अपनी बात

रांची में चल रहे छात्रों के आंदोलन को पीपली लाइव में बदलने की तैयारी…

जी हां, रांची में चल रहे छात्रों के आंदोलन को अब पीपली लाइव की राह पर ले जाने की तैयारी चल रही है। पीपली लाइव आप तो जानते ही होंगे। 2010 में ये पिक्चर बनी थी। जिसका गाना आज भी सुपरहिट है। गाने के बोल है… सखि सैयां तो खूब ही कमात है… मंहगाई डायन खाय जात है…। ठीक इसी प्रकार अब रांची में चल रहा छात्रों का आंदोलन भी अब इसी रूप में दिखने लगा है।

जहां छात्र आंदोलन कर रहे हैं। वहां मेला सा दृश्य है। जहां हर प्रकार के नमूने टाइप के पत्रकारों का समूह हाथों में बूम लेकर उछल-कूद मचाते हुए देखे जा सकते हैं। जहां विभिन्न राजनीतिक दलों के समूह बिना किसी बुलावे के पहुंच जा रहे हैं और अपने-अपने ढंग से इन छात्रों के समर्थन की बात कर रहे हैं। स्थिति अब तो ऐसी है कि राहुल गांधी भी छात्रों से मोबाइल पर बात कर रहे हैं तो दूसरी ओर सोनम वांगचुक भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए मोबाइल तक का उपयोग कर रहे हैं।

जंतर-मंतर पर अपनी लंगूरी हरकतों को दिखा चुके लंगूरों का दल भी यहां डेरा डालना शुरु कर दिया है। लंगर लगाने की बात चल रही हैं। हालांकि ऐसे लंगरों की यहां कोई जरुरत नहीं। जो छात्र आंदोलन कर रहे हैं। उनकी देखरेख उनकी जरुरतों की पूर्ति के लिए यहां सक्षम लोग मौजूद हैं। लेकिन चूंकि यहां छात्र हैं। आंदोलन हो रहा हैं। वहां अपनी-अपनी रोटी न सेंकी जाये, ऐसे कैसे हो सकता है।

आज वामपंथी नेत्री नेहा बोरा भी आई और अपना दमखम दिखा दी। लेकिन दमखम दिखा रही नेहा बोरा पर किसी ने स्याही फेंक कर अपना गुस्सा प्रकट कर दिया। हालांकि ऐसा नहीं होना चाहिए। यही सब गंदगी किसी भी आंदोलन के मूल स्वरूप को नष्ट कर देती है। जैसा कि जंतर-मंतर पर देखने को मिला।

इधर विधानसभा में भी जमकर हंगामा चला। आज पूरा सदन हंगामे की भेंट चढ़ गया। प्रश्नकाल पूरी तरह से हंगामे की भेंट चढ़ गया। ले-देकर अनुपूरक बजट को सदन में हंगामे के बीच रखा गया। फिर स्पीकर ने दस तारीख तक के लिए सदन स्थगित कर दी। इधर सरकार भी चाहती है कि छात्रों का आंदोलन ज्यादा नहीं खींचे। लगता है कि आजकल में मामला सलट जायेगा।

छात्रों को सरकार की ओर से कह दिया गया है कि सरकार अगर बात करेगी तो सिर्फ और सिर्फ छात्रों से करेंगी। भाया-मीडिया किसी से बात नहीं होगी। ऐसे में छात्रों ने भी अपनी ओर से एक टीम गठित कर दी है। लगता है कि जल्द ही मामला सलटेगा। लेकिन जिस प्रकार से तीन-चार दिनों के अंदर दिल्ली की गंदगी यहां उठ कर आई है।

उससे तो साफ हो गया कि रांची में पीपली लाइव की शो दिखाने की दिल्लीवालों ने ठान ली है। लेकिन क्या रांची की जनता पीपली लाइव देखने को तैयार है। हमें तो लगता है कि कभी नहीं…, क्योंकि झारखण्ड न तो दिल्ली है और न दिल्ली बनना चाहता है, क्योंकि यहां की संस्कृति संघर्ष की अवश्य है, पर किसी को गाली-गलौज कर या नीचा दिखाने की यहां की संस्कृति नहीं रही। शायद यही कारण रहा है कि पीपली लाइव की तरह तमाशा खड़ा करनेवाली मीडिया और नेताओं के यहां आने के बावजूद उन्हें कोई यहां भाव नहीं दे रहा। ये उन्हें भी मालूम है, जो दिल्ली से बड़े मूड बनाकर चले थे।

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