अपने जीवन में सामंजस्यता लाने के लिए आपको सर्वप्रथम स्वयं से प्रेम करना सीखना होगाः ब्रह्मचारी अतुलानन्द
रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम के श्रवणालय में रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी अतुलानन्द ने प्रेमावतार परमहंस योगानन्द जी की बातों को उद्धृत करते हुए कहा कि प्रेम ही सामंजस्यता है और सामंजस्यता ही प्रेम है। जिसने प्रेम को समझ लिया, वो ईश्वर को पा लिया। इसलिए अपने आप में सामंजस्यता लाने के लिए स्वयं से प्रेम करना सीखें। उन्होंने इसके लिए इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक को यह समझना होगा कि वो ईश्वर का प्रतिरूप है और उसी अनुरूप आपको कार्य भी करने हैं।
ब्रह्मचारी अतुलानन्द ने कहा कि आपको हृदय गान और आत्मज्ञान को समझने की कला जाननी होगी। उन्होंने कहा कि एक योगी को दुनिया में क्या हो रहा है या क्या होने जा रहा है, इससे उसको कोई मतलब नहीं होता, उसे तो सिर्फ इस बात की चिन्ता होती है कि वो ईश्वर के साथ कितने समय रहा। उन्होंने कहा कि जीवन में शांति है, संतुलन है, आप निरन्तर प्रगति में हैं तो यही सामंजस्यपूर्ण जीवन है और ये सब नहीं तो आपके जीवन में सामंजस्यता का अभाव है।
उन्होंने कहा कि समाज में सामंजस्य और असामंजस्य दोनों हैं, आप किसके प्रभाव में हैं यह आपके उपर निर्भर है। सामंजस्यता दो प्रकार की होती है – एक आंतरिक और दूसरा बाह्य। आंतरिक सामंजस्यता शरीर और मन से जुड़ा है। बाह्य सामंजस्य सामाजिकता और आर्थिक प्रभाव से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि निरन्तर ध्यान करने से जीवन जीने की कला सीखने को बल मिलता है। योगदा द्वारा ध्यान की बताई गई प्रविधियां इसमें बड़ी सहायक हैं।
उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग परफेक्ट के पीछे पड़े रहते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि इस संसार में ईश्वर को छोड़कर कोई परफेक्ट नहीं। इसलिए किसी भी व्यक्ति से परफेक्ट लव या किसी चीज की अपेक्षा रखना, वो भी पूर्णता में यह सही नहीं हैं। सच्चाई यही है कि आप जो किसी को दे रहे हैं या कर रहे हैं, वहीं आपके पास कर्मफल के रूप में लौटकर आता है। अगर आप यम-नियम का पालन नहीं करते तो आपके जीवन में कभी सामंजस्यता नहीं आ सकती।
उन्होंने श्रवणालय में उपस्थित योगदा भक्तों को सामंजस्यता जीवन में कैसे लाई जाये, उसे बड़े ही विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि जब भी आपके जीवन में कोई समस्याएं आये, तो उससे घबराये नहीं। आप उन समस्याओं की गहराई में जाये। आप ध्यान में जाये। आपको उस समस्या के निदान का उत्तर अवश्य प्राप्त होगा और उससे जो आप समस्याओं से मुक्त होंगे, जो शांति प्राप्त होगी, वो अद्भुत होगा।
उन्होंने कहा कि बहुत लोगों को बहुत सारी इच्छाएं होती हैं। इच्छाएं होना बुरी बात नहीं। लेकिन उन इच्छाओं को पूरा सिर्फ आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति ही कर सकती है। जितना आपका दृढ़ इच्छाशक्ति मजबूत होगा, आप अपनी इच्छाओं को पूरा करने में उतना ही सफल होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए समय का सदुपयोग करना भी हमें आना चाहिए। उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोगों का आधा समय तो सोने में ही निकल जाता है।
उन्होंने कहा कि इस समस्या से बाहर निकलिये। आप के पास जो छोटे-छोटे समय होते हैं, जिसको आप बेकार की कामों में जाया कर देते हैं। उन समयों को आप ध्यान में लगाएं, क्योंकि ध्यान सामंजस्यता को जन्म देने में सहायक हैं। उन्होंने कहा कि कई लोगों ऐसे होते हैं जो बाहर तो अच्छे दिखते हैं। लेकिन जैसे ही घर आयेंगे, उनका रूप और व्यवहार बदल जाता है। बुरे हो जाते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमेशा याद रखिये कि जहां आप रहते हैं। जिसके साथ रहते हैं। वो सब आपका किया-धराया है। उनके साथ आपको सामंजस्य बनाकर ही रहना होगा। हां, इस चक्कर में अपनी आदर्शवादिता को न छोड़ें। आध्यात्मिकता को न छोड़े। उन्होंने कहा कि अगर आप किसी में सुधार लाना चाहते हैं तो उसमें सुधार के बजाय, आप स्वयं में सुधार लाएं। क्योंकि आपकी बातों से ज्यादा, आपका जीवन-स्तर कैसा हैं, उसे लोग देखते हैं। आपके व्यवहार को देखते हैं। जैसे ही आप अपने में सुधार लायेंगे। आप पायेंगे कि जिसे आप बदलना चाहते थे। वे भी बदलने शुरु हो गये हैं।
ब्रह्मचारी अतुलानन्द ने कहा कि सामंजस्यपूर्ण वातावरण बनाने के लिए किसी की चापलूसी करने की जरूरत नहीं। अच्छा रहेगा कि आप सप्ताह में एक दिन मौन रहे। उस दिन लंबा ध्यान करें। अच्छा रहेगा कि जहां ग्रुप मेडिटेशन हो रहा है, वहां आप समय बिताएं। आप पायेंगे कि इसका अच्छा प्रभाव आपके जीवन में पड़ने लगा। आप महात्मा गांधी के जीवन को देखिये। वे भी मौनव्रत रखा करते थे।
