स्वनाम धन्य नेताओं से पटी प्रदेश भाजपा में एक है सुरेश साव, जो बाबूलाल मरांडी के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष व संगठन मंत्री के भी अतिप्रिय हो गये हैं, क्यों अतिप्रिय हैं, इसकी भी भाजपा में खूब चर्चा है, पर …
यूं तो भाजपा स्वनामधन्य नेताओं से भरी पड़ी है। एक से एक रत्न भरे पड़े हैं, उन्हीं में से एक हैं गिरिडीह जिले के पीहरा गांव के सुरेश साव। फ़ेसबुक पर खुद के आईडी में बाबूलाल सुरेश साव लिखते हैं। गिरिडीह जिले में बाबूलाल जी का सबसे करीबी और खुद को नाक का बाल बताते नहीं थकते। जेवीएम में भी उनके साथ थे। कभी सारंडा इलाके में एक आयरन और कारोबारी का “काम” करते थे।
आजकल प्रदेश अध्यक्ष के नवरत्न सलाहकारों में ये भी प्रमुख रूप से शामिल हैं। सुना तो यहां तक जाता है कि सांसद सह प्रदेश अध्यक्ष के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के एक कमरे की चाबी भी यहीं रखते हैं ताकि बाज़ार बना रहे। ”सहयोग” लाने मे उस्ताद माने जाते हैं सो इनकी जरूरत सब को रहती है। वैसे आजकल इन्हें एयरपोर्ट पर ढुलू महतो का अटैची टाँगते हुए भी देखा जाता है।
पहले ये भाजपा की ओर से धनबाद के प्रभारी बनाये गये थे तो ढुलू से निकटता बनी। सुना है ये तो अब बालू, दारू और कोयला में भी किस्मत आजमा रहे है। क्या पता इसी रास्ते ये भी एक दिन ढुलू बन जायें। आजकल गोड्डा के प्रभारी बनाये गये हैं। लेकिन वहां के सांसद निशिकांत दूबे इतने दबंग हैं कि शायद ये उनके साये में भी कभी न फटक पायें। सो ढुलू और प्रदेश अध्यक्ष दिल्ली के लिये, तो झारखंड के लिये तो बाबूलाल जी हैं ही। भाई साहब भी इनपर मेहरबान रहते है। विशेष कारण क्या है, ये दोनो ही जानें।
पीहरा गांव में इनके पिता बलदेव साव जी की हत्या हो गई थी। तब से ये सालाना पुण्य तिथि मनाते हैं और किसी भी पुण्य तिथि में बाबूलाल मरांडी जी को बुलाना नहीं भूलते। इसी बीते 6 जुलाई को वहां बड़े तामझाम से पुण्यतिथि मनायी गयी। कई जिलो से लोग बुलाये गये। बाबूलाल मरांडी भी गये। जाते भी क्यों नहीं? उनके बिना वो पुण्यतिथि मनायी ही नहीं जा सकती थी।
आखिर दुकानदारी भी तो इसी से जो चलनी है। बाकी जनाधार कैसा है कितना है छवि, कैसी है इनका वहां? ये भला बाबूलाल जी से ज्यादा कौन जानता है? वो तो सब के रग रग से वाक़िफ़ हैं ही। तभी तो इनके लाख प्रयास के बावजूद भी इन्हें इस बार पार्टी में सचिव या उपाध्यक्ष का पद नहीं मिला, जिसके ये प्रबल दावेदार तो थे ही। उपर से बाबूलाल जी का आदमी, अध्यक्ष के नवरत्न, ढुलू का साथ और भाई साहब की सहमति।
पर इन्हें इतने सारे कारण एक साथ मिल के भी सर पटक के भी पद नहीं मिल सका। पीहरा में प्रोग्राम हुआ। दूसरे दिन वहां के अख़बारों में प्रमुखता से छपा। सुरेश साव जी ने उन सारे अख़बारों के कतरन सहेज कर अपने एक्स पर पोस्ट भी किया। पर बेचारे की हालत देखिये, न तो किसी एक आदमी ने लाइक किया, न रिपोस्ट। बीजेपी के इस नेता की इतनी भी औकात नहीं कि एक भी कार्यकर्ता इनके पोस्ट को लाइक करे। तीन दिन में सिर्फ देखा भी तो मात्र 19 लोगों ने। मतलब साफ है लोग हकीकत से वाक़िफ़ हैं, इनके रग रग उनके धंधे से वाक़िफ़ हैं।
बताते चलें कि पिछले विधानसभा चुनाव के समय टिकट के लिये इन्होंने खूब उछल कूद मचाया। अंत में ढुलू को लेकर अमित शाह से भी मिल आये कि क्या पता नेता भ्रम में आकर इन्हें टिकट दे दे। पर पूरी रायशुमारी और सर्वे लेकर दिल्ली में बैठने वाले नेताओं ने जब देखा कि ये तो एक से दस के बीच भी फिट नहीं हैं, खुद से पांच सौ वोट भी लाने की इनकी औकात नहीं है, तो इनकी दाल ही नहीं गली। हाँ, ये हवा बनाने में कामयाब जरूर रहे कि मिलते मिलते कट गया ताकि इनकी दुकानदारी आगे भी चलती रहे।
