलते भी देखना नहीं चाहती।
वो चाहती है कि झारखण्ड का पूरा आदिवासी समाज ईसाई धर्म में परिवर्तित हो जाये और यहां भी नागालैंड, मिजोरम जैसी स्थिति बन जाये। इसके लिए वो पूरी तरह से सक्रिय है और वे सभी कार्य कर रहे हैं। जिससे उनका कार्य सिद्ध हो जाये। ऐसे में इन्हें लगता है कि यहां कांग्रेस ही उसे मदद कर सकती है। आज जो रांची के मोराबादी मैदान में आदिवासी एकता महाजुटान के नाम पर जो भीड़ जुटी। उस भीड़ में प्रथम दृष्टया यही सब दिखा।
यहीं कारण था कि जो सही मायनों में धर्मांतरित आदिवासी नहीं हैं। जिन्होंने अपना मूल धर्म नहीं छोड़ा है। जो आज भी मिशनरियों के खिलाफ है। उन्होंने आज के आदिवासी एकता महाजुटान को ईसाई आदिवासी रैली बोलकर कड़ा विरोध किया था। कई प्रेस कांफ्रेस भी किये थे। जिसको लेकर आज के आयोजकों के चेहरे पर शिकन भी दिखाई पड़ रहे थे। लेकिन आज की जो रैली हुई, उससे इनके चेहरे खिले हुए हैं। चेहरे इसलिए खिले हैं, क्योंकि इनलोगों ने इस रैली के माध्यम से कई शिकार किये हैं।
दिल्ली में बैठे राहुल गांधी को दिखा दिया कि यहां कांग्रेस आज भी मजबूत है और पूरा आदिवासी समाज उनके साथ है। राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन को भी दिखा दिया कि आज का आदिवासी समाज अब झामुमो नहीं, कांग्रेस के पीछे चल पड़ा है। इस रैली ने भाजपा को भी समझाने की कोशिश की कि अगली लड़ाई तुम्हारी झामुमो गठबंधन से नहीं होगी, बल्कि कांग्रेस गठबंधन से होगी, जिसमें झामुमो एक पार्टी होगी, न कि आज की तरह झामुमो गठबंधन में जैसे कांग्रेस एक पार्टी है।
बंधु तिर्की दरअसल बाबूलाल मरांडी के शासनकाल में हुए डोमिसाइल आंदोलन की उपज है। एक केस में जेल गये, दो साल से अधिक की सजा हुई तो उनकी विधायकी चली गई तो उन्होंने मांडर विधानसभा से अपनी बेटी शिल्पा नेहा तिर्की को कांग्रेस से टिकट दिलवा दिया तो देखते ही देखते वो भी नेता बन गई। इसी प्रकार कांग्रेस में कई ऐसे लोग है, जो स्वयं सक्रिय नहीं होते तो वे अपने बेटे-बेटियों को कांग्रेस का टिकट दिलवाकर नेता बनवा देते हैं।
हाल ही में रांची संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से सुबोध कांत सहाय ने भी अपनी बेटी यशस्विनी सहाय को टिकट दिलवा दिया था। ये वहीं सुबोध कांत सहाय है, जिन्हें राहुल गांधी देखना भी पसंद नहीं करते। लेकिन झारखण्ड में ये कांग्रेस के बड़े नेता स्वयं को डिक्लियर किये हुये है, साथ ही वे जिस जाति से आते हैं, उसके भी बड़े नेता यानी वे अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है। कभी जनता पार्टी में भी थे। लोकनायक जय प्रकाश नारायण को अपना आदर्श मानते थे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि लोकनायक से उनका भला नहीं होनेवाला तो उन्होंने इंदिरा-राजीव में अपना आदर्श ढूंढ लिया और उसका फायदा उन्होंने मंत्री बनकर भी हासिल कर लिया।
दरअसल, बंधु तिर्की और शिल्पा नेहा तिर्की को आगे कर एक नये ड्रामा करने की शुरूआत की पटकथा कांग्रेस ने उसी वक्त शुरु कर दी थी। जब परिसीमन और एमएमडीआर को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन सक्रिय हो उठे थे और उन्होंने इसके लिए केन्द्र की भाजपा सरकार से दो-दो हाथ करने का मन बना लिया था। यहां तक की उन्होंने कह दिया था कि इसके लिए अगर विशेष सत्र बुलाने की जरूरत पड़ी तो वे विशेष सत्र भी बुलायेंगे।
ऐसे में कही हेमन्त सोरेन इस मुद्दे पर आगे न निकल जाये। कांग्रेस ने जल्दबाजी में आदिवासी एकता महाजुटान कर डाला और मिशनरियों ने इसमें सक्रिय भूमिका निभा दी और हेमन्त सोरेन को सकते में दे डाला। कांग्रेस को लगता है कि चूंकि अभी राज्य में चल रहे छात्र आंदोलन से सर्वाधिक कष्ट हेमन्त सोरेन और उनकी पार्टी को हो रहा है। ऐसे में परिसीमन के बहाने आदिवासियों के बीच खुद को बेहतर बनाने का यही सबसे बड़ा मौका है। इसलिए उसने यह बड़ी चाल चल दी।
लेकिन राजनीतिक पंडितों का कहना है कि आज की महाजुटान में मूल आदिवासी कम और धर्मांतरित आदिवासियों की ज्यादा थी। ऐसे में जो मूल आदिवासी है, वे इनसे बहुत ही क्रोधित है। उन्होंने भी जल्द ही एक महाजुटान महारैली करने की ठान ली है। लेकिन अभी तिथि की घोषणा नहीं की है। लेकिन वो भी जल्द ही होगा। राजनीतिक पंडितों का यह भी कहना है कि कांग्रेस आज की रैली कर और उसमें भीड़ देखकर हो सकता है कि बहुत ज्यादा उत्साहित हो। लेकिन उसे नहीं पता कि झारखण्ड में आज भी झामुमो की जड़े बहुत ज्यादा गहरी है और कांग्रेस कुछ भी कर लें, उसे बिना झामुमो के संजीवनी के यहां कुछ भी फायदा नहीं होनेवाला।
राजनीतिक पंडित तो यह भी कहते है कि अगर 2024 में हुए चुनाव में हेमन्त सोरेन का आशीर्वाद कांग्रेस को नहीं मिला होता तो आज कांग्रेस 16 से चार में पहुंच गई होती। राजनीतिक पंडितों का यह भी कहना है कि भले ही मंच पर एक ओर राहुल गांधी और दूसरी ओर हेमन्त सोरेन की तस्वीर थी। लेकिन ये झामुमो के आंखों में धूल झोंकने की कोशिश के सिवा और कुछ नहीं थी। दरअसल इस बहाने बंधु तिर्की को आदिवासियों का बड़ा नेता बनाने की कोशिश थी।
लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी हेमन्त सोरेन का खूंटा इस झारखण्ड में इतनी गहराई तक जड़े जमा चुका है कि राहुल, सोनिया और प्रियंका भी यहां जोड़ लगा लें तो बिना हेमन्त के यहां टिक नहीं पायेंगे। ये ब्रह्म वाक्य है। कांग्रेसियों को भी इस पर चिन्तन-मनन कर लेना चाहिए। हां, आज उनकी रैली ठीक-ठाक रही। इसकी खुमारी तब तक ले सकते हैं, जब तक आदिवासियों के नाम पर असली रैली नहीं हो जाती। जिस दिन रैली हो गई या हेमन्त सोरेन ने अपनी बांहे सिर्फ झाड़ ली, तो फिर ये कांग्रेसी कहा फेकायेंगे, इन्हें नहीं पता।
