मेरा परिमल झारखण्ड आया ओ रामजी…, मेरा नथवानी झारखण्ड आया ओ रामजी… और आगे भजन गाओ…, हरे परिमल, हरे परिमल, परिमल, परिमल हरे, हरे…, हरे नथवानी, हरे नथवानी, नथवानी, नथवानी, हरे, हरे…
लीजिये, राज्यसभा चुनाव के लिए आज नामांकन का समय बीत गया। झामुमो की ओर से बैजनाथ राम, कांग्रेस की ओर से प्रणव झा और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भाजपा समर्थित परिमल नथवानी ने नामांकन के पर्चे भरे। अगर सही में देखा जाये, तो यहां मतदान नहीं होने चाहिए, उसका मूल कारण सत्ता पक्ष के पास 56 विधायकों का होना है। राज्य सभा की दो सीटों के लिए 56 वोट पर्याप्त होते हैं। लेकिन उसके बाद भी परिमल नथवानी का झारखण्ड से राज्यसभा के लिए जोर-आजमाइश सब कुछ खुलकर कर कह देता है।
परिमल नथवानी के पास अकूत धन-सम्पदा है और उन पर मुंशी प्रेमचंद की लिखी प्रसिद्ध कहानी ‘नमक का दारोगा’ के पात्र पं. अलोपीद्दीन पर दिये गये संवाद जिसमें मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं – पं. अलोपीद्दीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है, पूर्णतः फिट बैठती है।
जब उन्होंने 2008 में पहली बार राज्यसभा के लिए चुनाव लड़ा था। तब भी वे निर्दलीय थे और आराम से जीते। ऐसा नहीं कि उस वक्त झारखण्ड की जनता उन्हें जानती थी या उन्हें यहां के विधायक जानते थे। उनकी देश भर में लोकप्रियता थी। उनका तो विश्वास था कि लोकप्रियता भी लक्ष्मी की ही दासी है। अगर लक्ष्मी है, तो आप लोकप्रिय है, नहीं तो अप्रिय होने में भी देर नहीं लगती। बस लक्ष्मी पर उनका अखंड विश्वास और यहां के विधायकों द्वारा लक्ष्मी पर आसक्ति ने उन्हें बिना किसी दौड़-धूप के राज्यसभा तक पहुंचा दिया था।
हमें याद हैं कि जब चौधरी चरण सिंह ने 1984 में दलित मजदूर किसान पार्टी का गठन किया था और उसके बाद बिहार में 1985 के विधानसभा चुनाव हुए। उस वक्त दानापुर में चौधरी चरण सिंह चुनाव प्रचार के लिए आये थे। बलदेव हाई स्कूल में उनका भाषण था। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर उनके साथ थे। हमें अच्छी तरह याद है कि उनके कुर्ते फटे हुए थे, कुर्ते पर थोड़ी चिप्पी भी लगी थी। धोती साधारण थी। पर उनके आवाज बुलंद थे। इस बुलंदी का कारण उनका चरित्र था।
हमें यह भी याद है कि उस वक्त उन्होंने भाषण के दौरान कहा था – हम पूंजीपतियों के पैसों पर पेशाब करते हैं। मुझे उनके पैसे नहीं चाहिए। आप जनता जो यहां चौधरी चरण सिंह जी का भाषण सुनने आये हैं। आप सभी अपने पास से एक-एक मुट्ठी चावल और एक रुपये की मदद कीजिये, यहीं हमारी पार्टी के लिए काफी है। हम इसी से पूंजीपतियों से लड़ लेंगे और बिहार को बेहतर बनायेंगे। लेकिन आज क्या है? आज का विधायक क्या कर रहा है?
हमें यह भी याद है कि जब 2008 में परिमल नथवानी झारखण्ड में राज्यसभा का चुनाव लड़ने आये थे। तब उस वक्त के प्रभात खबर ने इनकी जबर्दस्त खिचांई की थी। उस वक्त के तत्कालीन प्रधान संपादक हरिवंश के बराबर लेख इनके खिलाफ छपते रहते थे और यहां के विधायकों को संदेश देते थे कि वे अपने वोटों को हार्स-ट्रेडिंग का शिकार न बनाएं।
लेकिन यहां के विधायकों पर हरिवंश के वो आलेखों का असर नहीं पड़ा। यही हरिवंश आज दो टर्म नीतीश कृपा और एक टर्म मोदी की कृपा से राज्यसभा में हैं और उपसभापति पद को भी शोभित कर रहे हैं। यही हरिवंश, अचानक परिमल नथवानी की प्रशंसा भी करने लगे, क्यों करने लगे, वो भी प्रभात खबर में आपको मिल जायेंगे। कोई ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं। बस 2008 से लेकर 2010 तक का प्रभात खबर देख जाइये।
ऐसे भी प्रभात खबर परिमल नथवानी की प्रशंसा क्यों न करें। बेचारा समय-समय पर प्रभात खबर की ये मदद भी करता रहा है। याद करिये प्रभात खबर द्वारा आयोजित कार्यक्रम जो आशा भोसले से संबंधित था। वो बिना परिमल नथवानी के हो जाता क्या? खुद आशा भोसले जी ने ही प्रभात खबर के कार्यक्रम में एक भी बार प्रभात खबर का नाम नहीं लिया, लेकिन वो परिमल नथवानी का नाम खुब लेती रही।
अभी हाल ही में प्रभात खबर के स्टेट एडिटर विजय पाठक ने सोशल साइट फेसबुक पर लिखा है – राज्यसभा चुनाव का परिणाम क्या होगा, यह तो नहीं बता सकता… पर एक बात तो तय है, झारखण्ड में परिमल नथवानी से अधिक किसी भी राज्यसभा सांसद ने काम नहीं किया। ये वक्तव्य एक पूंजीपति के लिए एक पत्रकार द्वारा जिसे बुद्धिजीवी कहा जाता है, वो भी चुनाव के समय लिखा जाना, क्या कहता है, ये आप खुद समझिये और चिन्तन करिये कि पतन की पराकाष्ठा कहां तक पहुंच चुकी है।
जबकि सच्चाई यही है कि इसी परिमल नथवानी से आप पूछिये कि आपने (परिमल नथवानी ने) गुजरात और रिलायंस कंपनी की तुलना में झारखण्ड को क्या दिया? ये बोल नहीं पायेंगे। मैं स्वयं इनके हरमू मैदान स्थित कार्यालय में एक दो बार गया। वहां जब भी गया, तो हमें ऐसे लोग मिले, जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे और पतित लोग थे। हां, एक युवा महिला थी, नाम था – नुसरत जहां सिद्दिकी। जो आज इस दुनिया में नहीं हैं। उक्त महिला की जितनी प्रशंसा की जाय, वो कम है। उसने ईमानदारी से परिमल नथवानी के यहां अपने कार्यों को किया और स्वयं को जनसेवा में लगा दिया। लेकिन बाकी वहां ज्यादातर लोग, वहीं थे, जिनको पैसों में ही भगवान दिखता था।
2008 का राज्यसभा का चुनाव और 2026 में हो रहा चुनाव में कोई असमानता नहीं है, उस वक्त भी बाजार सजा था। इस बार भी बाजार सजा है। खरीदार आज भी है। खुद को बेचनेवाले आज भी बाजार में खड़े हैं। सौदेबाजी हो रही है। बस सौदेबाजी में तोल-मोल होने बाकी है। 2008 की तुलना में 2026 में मंहगाई भी बढ़ी है। ऐसे में 2008 की तुलना में रेट बढ़ना तय है। विधायक बनने के यही तो फायदे हैं, अभी नहीं तो कभी नहीं।
अरे झारखण्ड में विधायक बनने के बाद गोवा में फ्लैट नहीं खरीदा, दिल्ली में फ्लैट नहीं खरीदा, मुंबई में फ्लैट नहीं खरीदा, अपने बीबी-बच्चों, बेटी-दामाद, बेटा-पूतोह को स्विटजरलैंड नहीं घुमाया तो क्या फायदा? इसलिए सब मिल बोल रे…, भजन गाव रे…, छह साल के बाद फिर कोई आया है…, बोल रे…, मेरा परिमल झारखण्ड आया ओ राम जी, मेरा नथवानी झारखण्ड आया ओ राम जी…, सबको खिलाने आया, सबको पिलाने आया वो, मेरा परिमल झारखण्ड आया ओ राम जी…, मेरा नथवानी झारखण्ड आया ओ राम जी… और आगे भजन गाओ…, हरे परिमल, हरे परिमल, परिमल, परिमल हरे, हरे…, हरे नथवानी, हरे नथवानी, नथवानी, नथवानी, हरे, हरे…
