अपनी बात

बांकीपुर की जनता मेहरबान, तो पीके(प्रशांत किशोर) पहलवान

बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव का फैसला आ चुका है। बांकीपुर की जनता ने अपना जनादेश दे दिया है। प्रशांत किशोर को वहां की जनता ने अपना नेता चुन लिया है। लोकतंत्र में जीत एक वोट से हो या हजार अथवा लाख से जीत, जीत होती है। इससे कौन इनकार करेगा। बिहार की राजनीति की समझ रखनेवाले राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भाजपा को यह मिली करारी हार ताउम्र उसे याद रहेगा। रह-रहकर इस हार की पीड़ा उसे टीस देगी। जिससे उबरने में उसे शायद वक्त लगे।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो बांकीपुर की जनता ने भाजपा को हराने की कसम उसी दिन ले ली थी। जिस दिन यूजीसी प्रकरण जन्म लिया था। इस कसम को मजबूती दे दी, बिहार का भरत तिवारी हत्याकांड प्रकरण ने और रही सही कसर पूरी कर दी, विधानसभा चुनाव के कुछ दिन पूर्व पटना में युवाओं द्वारा किये गये धरना-प्रदर्शन के बाद पुलिसकर्मियों द्वारा चुन-चुनकर युवाओं की, की जा रही गिरफ्तारी ने। इस गिरफ्तारी ने युवाओं ओर उनके अभिभावकों को इस कदर भड़काया कि सभी ने संकल्प ले लिया कि नहीं, इस बार जैसे भी हो भाजपा को सबक सिखाना है।

ऐसे में, ले-देकर बांकीपुर की जनता के पास दो विकल्प थे। एक राजद की रेखा गुप्ता और दूसरा प्रशांत किशोर। राजद से तो बिहार की जनता आज भी नाराज है, क्योंकि लालू प्रसाद के शासन का आतंक लोग अभी भी भूले नहीं हैं। इसलिए राजद से राज्य की जनता ने दूरी बनाई और प्रशांत किशोर में उसने अपना नेता ढूंढ लिया। मतलब, भाजपा को हराना है तो किसी न किसी को जीताना ही होगा। तो बांकीपुर की जनता को प्रशांत किशोर के रूप में डूबते को तिनके का सहारा मिल गया।

रही-सही कसर बिहार भाजपा से खार-खाये तथा हर हाल में अपना उल्लू सीधा करने में मस्त कुछ मीडियाकर्मियों ने इसका फायदा उठाया और प्रशांत किशोर की तेल मालिश करने में खुद को झोंक दिया। हालांकि हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनाव में भी इन मीडियाकर्मियों ने प्रशांत किशोर की तेल मालिश कम नहीं की थी। लेकिन उस चुनाव में पीके को कोई सफलता हाथ नहीं लगी। बल्कि पूरे बिहार में चुनाव लड़कर ये वोटकटुआ ही सिद्ध हुए।

आप आश्चर्य करेंगे कि बिहार विधानसभा के चुनाव में 243 सीटों में से पीके की पार्टी 238 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसे हर सीटों पर मुंह की खानी पड़ी। लेकिन बांकीपुर के उपचुनाव में उसे भारी सफलता मिल गई। उसका मतलब ये नहीं कि जनता ने पीके को सिर पर बिठा लिया। आज भी पीके और उसकी पार्टी की औकात वही है। जो पूर्व में था। चूंकि जनता को भाजपा को सबक सिखाना था। सबक सिखाने के लिए उसे एक कैंडिंडेट की जरुरत थी। कैंडिंडेट के रूप में उसे पीके दिखा। लीजिये, सबक सिखा दिया। जनता के अरमान पूरे हो गये। इसका परिणाम क्या होगा, उससे जनता को कोई मतलब नहीं। जनता को तो सिर्फ इस बात की खुशी है कि उसने भाजपा को हरा दिया। इस हार की कीमत उसे क्या चुकानी पड़ेगी, उससे उसे क्या मतलब?

ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत जो भाजपा के कैडर वोट थे। भाजपा को इनके वोट नहीं मिले। कायस्थ की मजबूरी थी, क्योंकि भाजपा ने उनका कैंडिंडेट दिया था। इनलोगों ने थोड़ी बहुत वोट किये। लेकिन ये जाति ज्यादातर सुतने और मस्ती मारने में ही ज्यादा वक्त बिताता है, इसलिए वोट के दिन भी यह सुस्ताने पर ज्यादा ध्यान दिया और पिछड़ों में लड़ाकू मानी जानेवाली राजद की कट्टर वोटर यादव समाज ने समझ लिया कि रेखा गुप्ता को वोट देने से कोई फायदा नहीं, वोट बर्बाद हो जायेगा। दिमाग से काम लिया, पीके के तरफ बटन दबा दिया। राजद की कट्टर मुस्लिम वोट बैंक ने भी खुद को राजद से अलग कर पीके को जिताने में ज्यादा भूमिका निभाई, क्योंकि ये कौम देख लिया था कि पहली बार भाजपा के खिलाफ हिन्दुओं के फारवर्ड और बैकवर्ड दोनों एक हुए हैं, इसलिए मुस्लिमों ने भी इनका समर्थन करते हुए फैसला बदला और पीके की तरफ भारी मतदान कर दिया। अब ऐसे में भाजपा के पास बचता क्या था? कुछ नहीं।

अभी वर्तमान स्थिति यही है कि भाजपा का कैडर वोटर ब्राह्मण, भूमिहार व राजपूत पूरी तरह से छिटक चुका है। बिहार के कई इलाकों में ये वोटर निर्णायक हैं। अगर भाजपा ने अपने बोल-बचन और गतिविधियां ठीक नहीं की, तो हो सकता है कि बिहार में आनेवाले समय में कोई और बड़ा परिवर्तन दिखे। वर्तमान में बांकीपुर सीट जीतकर भले ही पीके ज्यादा डींग हांक लें। लेकिन सच्चाई यही है कि ये एक सीट से ज्यादा आगे बढ़ने की स्थिति में यह पार्टी नहीं हैं। क्योंकि बांकीपुर की जनता ने इन्हें सिर्फ इस्तेमाल किया है। भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल किया है।

इनकी यानी पीके की जो स्थिति हैं वो बड़बोलेपन की है। ऐसे भी ये किसी को जीताने में अहम् भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन खुद की पार्टी को खड़ा करने की ताकत इनमें नहीं। अंत में, अगर ये कहते हैं कि ये जीत उनके मेहनत की है। तो फिर ये कथन, बांकीपुर की जनता का अपमान होगा। यह शत् प्रतिशत जीत बांकीपुर की जनता का है, क्योंकि उसने ही इन्हें नेता बनाया, न कि ये खुद नेता बन गये या बना दिये गये।

अभी भी ये बिहार विधानसभा भी बोल पायेंगे, कहना मुश्किल है। क्योंकि झारखण्ड में जदयू को मात्र एक सीट मिली है। जिसके विधायक सरयू राय है। सरयू राय को विधानसभा में कितना वक्त बोलने का मिलता है, वो सरयू राय ही जानते हैं, इसलिए जो पार्टी बड़ी संख्या में जीतकर जाती है। उसकी बात ही कुछ और है। ऐसे भी ये जब भी बैठेंगे तो विधानसभा में पीछे ही बैठेंगे। स्पीकर की कृपा लेनी पड़ेगी, तभी बोल पायेंगे।

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