धर्म

कर्ता हम नहीं, कर्ता ईश्वर है, हम सिर्फ माध्यम हैं, अतः यह भाव मन में रखकर कर्म करना ही सत्कर्म हैः ब्रह्मचारी गौतमानन्द

रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी गौतमानन्द ने योगदा भक्तों को सत्कर्म क्या है? सत्कर्म क्यों? और सत्कर्म कैसे? इन तीन प्रश्नों पर विशेष परिचर्चा की। साथ ही योगदा भक्तों को बताया कि कैसे सत्कर्म द्वारा व्यक्ति स्वयं का उत्थान कर, अध्यात्म द्वारा स्वयं को परिमार्जित कर सकता है? ब्रह्मचारी गौतमानन्द ने सर्वप्रथम सत्कर्म को विशेष रूप से परिभाषित करने के लिए गौतम बुद्ध और उनके शिष्य डाकू अंगुलिमाल की एक विशेष कथा सुनाई।

उन्होंने कहा कि डाकू अंगुलिमाल जब गौतम बुद्ध के सान्निध्य में रहकर आत्मपरिवर्तन कर चुका था। तब उसने एक जंगल में बैलगाड़ी में जाती हुई दो महिलाओं को देखा। जिसमें एक गर्भवती थी, जो एक बच्चे को जन्म देनेवाली प्रसव पीड़ा से पीड़ित थी। उसकी पीड़ा को देखकर वो इतना व्यथित हुआ कि गौतम बुद्ध के पास जाकर, उसकी व्यथा को कम करने की प्रार्थना की। गौतम बुद्ध ने उसी समय अंगुलिमाल से कहा कि वो प्रार्थना करें कि उसके (अंगुलिमाल के) कर्म उस महिला और उसके शिशु की रक्षा करें तथा उसका सुरक्षा कवच का काम करें। अंगुलिमाल ने गौतम बुद्ध से कहा – प्रभु वो तो अभी-अभी डाकू से मनुष्य बना है, भला उसके इतने सुंदर कर्मफल कहां हैं कि उसके कर्मफल उस महिला और उसके शिशु की रक्षा करेंगे?

तभी गौतम बुद्ध ने कहा कि ठीक है, अब ऐसा करो कि जब से तुमने सत्कर्म करने शुरु किये हैं, वे सत्कर्म उस महिला और उसकी शिशु की रक्षा करें और उसकी संपूर्ण सुरक्षा कवच का काम करें, ऐसी प्रार्थना करो। अंगुलिमाल ने ऐसी ही प्रार्थना की और देखते ही देखते प्रसव पीड़ा से व्यथित महिला ने एक शिशु को जन्म दिया और उसके सारे कष्ट दूर हो गये। अब ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए हुआ कि सत्कर्म में ऐसी शक्ति होती है कि वो आपको ईश्वर के निकट ले जाती है और आपके द्वारा की गई प्रार्थना ईश्वर द्वारा सिर्फ सुनी ही नहीं जाती, बल्कि उस पर ईश्वर द्वारा काम भी किया जाता है।

ब्रह्मचारी गौतमानन्द ने कहा कि मनुष्य अपनी गलतियों के कारण दुख भोगता है और इसके पीछे हैं उसके अंदर भरा हुआ अज्ञान। मनुष्य के अंदर धार्मिकता व आध्यात्मिकता के अभाव के कारण ही अज्ञान का जन्म होता है, जिससे वो निरन्तर दुख भोगता है। उन्होंने विस्तार से बताया कि जब हम कोई कर्म करते हैं, तो उसी समय अहंकारवश नाना प्रकार की बुराइयों का जन्म होता है और जब हमें उन बुराइयों का आभास होता है और उन बुराइयों का शमन करने का प्रयास शुरु कर देते हैं, तो हमारे अंदर आध्यात्मिकता और सत्कर्म का प्रार्दुभाव होता है, जिससे हम देवत्व की ओर जाने लगते हैं।

उन्होंने कहा कि सत्कर्म को दो धाराएं प्रभावित करती है – एक आदतें और दूसरी इच्छाशक्ति। आदतें अच्छी भी होती हैं और बुरी भी। बुरी आदतों को हम अपनी विवेकशक्ति द्वारा परास्त कर सकते हैं। जबकि दृढ़ इच्छाशक्ति से हम अपने अंदर अच्छे कर्म को बढ़ा सकते हैं और बुरी आदतों को परास्त भी कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमेशा याद रखें। इच्छाशक्ति सेनापति की तरह होती है। वो हर बुरे और अच्छे कर्म में आपको विजय दिला शक्ति है। इसलिए इच्छाशक्ति को पहले पवित्र और शुद्ध करना आवश्यक है और ये तभी होगा, जब हम कर्मयोगी हो।

उन्होंने कहा कि इसके लिए आपको अपनी इच्छाशक्ति को ईश्वर या गुरु के साथ समस्वर करना होगा, तभी आप सही मायनों में कर्म के प्रति स्वतंत्र होंगे। उन्होंने कहा सत्कर्म का अभ्यास करने के लिए आपको चार बातों पर ध्यान देना होगा। पहला सिमरन – कर्म करने के साथ-साथ ईश्वर को न भूलना ही सही मायनों में सिमरन है। सुख मिलने पर ईश्वर के प्रति आभार, दुख मिलने पर उनकी प्रार्थना और जो भी हमें कर्म मिला है, उसके प्रति निष्ठा रखते हुए ये भाव लाना कि हम जो भी कर्म कर रहे हैं, वे ईश्वर के लिए कर रहे हैं, तो ये कर्म स्वतः सत्कर्म की श्रेणी में आ जाते हैं।

उन्होंने कहा कि दूसरा है – सेवा भाव। आप जहां भी काम कर रहे हैं। जिसके लिए काम कर रहे हैं। यह सोचकर काम करें कि हम ईश्वर के लिए कर रहे हैं। ईश्वर की सेवा कर रहे हैं। तीसरा – श्रीकृष्ण का गीतोपदेश में छुपी निष्काम सेवा को देखें। आपके द्वारा किये गये कर्म का परिणाम तभी आता है, जब आप बिना परिणाम की ओर ध्यान दिये, आप सिर्फ और सिर्फ कर्म करते हैं। दरअसल इससे यह होता है कि आप कर्म को सर्वश्रेष्ठता प्रदान कर देते हैं, जिसका परिणाम अवश्यमेव ही सर्वश्रेष्ठ ही आता है।

उन्होने चौथा -गुरुजी का मार्गदर्शन दयामाता के लिए, में बताया कि ईश्वर का कार्य बोझ नहीं है, बल्कि यह सौभाग्य है। कर्ता हम नहीं, कर्ता ईश्वर है, हम सिर्फ माध्यम है, अतः यह भाव मन में रखकर कर्म करना ही सत्कर्म है। अगर आपने इस प्रकार सत्कर्म को आत्मा में प्रतिष्ठित कर लिया तो फिर असंभव कुछ भी नहीं, सब संभव है। परन्तु इसके लिए योगदा द्वारा बताया गया मार्ग ज्यादा ही प्रासंगिक व सरल है।

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