झारखण्ड भाजपा को मिल गया उसका अपना “इरफ़ान मॉडल”!
राजनीति बड़ी अद्भुत चीज़ है। नेता सुबह जिस आदत को लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा बताते हैं, शाम तक वही आदत “जनसंपर्क की आधुनिक शैली” घोषित कर दी जाती है। झारखंड भाजपा की मौजूदा हालत देखकर तो यही लग रहा है कि वर्षों तक जिस “इरफ़ान मॉडल” पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती रही, अब उसी मॉडल का फ्रेंचाइज़ी संस्करण पार्टी मुख्यालय में लॉन्च हो चुका है।
इरफ़ान अंसारी झारखंड राजनीति में सिर्फ़ एक मंत्री नहीं, बल्कि एक पूर्णकालिक “इवेंट मैनेजमेंट सिस्टम” हैं। कैमरा ऑन होते ही ऊर्जा स्तर बढ़ जाता है, बयान स्वतः निकलने लगते हैं और विवाद खुद चलकर माइक तक पहुँच जाते हैं। भाजपा रोज़ उन्हें घेरती थी, लेकिन अब लगता है कि पार्टी ने तय कर लिया है—“अगर रोक नहीं सकते, तो कॉपी ही कर लो।”
प्रदेश अध्यक्ष की कमान ऐसे नेता को सौंप दी गई जिनकी ताज़ा चुनावी उपलब्धि जनता द्वारा दिया गया “आराम करो” वाला संदेश थी। लेकिन राजनीति में हार कभी-कभी योग्यता से ज़्यादा उपयोगी साबित होती है। कुछ ही दिनों में बयानबाज़ी का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट होने लगी—“अरे, भाजपा को भी अपना इरफ़ान मिल गया!”
हजारीबाग हत्या मामले में जोश ऐसा था मानो न्याय व्यवस्था का पूरा ठेका अकेले पार्टी कार्यालय ने ले लिया हो। झारखंड बंद की घोषणा हुई, क्रांति का ट्रेलर रिलीज़ हुआ, समर्थकों ने सोशल मीडिया पर युद्धस्तर की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन जैसे ही आरोपी की राजनीतिक लोकेशन “अपने मोहल्ले” में निकली, बंद उतनी ही तेजी से वापस हो गया जितनी तेजी से आया था। जनता समझ ही नहीं पाई कि यह आंदोलन था, ट्रायल वर्ज़न था या गलती से दब गया नोटिफिकेशन।
दृश्य बिल्कुल वैसा था जैसा भाजपा वर्षों से इरफ़ान अंसारी पर आरोप लगाती रही—“जब तक आरोपी दूसरा हो तब तक क्रांति, अपना निकले तो रणनीतिक मौन।” कैमरे के प्रति प्रेम में भी दोनों नेताओं की आत्मीय समानता देखने लायक है। इरफ़ान अंसारी ने वर्षों की मेहनत से “रील राजनीति” को कला का दर्जा दिया था।
लेकिन भाजपा अध्यक्ष महोदय ने आते ही इस क्षेत्र में स्टार्टअप स्पीड पकड़ ली। अब हाल यह है कि चैंबर मीटिंग से लेकर होटल भ्रमण तक कंटेंट बन रहा है। रामदा होटल में रील बनती देख शायद खुद इरफ़ान अंसारी भी सोच रहे होंगे—“भाई साहब तो हमसे भी आगे निकल गए!”
आलोचना के प्रति संवेदनशीलता भी दोनों में कमाल की समानता पैदा करती है। इरफ़ान अंसारी आलोचना होते ही कभी नोटिस निकालते हैं, कभी डिजिटल सेना सक्रिय कर देते हैं। उधर भाजपा अध्यक्ष समर्थकों ने भी फेसबुक कमेंट सेक्शन को कुरुक्षेत्र बना दिया है। कुछ वीर योद्धा तो ऑनलाइन बहस जीतने के बाद अगले दिन अध्यक्ष जी के दरबार में ऐसे पहुँचते हैं मानो कारगिल विजय हासिल कर लौटे हों। बदले में राजनीतिक लॉलीपॉप प्राप्त कर उनका मनोबल और ऊँचा कर दिया जाता है।
रांची महानगर के कुछ स्वयंभू दरबारी भी इस मुहिम में इतने सक्रिय दिखे कि कई बार भ्रम हो जाता है—पार्टी संगठन चल रहा है या बालू घाट का टेंडर खुलने वाला है। चाल-ढाल ऐसी कि मानो हर समस्या का अंत “भाई साहब से बात कर लीजिए” पर होना तय हो। किस्मत भी दोनों नेताओं पर बराबर मेहरबान दिखती है। इरफ़ान अंसारी को मंत्री पद राजनीतिक समीकरणों की अचानक हुई बारिश में मिला, जबकि अध्यक्ष जी की लॉटरी भी संगठनात्मक मौसम बदलते ही खुल गई। मेहनत का योगदान कितना था, इस पर पार्टी कार्यकर्ता आज भी व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में शोध कर रहे हैं।
सबसे मज़ेदार समानता “कार्ड राजनीति” में दिखाई देती है। इरफ़ान अंसारी पर सवाल उठाइए तो जवाब में मुस्लिम पहचान सामने आ जाती है। अध्यक्ष जी की आलोचना कीजिए तो ओबीसी प्रतिनिधित्व ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। यानी दोनों तरफ़ सिद्धांत एक ही है—“आईना गलत है, चेहरा नहीं।”
राजनीति का सबसे दिलचस्प दृश्य तब आया, जब इरफ़ान अंसारी ने एक इंटरव्यू में अध्यक्ष महोदय की ऐसी प्रशंसा कर दी, जिसे सुनकर शायद भाजपा कार्यकर्ता भी असहज हो गए होंगे। राजनीति में विरोधी की तारीफ़ अक्सर मित्र की आलोचना से ज़्यादा खतरनाक होती है। क्योंकि जब आपका सबसे बड़ा विरोधी आपको देखकर नाराज़ होने की बजाय मनोरंजन महसूस करने लगे, तब समझ जाइए कि समस्या विपक्ष में नहीं, आपकी ब्रांडिंग में है।
अब झारखंड की राजनीति धीरे-धीरे इस निष्कर्ष पर पहुँचती दिख रही है कि भाजपा ने जिस “इरफ़ान मॉडल” का वर्षों विरोध किया, अंततः उसी का अपना संस्करण विकसित कर लिया है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि पहले उस मॉडल पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती थी, अब वही मॉडल प्रदेश अध्यक्ष कार्यालय से लाइव प्रसारित हो रहा है।
