भले ही मासस पहले एक-दो सीटें ही जीतती थी, लेकिन उस जीत में भी का. ए के राय की आत्मा झलकती थी, पर मासस का माले में विलय होने के बाद वो चीजें नहीं दिखती, इसलिए मैंने माले से इस्तीफा दे दियाः हरि प्रसाद पप्पू
धनबाद के जाने माने वामपंथी नेता व मार्क्सवादी समन्वय समिति से अगाध प्रेम रखनेवाले तथा प्रख्यात का. ए के राय के विचारों के साथ जीनेवाले हरि प्रसाद पप्पू ने स्वयं को भाकपा माले से अलग कर लिया है। हरि प्रसाद पप्पू ने इस संबंध में विद्रोही24 को बताया कि जब से मासस का भाकपा माले में विलय हुआ। तभी से लेकर आज तक जिन आंदोलनों के कारण मासस जाना जाता था, वो चीजें भाकपा माले में रहते हुए दिखाई नहीं पड़ रही थी।
हरि प्रसाद पप्पू के शब्दों में भले ही मासस एक या दो सीटें यहां से जीतती थी। लेकिन उस जीत में भी ए के राय के विचार और मासस के मूल्य दिखाई पड़ते थे। वे आगे कहते हैं कि धनबाद में माफिया आंदोलन एवं अलग झारखंड आंदोलन, जो अस्सी के दशक में का. एके राय एवं विनोद बाबू के नेतृत्व में एक विशाल जनसमूह के साथ उदय हुआ था, जिसमें कोलियरी के मजदूर और गाँव के किसान एकजुट होकर इस लड़ाई को मुकाम से मंजिल की ओर ले जाने के लिए अग्रसर थे। उसी दरमियान वे मासस से जुड़े थे।
हरि प्रसाद पप्पू बताते है कि यह वह समय था, जब अस्सी के दशक में माफिया के खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन छेड़ा जा चुका था, चूँकि वे गाँव से ताल्लुक रखते थे, स्टूडेंट लाइफ में थे। इस आंदोलन से प्रभावित होकर का. एके राय के साथ उनका जुड़ना यह एक ऐतिहासिक घटना थी। पूरे कोयलांचल में माफिया, रंगदार, सुदखोर के खिलाफ जोरदार आंदोलन चल रहा था, मासस से जुड़ने के बाद उनका जुझारूपन एवं सक्रियता को देखते हुए उन्हें युवा मोर्चा का कार्य सौंपा गया। इस दौरान काफी केस-मुकदमे भी उन पर हुए।
लेकिन माफिया, सुदखोर महाजन के खिलाफ और झारखंड राज्य की स्थापना के लिए चल रहे आंदोलन में हिस्सा लेना उन्होंने बंद नहीं किया। वे युवा मोर्चा का कमान करीब उन्नीस सौ बानवे तक संभालते रहे, बाद में पार्टी के अंदर कुछ ऐसी परिस्थिति हुई, पार्टी संगठन में एक गंभीर परिस्थिति पैदा हुई, उस आपात स्थिति में मासस धनबाद जिला का अध्यक्ष भी बनाया गया।
हरि प्रसाद पप्पू कहते है कि उन्होंने का. एके राय के विचार, आदर्श, सिद्धांत, करनी और कथनी में फर्क नहीं देखा और इन उपरोक्त नीतियों को लेकर वे उनसे काफी प्रभावित रहे और का. एके राय के नेतृत्व में उनकी आचार-विचार को पूर्ण रूप से अपनाकर मासस को एक नया जुझारू आवाज दिया। का. ए के राय का सपना हमेशा लाल-हरा मैत्री का रहा है। उस समय के आंदोलनों के दौरान उनके सैकड़ों साथी शहादत हुए। जो कोयलांचल की धरती पर एक इतिहास लिखा गया, शहादत के बाद भी आंदोलन में किसी भी प्रकार की कोई कमी महसूस नहीं हुई।
एके राय का जुझारूपन और विनोद बाबू का वैचारिक तंत्र उभरकर सामने आया। इस ऐतिहासिक सच को आज भी कोयलांचल एवं झारखंड में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। एके राय की मृत्यु के पश्चात काफी कमी संगठन में देखने को मिला, जिसका कुछ लोगों ने व्यक्तिगत हित को देखते हुए मासस को माले में विलय करवा दिया। लेकिन मासस का जो आदर्श था, जो उनका आंदोलन का चरित्र था, कार्यकर्ताओं के प्रति जो लगाव था, वह धीरे-धीरे समझौतावादी नीति के तहत सत्ता की ओर अग्रसर हुआ। जो मासस का नारा था, सत्ता नहीं व्यवस्था परिवर्तन का, वो मुख्य नारा समाप्त होता गया।
आज की परिस्थिति में माले के अंदर यह जुझारूपन, सैद्धांतिक प्रतिबद्धता कहीं दिखाई नहीं दे रहा, इन तमाम सवालों को कई बार उन्होंने माले की पार्टी बैठक में उठाया। एके राय का जो मूल धारा था दलित आंदोलन, उत्पीड़ित आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन और भारत के कम्युनिस्ट पार्टी का भारतीयकरण करना, यह तमाम बुनियादी सवाल पर कोई उचित जवाब नहीं मिला, अंततः ऐसे में उनके पास माले को छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखा। आप यह भी कह सकते हैं कि माले में अपने आप को रहने के काबिल नहीं माना और अपने समर्थकों के साथ माले से इस्तीफा देकर खुद को माले से अलग कर लिया।
