अपनी बात

डूबते (कांग्रेसियों, आपियों, वामियों, समाजवादियों और मोदी विरोधियों) को तिनके (तिलचट्टों) का सहारा

जी हां, डूबते को तिनके का सहारा। पूरी तरह से भारत की जनता द्वारा नकार दिये गये तथा एक-दो राज्यों में तारों की तरह टिमटिमाते नजर आनेवाले कांग्रेसियों, आपियों, वामियों, समाजवादियों और मोदी विरोधियों को तिलचट्टों में अपनी स्वार्थसिद्धि दिखाई पड़ी हैं। वे शर्ट-पैंट खोलकर नाच रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि उन्हें तिलचट्टों के रूप में एक सहारा मिल गया है। अब वे तिलचट्टों की मदद से दिल्ली पर कब्जा कर लेंगे।

इधर मोदी के कट्टर विरोधी पत्रकारों, यूट्यूबर्स, मोदी के विरोध में ठेका लेकर लिखनेवालों में भी हर्ष की लहर दौड़ गई है। उन्हें लगता है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। इनको लग रहा है कि तिलचट्टों ने पूरे भारत में क्रांति ला दी है। वे तिलचट्टों के सम्मान में क्रांति की पटकथा लिख रहे हैं और उसे धड़ल्ले से शेयर कर रहे हैं। पहले सीएए के विरोध में शाहीनबाग में दंगे भड़काकर कर अपनी क्रांति को इतिश्री करवा लेनेवाले, उसके बाद किसान आंदोलन में अपनी भद्द पिटवानेवाले और अब नीट के नाम पर तिलचट्टों का रूप धारण कर दिल्ली में आंदोलन करनेवालों की अभी बांछे खिली हुई है।

फेसबुक और अन्य सोशल साइटों पर तो जैसे लगता है कि क्रांति हो गई है। चारों ओर तिलचट्टे ही तिलचट्टे नजर आ रहे हैं। जिसको अंग्रेजी में ये काकरोच कहते हैं और इसी के नाम पर पार्टी भी बना डाली है। लेकिन आम जनता के बीच ये कही नहीं हैं। ऐसे भी तिलचट्टों की औकात क्या? वे तो जहां भी दिखेंगे, लोग उसे मारेंगे ही, क्योंकि तिलचट्टों को देखते ही मारने का जनता में आम स्वभाव है, प्रकृति हैं। शायद यही कारण रहा कि जब तक ये तिलचट्टे दिल्ली में शांत रहे, तब तक दिल्ली पुलिस ने तो इनका बड़ी ही खातिरदारी की। खुब इनके उछल-कूद देखते रहे। पर जैसे ही इन्होंने हाथों में पत्थर उठाकर कलाकारी दिखाई। दिल्ली पुलिस ने इन तिलचट्टों की उसी तरह ठुकाई की। जिस तरह घरों में तिलचट्टों को देखते ही आम महिला या पुरुष उसे भूलोक से विदाई कर देते हैं।

कल के दिल्ली में हुए तिलचट्टों के संसद मार्च में काफी संख्या में महिला तिलचट्टियां भी थी। जो अपने पुरुष तिलचट्टों की मंगल गीतों से उनका उत्साह वर्द्धन कर रही थी। नाना प्रकार के आकर्षक वस्त्रों को धारण किये ये पुरुष तिलचट्टियां मंगल गीत गा रही थी। ये मंगल गीत थे – चल छइयां, छइयां, छइयां, छइयां….। इन मंगल गीतों को महिला तिलचट्टियों द्वारा गाती देख पुरुष तिलचट्टों में जोश भरता जा रहा था। उन गीतों को सुन कई महिला तिलचट्टियां अपने पुरुष मित्र तिलचट्टों के साथ नृत्य आदि में भी मग्न थी।

कई वामी पुरुष व महिला तिलचट्टे अपने ढोल, झाल व करताल लेकर पहुंचे थे तथा इन आंदोलन में वे खुद को तिलचट्टे बता रहे थे। लेकिन वहां इनके हाव-भाव देखकर जीव विज्ञान के छात्र जो जीवों के वर्गीकरण की पढ़ाई को खूब ध्यान योग से पढ़े हैं। वे इन तिलचट्टों के हाव-भाव को देखकर बता दे रहे थे कि ये कांग्रेसी तिलचट्टे हैं, ये वामी तिलचट्टे हैं, ये समाजवादी तिलचट्टे हैं, ये हिन्दू विरोधी तिलचट्टे हैं, ये आपी तिलचट्टे हैं, ये मोदी विरोध में लिख-लिखकर अपना सर्वस्व लूटा चुके मोदी विरोधी पत्रकार रूपी तिलचट्टे हैं।

दूसरी ओर दिल्ली में इन तिलचट्टों के प्रदर्शन को देखकर, देश के अन्य नगरों में भी इन तिलचट्टों के लार्वा से निकले कई तिलचट्टे भी सड़क पर उतरे। उन्हें लगा क्यों न हम भी आज तिलचट्टे बन जाये। रांची में तो विद्रोही24 ने देखा कि कुछ ऐसे भी तिलचट्टे यहां सड़कों पर बैनर पकड़े नजर आये। जो पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के शासनकाल में खुद पर एक प्राथमिकी दर्ज हुआ देख, ऐसे बेहोश होने लगे थे कि वे अपने जीजाजी के साथ तत्कालीन सीएम रघुवर के पास हो लिये और कहने लगे रघुवर जी, त्राहि माम्, त्राहि माम् और कल पुनः उछलते हुए देखे गये।

इधर कुछ वर्षों से जब झारखण्ड में भाजपा की सरकार खत्म हो गई हैं। तो वे फिर उछलते नजर आ रहे हैं। ये वे लोग हैं। जब जैसा, तब तैसा के खिलाड़ी बनकर, कंबल ओढ़कर दही-दूघ व घी का रसपान करते तथा मांस भक्षण कर अपना ढीढ़ा भरते हैं और भाजपा तथा अन्य भाजपा विरोधी दलों के शासन का खूब अपने पक्ष में फायदा उठाते हैं। इनका कभी भी नुकसान नहीं होता। चाहे सरकार भाजपा की हो या हेमन्त का या किसी और दल का। क्योंकि इनके चाहनेवाले सभी जगह हैं।

विद्रोही24 ने देखा है कि जब पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का शासनकाल था। तब उनके शासनकाल में कई वामपंथी पत्रकार और वामपंथी सोचवाले अधिकारी उनके आवास में बैठकर सत्ता के खुब मजे लेते थे। मजे देते थे। जब सरकार बदली, हेमन्त सोरेन की सरकार आई। तब हमने देखा कि वहीं वामपंथी पत्रकार और वामपंथी सोचवाले जो अर्जुन मुंडा के शासनकाल में रेवड़ियां खाते थे। हेमन्त सोरेन के शासनकाल में भी उनके रेवड़ियों पर कोई असर नहीं पड़ा।

कहने का तात्पर्य है कि जो धूर्त हैं। उनके लिए क्या? सरकार मोदी का हो या मोदी का नहीं हो। जिसकी भी सरकार रहेगी, उसकी डाल पर बैठकर, वे उसी का मंगल गीत गाने लगेंगे, उसकी जय-जयकार करने लगेंगे और आम जनता को उनकी हमेशा की तरह औकात बताने लगेंगे।

शायद यही कारण रहा कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि सत्ता का केवल एक ही चरित्र होता है। सरकार किसी की भी हो, सभी का चरित्र एक जैसा होता है। दिल्ली में तिलचट्टों का आंदोलन हो या बाबा रामदेव का। कभी बाबा रामदेव को वर्तमान में यही लोग जो आज सत्ता से बाहर हैं और तिलचट्टा बनकर गर्व महसूस कर रहे हैं, बाबा रामदेव को सलवार सूट पहनने पर मजबूर कर दिया था और आज सोनम वांगचुक को सलवार सूट पहनने पर मजबूर नहीं किया गया। उन्हें आदर के साथ सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया।

फिर भी सत्ता से बाहर किये लोग पीएम मोदी को गलत ही ठहरा रहे हैं। जिनके शासनकाल में कभी भी गैर कांग्रेसी सरकार को उनका कार्यकाल पूरा नहीं होने दिया गया। तिकड़मबाजी कर गैर कांग्रेसी सरकार को गिराकर वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता था। वे अब लोकतंत्र और भारतीय संविधान की दुहाई देते हैं तो मेरे जैसे विद्रोहियों को तो गुस्सा आना लाजिमी हैं। ऐसे कोई भी आपी, वामी, कांग्रेसी, समाजवादी या भाजपाई खुद को चरित्रवान, लोकतंत्र का हितैषी, भारतीय संविधान के प्रति आदर रखनेवाला कहता हैं तो मुझे आश्चर्य होता है।

वो इसलिए कि जब ये ऐसे हैं तो भारत के खेतो-खलिहानों में सत्यनिष्ठा के साथ काम करनेवाला, सीमाओं पर अपनी जान की बाजी लगा देनेवाला क्या हैं? अरे अब हमें तिलचट्टे बतायेंगे कि भारत का संविधान या लोकतंत्र खतरे में हैं या नहीं। ये चल छइयां, छइयां, छइयां … गानेवाली तिलचट्टियां बतायेंगी हमें, कि हमें अपने देश के लिए क्या करना है? हमें छइयां में नहीं जाना, हम तो चिलचिलाती धूप में खेतों में अपना पसीना बहानेवाले तथा सीमाओं पर विपरीत परिस्थितियों में सीना चौ़ड़ाकर दुश्मनों के सामने खड़ा हो जानेवाले लोग हैं, किसी के इशारे पर नाचनेवाले नहीं।

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