आंतरिक शांति एक ऐसा लिंक, जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति खुद को ईश्वर से कनेक्ट कर सकता हैः स्वामी पवित्रानन्द
रांची के योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी पवित्रानन्द ने कहा कि आंतरिक शांति के बिना ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसलिए ईश्वर को पाने के लिए आंतरिक शांति का होना आवश्यक है और इस आंतरिक शांति के लिए भी ईश्वरीय कृपा का होना आवश्यक है। उन्होंने एक दृष्टांत देते हुए कहा कि आप पानी को आग की सहायता से उबालिये और फिर आग को शांत कर दीजिये। आप पायेंगे कि उबला हुआ जल धीरे-धीरे शांत हो गया, ठंडा पड़ गया, क्योंकि पानी का स्वभाव ही ठंडा रहना है। उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव ही शांति है, न कि क्रोध है।
उन्होंने योगदा सत्संग आश्रम के श्रवणालय में उपस्थित योगदा भक्तों को कहा कि इस भौतिक युग में आपके पास ऐसी-ऐसी चीजे हैं या घटनाएं आपके सामने उपस्थित हो जायेंगी जो आपके आंतरिक शांति को भंग करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन आप फिर पायेंगे कि जैसे ही वो चीजें आपसे दूर होती है या उक्त घटना का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता है, आप पुनः उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। जो आपका स्वभाव है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति शांत रहना चाहता है, शांति से रहना चाहता है, आनन्द में रहना चाहता है, क्योंकि यही उसका मूल स्वभाव है।
उन्होंने कहा कि योगदा सत्संग सोसाइटी से जुड़े हुए और क्रिया साधना में लिप्त रहने के दौरान उन्हें 36 वर्ष बीत गये और इन 36 वर्षों में उन्होंने पाया कि सही मायनों में शांति ही सर्वशक्तिमान है। इसकी प्राप्ति हो जाने के बाद ही उन्होंने मूल प्रेम को जाना। उन्होंने कहा कि जैसे सूर्य को कभी-कभी बादल ढक लेता है। इसका मतलब यह नहीं हुआ कि बादल शक्तिशाली हो गया। कुछ समय के बाद बादल हटने के बाद सूर्य फिर से उसी अवस्था में हमारे सामने होता है। ठीक उसी प्रकार हमारे साथ भी है कि इस भौतिक जीवन में कभी-कभी लगता है कि हम कुछ अलग स्वभाव के हैं, पर ऐसा नहीं है। हमारा मूल स्वभाव शांत और शांति के साथ रहने का है।
स्वामी पवित्रानन्द ने कहा कि दुनिया में बहुत सारे लोग हैं। जो खुद को नाना प्रकार से बदलने की कोशिश करते हैं, पर वे पहचान लिये जाते हैं, क्योंकि वे वहीं गलतियां बार-बार करते हैं, जो करते रहे हैं। लेकिन उन्हें लगता है कि सामने वाला उन्हें पहचान नहीं रहा। उन्होंने इसी पर एक दृष्टांत दिया। एक सामान्य व्यक्ति एक दुकान पर गया और पूछा कि ये रेफ्रिजरेटर का दाम क्या है? दुकानदार ने कहा कि ये सामान आपको मैं नहीं दे सकता। ग्राहक ने सोचा कि शायद दुकानदार इसलिए नहीं दे रहा है कि उसे लग रहा है कि मैं सामान्य व्यक्ति हूं और इसे नहीं खरीद सकता।
इसलिए वो दूसरी बार बन-ठन कर गया और पूछा कि इस रेफ्रिजरेटर का दाम क्या है? दुकानदार ने फिर कहा कि वो इसे नहीं दे सकता। ग्राहक को फिर लगा कि शायद दुकानदार को लगता है कि अभी भी वो इस रेफ्रिजरेटर को खरीदने योग्य नहीं हैं। उसने इस बार अरब टाइप का अमीर आदमी बनकर गया और पूछा कि रेफ्रिजरेटर का दाम क्या है? दुकानदार ने कहा कि आपको दो बार मैं कह चुका कि मैं इसे आपको नहीं दे सकता। आप बार-बार इसे लेने के लिए क्यों आ जा रहे हैं। ग्राहक ने कहा कि आपको कैसे पता चला कि मैं वहीं व्यक्ति हूं, मैं तो कई बार अपना वेश बदल चुका हूं। दुकानदार ने स्पष्ट शब्दों में कहा – क्योंकि ये रेफ्रिजरेटर नहीं, बल्कि वाशिंग मशीन है।
स्वामी पवित्रानन्द ने आतंरिक शांति को लेकर भी एक कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि एक बार एक पिता ने अपने लिए एक कार खरीदी। जिस पर उसके बच्चे ने एक पत्थर से उस कार पर खरोंच लगा दिये। बच्चे को कार पर खरोंच लगाते हुए देख, बच्चे के पिता ने गुस्से में आकर उस पत्थर से ही उसके हाथों को खरोंच दिया। बच्चा दर्द से कराह उठा। बच्चे को दर्द से कराहते हुए देख, बच्चे का पिता, उसे हास्पिटल ले गया। जहां उसकी इलाज हुई, दर्द से राहत मिलते ही बच्चे को नींद आ गई, वो आराम से सो गया। जब सुबह हुई तो बच्चे के हाथ में पट्टी लगी थी। लेकिन उसकी हाथ से एक अंगुली गायब थी। बच्चे न जब अंगुली हाथ में नहीं देखा तो उसने पिता से पूछा कि मेरे इस हाथ में जो अभी अंगुली नहीं है, वो कब उगेगी? पिता के पास, अपने बच्चे के इस प्रश्न का उत्तर नहीं था। वो व्याकुल हो उठा। तभी उसने उस कार के पास जाकर उस खरोंच को देखने की सोची। जब कार के पास खरोचे गये जगह को देखा, तो वह दंग रह गया। बच्चे ने लिखा था -आई लव यू डैड।
स्वामी पवित्रानन्द ने इस कहानी के माध्यम से ये बताने की कोशिश की कि क्रोध, शांति का सबसे बड़ा दुश्मन है, एक प्रकार विष है। उन्होंने कहा कि किसी चीज का आदत बना लेना भी कम खतरनाक नहीं है। यह हमारे आंतरिक शांति को नष्ट कर डालता है। मोबाइल भी उन्हीं में से एक है। उन्होंने कहा कि पहले जब मोबाइल नहीं थी। लोग ज्यादा खुश थे। लेकिन जब से ये आई, तब से ज्यादातर लोग इसके गुलाम होते चले गये। आज भी घरों, बाजारों या ट्रेनों में देखेंगे तो लोग साथ-साथ चल रहे हैं। लेकिन मोबाइल की गुलामी ने उन्हें वहां पर भी सबसे दूरियां बना रखी है। आजकल के तो माता-पिता खुद बच्चों को मोबाइल थमाकर, अपना काम निकालने में मशगूल रहते हैं। ऐसे में आंतरिक शांति आयेगी कहां से?
स्वामी पवित्रानन्द ने कहा कि आप अपने जीवन से जीवन मूल्य, नैतिकता व सिद्धांतों को श्रद्धांजलि दे दीजिये और फिर सोचिये कि आपको आंतरिक शांति प्राप्त हो जाये, तो ये कहां से मिलेगी? उन्होंने योगदा भक्तों से कहा कि अगर आप आंतरिक शांति चाहते हैं तो निम्नलिखित बातों पर आप सभी ध्यान दें। उन्होंने कहा कि ईश्वर पर भरोसा रखना सीखिये। अच्छा रहेगा कि स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दीजिये। जहां भी योगदा सत्संग की ओर से रिट्रीट हो रहा हो। उसमें भाग लीजिये। क्योंकि यह आपको समय-समय पर रिचार्ज करता रहेगा। हमेशा ध्यान करिये। ध्यान आंतरिक शांति के लिए बहुत ही पावरफुल है। यह आनन्द तो देगा ही, साथ ही शांति के द्वार भी खोलेगा। आतंरिक शांति सद्बुद्धि भी प्रदान करता है। जैसे आपको कही जाना हो और बारिश हो जाये, तो आप बारिश को नहीं रोक सकते। लेकिन छाता लेकर बारिश में भी काम निकाल सकते हैं। यह आंतरिक शांति हमें बुद्धिमत्ता प्रदान करती है। आंतरिक शांति हमें जीवन के मूल सिद्धांतों पर चलना सिखाती है। यह शांति हमारे, हमारे परिवार, समाज, देश और विश्व के लिए जरुरी है।
उन्होंने कहा कि शांति से सब कुछ संभव है। गुरुजी ने शांति को प्राप्त करने के लिए अनेक टेक्निक दिये हैं। जैसे हं-सः, ओम् टेक्निक, क्रिया योग आदि। इसके द्वारा हम शांति को प्राप्त कर सकते हैं। आंतरिक शांति एक ऐसा लिंक है, जिसके द्वारा हम खुद को ईश्वर से कनेक्ट कर सकते हैं। स्वामी पवित्रानन्द ने साफ कहा कि नियमित ध्यान, क्रिया योग का अभ्यास, खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देने की कला, हर स्थिति में ईश्वर पर भरोसा और अपने आदतों में सुधार, सात्विक आहार व अच्छी संगति से आप शांति को प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आंतरिक शांति का मतलब ही है सक्रिय रूप से शांत और शांत रूप से सक्रिय होने की कला को समझना और जानना।
