अपनी बात

सवाल तो यह भी है कि क्या इस प्रकार के सोच रखनेवाले या ऐसी सोच का समर्थन करनेवाले व्यक्ति या पत्रकार किसी अखबार के संपादक भी होने लायक है?

विजय पाठक, झारखण्ड से प्रकाशित समाचार पत्र ‘प्रभात खबर’ के स्टेट हेड हैं। वो अखबार जिसका ध्येय वाक्य है – अखबार नहीं आंदोलन। उस अखबार के स्टेट हेड विजय पाठक सोशल साइट फेसबुक पर क्या लिखते हैं – ‘मुझे नहीं मतलब कौन, किसके साथ कैसा है, जो मेरा साथ अच्छा है, वह मेरे लिए अच्छा है…!!’  अब सवाल उठता है कि कोई भी सामाजिक व्यक्ति या प्रमुख पद पर बैठा व्यक्ति उसकी सोच इस प्रकार की हो सकती है? उत्तर होगा – नहीं।

कारण – जो सामाजिक व्यक्ति या प्रमुख पद पर बैठा व्यक्ति होता है, उसके लिए समाज व देश महत्वपूर्ण हो जाता है। उसकी अपनी जिंदगी, अपनी न होकर, देश व समाज के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है और अगर आप अखबार से जुड़े हैं, तो फिर आपकी जिम्मेदारी कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाती है।

जनाब विजय पाठक ने जो पंक्तियां लिखी है। उन पंक्तियों पर ही एक व्यक्ति डा. हरेन्द्र सिन्हा ने अच्छी टिप्पणी की है। उनकी टिप्पणी है – चाहे वह देश का दुश्मन भी हो? और आपके साथ अच्छा है तो आप भी उसके लिए अच्छे बने रहेंगे? और वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश सहाय ने इनके ही पोस्ट पर यह लिखकर इनकी अच्छी आरती उतार दी है, वे शब्द है – सर्वश्रेष्ठ कलियुगी नियम।

मतलब आप समझते रहिये कि आप कितने पानी में हैं? बाकी लोग तो इनके पोस्ट पर बेसिरपैर की कमेन्ट्स किये हैं, उस तर्ज पर कि ‘जो तुमको हो पसन्द वहीं बात करेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे…’ मतलब समाज में ज्यादातर लोग ऐसे ही आजकल हैं, जिनको न तो देश से मतलब है, न समाज से मतलब है, हम किसी भी निम्नतम सोच वाले व्यक्ति के आगे कितना लोटपोट कर सकते हैं और उसका कितना फायदा हम उठा सकते हैं, इसी सोच को ध्यान में रखकर वे कमेन्ट्स करते हैं।

एक पत्रकार तो कमेन्ट्स में लिखता है – यही है जीवन का व्यवहारिक पक्ष… बस भाव के साथ आनन्द लिये जीना है। अब आप बताइये, कोई बलात्कारी या देशद्रोही आपके लिए अच्छा है तो वो अच्छा हो जायेगा? वो कौन सा भाव देगा या क्या आनन्द उससे आयेगा भाई? सवाल तो यह है। ऐसी पंक्तियां जीवन का व्यावहारिक पक्ष कैसे हो सकती है?

सवाल तो यह भी है कि क्या इस प्रकार के सोच रखनेवाले या ऐसी सोच का समर्थन करनेवाले व्यक्ति या पत्रकार किसी अखबार के संपादक भी होनेलायक है? हमें तो नहीं लगता कि ऐसी सोचवाले लोग समाज या देश को एक नई दिशा भी दे सकते हैं। हमारे देश व समाज में तो महात्मा गांधी, राजेन्द्र प्रसाद जैसे असंख्य महान लोग हुए हैं, जिन्होंने ऐसी घटिया स्तर की सोच कभी रखी ही नहीं हैं। पत्रकारों में भी कई महापुरुष हुए, जिन्होंने इस प्रकार की सोच रखकर कभी न तो पत्रकारिता की और न ही ऐसे लोगों का साथ दिया। जिस व्यक्ति की इतनी गंदी सोच हो, वो भला अखबार या समाज का क्या भला करेगा?

मैंने तो प्रभात खबर में ही कार्य कर रहे लोगों से इस संबंध में बात की, तो उन्होंने साफ कह दिया कि हम इस प्रकार के निम्न सोच के लोग नहीं है कि जो हमारे लिए अच्छा रहेगा तो हम उसके लिए अच्छे रहेंगे। हम तो उस सोच के लोग है, कि कोई भले ही हमारे लिए अच्छा न रहे, पर अगर वो सभी के लिए अच्छा है तो वो ज्यादा अच्छा है।

विद्रोही24 ने अन्य अखबारों से जुड़े लोगों से भी इस संबंध में बात की, तो उनका कहना था कि अब नया युग है, नई सोच है, क्या कीजियेगा? अभी और पतन होना है, देखते जाइये, लोग कितने और किस प्रकार से गिरते जा रहे हैं? ऐसे और लोग मिलेंगे। कितना आप परेशान होंगे। अब ऐसे लोगों की ही पूछ है, तभी तो वो स्थानीय संपादक के पद से छूटते ही, उसे एक्सटेंशन मिल गया और आज वो स्टेट हेड है, लेकिन आप कहां हैं?

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