भाजपा में नई परिपाटी शुरू जो पार्टी का मानमर्दन करेगा, उसे बड़ा पद दिया जायेगा और इस काम को गति दे रहे हैं बाबूलाल मरांडी और प्रदेश संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह, प्रमाण आपके सामने हैं
बाबूलाल मरांडी के ‘दुलारे’ ये भाजपा के ‘प्रदेश मंत्री’ हैं- सरोज सिंह। प्रदेश संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह के कई ‘जिगर के टुकड़े’ में ये भी एक हैं। भाजपा में ऐसी परिपाटी है कि जो पार्टी का ‘मानमर्दन’ करने की ‘बहादुरी’ दिखलाता है, उसे बुलाकर ‘बड़ा पद’ दिया जाता है। भाजपा को तोड़कर जेवीएम का परचम लहरानेवाले बाबूलाल मरांडी के साथ जो लोग गए थे, उनलोगों ने पार्टी के साथ, पार्टी के झंडे के साथ और पार्टी के प्रेरणा पुरुषों की तस्वीरों के साथ किस तरह ‘गरिमामय व्यवहार’ किया था – ये सबको पता है।
फिर भी ऐसे ‘पुण्यकर्म’ करनेवाले आज इसी पार्टी के ‘भाग्यविधाता’ हैं। वे एक-एक कर भाजपा के महत्वपूर्ण और निर्णायक पदों पर शोभायमान हो गए है! अंततः जब बाबूलाल मरांडी का स्वागत भाजपा में रेड कार्पेट बिछाकर किया गया, तो उनके चेंगड़े भी क्यों चूकते। सारे के सारे पार्टी के अंदर आ धमके और आज पूरी पार्टी उन्हीं के कब्जे में है। पार्टी ने उन्हें ‘चाँद – सितारों’ की तरह आँखों में बिठा रखा है।

लेकिन नकली चाँद-सितारे रोशनी नहीं बिखेरते; समय आने पर फुस्स हो जाते हैं! अब देखिए कि ये सरोज सिंह भाजपा के प्रदेश पदाधिकारी हैं, पर इनको यह भी पता नहीं कि अभी पार्टी के परम प्रेरणा पुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी [जन्म 6 जुलाई 1901] की 125 वीं जन्म जयंती मनाई जा रही है। जयंती से एक रोज पूर्व, 5 जुलाई को रामगढ़ के एक-एक शैक्षणिक संस्थान में छात्रों, प्राध्यापकों और बुद्धिजीवियों के बीच ज्ञान बांट रहे थे।
पार्टी के प्रदेश मंत्री सरोज सिंह को पता ही नहीं कि यह डॉ मुखर्जी की 125 वीं ‘जयंती वर्ष’ का अवसर है, ‘बलिदान’ का नहीं। बलिदान तो 23 जून 1953 को हुआ था। बाद में बहुत थू-थू हुई और पार्टी के ही एक नेता प्रवीण सिंह (पूर्व विधान पार्षद) ने फेसबुक पर जमकर क्लास लिया तो आनन-फानन में पोस्ट में सुधार किया गया।

अभी अभी हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेस सलाहकार रहे मशहूर पत्रकार एच के दुआ ने जो कहा है – “आज की भाजपा बुद्धि और बुद्धिजीवियों से बहुत भय खाती है” – यह बात सोलहों आने सच है। पार्टी पदानुक्रम में बुद्धिजीवियों का घोर अकाल पड़ता जा रहा है; अन्यथा किसी शिक्षा-संस्थान में, जहाँ की विद्वान् प्रिंसिपल, प्राध्यापक और देश की भावी पीढ़ी अर्थात् छात्र समुदाय विचार संप्रेषण और संग्रहण करते हों, वहाँ स्तरहीन लोगों को पार्टी की जग-हंसाई करने क्यों भेज दिया जाता है – यह तो झारखंड भाजपा के कर्णधार ही जाने। लेकिन एक संस्कृत कवि ने जो कहा है, वह संपूर्ण सत्य है –“गुण और प्रतिभा की पहचान हमेशा सही समय आने पर ही होती है”-
“काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः।।”
अर्थात् “कौआ भी काला होता है और कोयल भी काली होती है। लेकिन वसंत ऋतु आने पर जब दोनों बोलते हैं, तब कौए और कोयल का अंतर पता चल जाता है।” आज झारखंड के भाजपा नेता और गणेश परिक्रमा के बल पर पदासीन पदाधिकारी और प्रवक्ता जब सार्वजनिक मंचों पर तार्किक और सार्थक बोलने की जगह जब काक स्वर में क्रंदन करते हैं तो इस श्लोक की प्रासंगिकता बढ़ जाती है।
