धर्म

आत्मा का क्रमिक विकास कई जन्मों जबकि शरीर का एक ही जन्म में, इसलिए जीवन का एकमात्र लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है, न कि जैसे-तैसे जीनाः स्वामी गोकुलानन्द

रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी गोकुलानन्द गिरि ने कहा कि सही तरीके से धन कमाना या जीवन जीना कही से भी गलत नहीं। लेकिन ये जीवन का लक्ष्य नहीं है। यह तो सिर्फ जीना हुआ। यह एक तरह से भटकाव है। क्योंकि जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है तो सब अच्छा लगता है, पर जैसे ही गड़बड़ी आई, तो सब कुछ बिखर जाता है।

स्वामी गोकुलानन्द ने कहा कि यही कारण है कि भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के महान संतों ने जीवन को लेकर यही कहा कि कि जीवन का एकमात्र लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति हैं, न कि जैसे-तैसे जीवन जीना। उन्होंने कहा कि योगदा सत्संग सोसाइटी सिखाता है कि कैसे सामान्य चेतना को दिव्य चेतना में बदलकर ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि हमेशा याद रखिये कि शरीर और आत्मा दोनों भिन्न है। शरीर का क्रम विकास एक ही जन्म में हो जाता है। जबकि आत्मा का विकास कई जन्मों में होता है। परमहंस योगानन्द जी ने अपने दसवें पाठमाला में इसका सुंदर चित्रण किया है। गुरुजी हमेशा कहते थे कि आत्मा के क्रम विकास के पांच चक्र है। पहला जडमय, दूसरा प्राणमय, तीसरा मन्मय, चौथा ज्ञानमय और पांचवां आनन्दमय।

उन्होंने कहा कि जडमय का अर्थ है कि आत्मा पहले चक्र में मिट्टी या जड अवस्था में होती है। दूसरे चक्र में इसका क्रमिक विकास पौधों या वृक्षों के रूप में इसलिए इस चक्र या कोष को प्राणमय कहते हैं। तीसरे चक्र में मन्मय कोष यानी आत्मा का पशु रूप में क्रमिक विकास होता है। चौथे चक्र में ज्ञानमय अर्थात् मनुष्य के रूप में क्रमिक विकास होता है और पांचवे चक्र में जब वो मनुष्य होते ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है तो यह अवस्था उसे आनन्दमय चक्र या कोष के रूप में परिवर्तित कर देती है।

उन्होंने श्रवणालय में उपस्थित सभी योगदा भक्तों को कहा कि यहां आप सभी ज्ञानमय कोष में उपस्थित है और यहां से आपको आनन्दमय कोष में जाना है। इसलिए आपका एकमात्र लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होना चाहिए। तभी आप आत्मा के क्रमिक विकास का आनन्द ले सकते हैं। चूंकि हमलोगों को पता नहीं होता कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए। यही कारण है कि हम भटक जाते हैं और ईश्वर से दूर हो जाते हैं। ज्ञानमय कोष तक आने के बाद भी आनन्दमय कोष तक पहुंचने में भटक जाते हैं।

स्वामी गोकुलानन्द ने कहा कि जो लोग ईश्वर को प्राप्त नहीं करते। उनके जीवन में हमेशा दुखों का आगमन होता रहता है और जो लोग ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं। तो उनके जीवन में फिर दुखों का आगमन न होकर, आनन्द ही आनन्द रहता है। इसलिए जो सही में अलौकिक सुख चाहते हैं, उन्हें ईश्वर की प्राप्ति की ओर कदम बढ़ाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ये संसार दो पक्षों से बना है। अगर यहां अंधेरा है तो प्रकाश भी है। यहां दुख है तो सुख भी है। चुनना आपको है कि आप चाहते क्या है? आपका जो भी स्वप्न या लालसा है, यहीं से प्राप्त होनी है। ये संसार, दरअसल मायाजाल है। इस मायाजाल से जिसने स्वयं को मुक्त कर लिया। ईश्वर को प्राप्त कर लिया, उसने जीवन का सदुपयोग कर लिया और जिसने ऐसा नहीं किया। वो बार-बार इस मायाजाल में फंसता रहेगा। ज्यादातर लोग यहां दूसरे का सुख देखकर स्वयं को उस ओर ले जाने के लिए प्रेरित करने लगते हैं, जबकि इससे अच्छा है कि इस ओर न जाकर, वे ईश्वर प्राप्ति में स्वयं को लगाये। क्योंकि अगर आपने ईश्वर प्राप्त कर लिया तो फिर बचा क्या?

स्वामी गोकुलानन्द ने श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित चार वर्णाश्रमों के बारे में बताते हुए कहा कि चूंकि आत्मा का क्रमिक विकास होने के कारण ही हम मनुष्य रूप धारण करते हैं। ऐसे में हमारा स्वभाव पशु के प्रभाव में ही रहता है। क्योंकि पशु के बाद ही मनुष्य रूपी योनि प्राप्त होती है। ऐसे में ज्यादातर लोग क्रमिक विकास के रूप में पहले शूद्र ही होते हैं। उनका काम सर्वप्रथम श्रम करना और अपने परिवार का पालन पोषण करना ही प्रमुख होता है। फिर जैसे ही उन्हें यह ज्ञान होता है कि उन्हें परिवार के पालन-पोषण के क्रम में जीवन में कुछ लाभ हानि भी होनी चाहिए तो वे वैश्य होते है। फिर जैसे ही इन्हें जीवन में न्याय-अन्याय, अच्छाई-बुराई का आभास होता है, तो ये क्षत्रिय के रूप में स्वयं को क्रमिक विकास करते हैं। लेकिन इसके बाद जैसे ही इन्हें केवल परम सत्य का अन्वेषण करने का गुण इनके अंदर समाहित होता है तो ये स्वयं को ब्राह्मण के रूप में क्रमिक विकास कर सत्य का अन्वेषण करते हुए ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं।

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णाश्रम की व्याख्या ईश्वर की प्राप्ति के उद्देश्यों को ही प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि आत्मा के क्रमिक विकास में तामस, रजस व सत्व गुण भी मुख्य भूमिका निभाती है। तामस का अर्थ बुराई की ओर जाना और रजस का अर्थ तामस और सत्व दोनों के मिश्रित गुणों को अपनाते हुए आगे बढ़ना और सत्व का अर्थ सिर्फ और सिर्फ सत्य का अन्वेषण करते हुए स्वयं को आगे बढ़ाना है।

स्वामी गोकुलानन्द ने कहा कि यही कारण है कि हमें हमेशा सत्व गुण को पकड़कर चलना है। उन्होंने कहा कि आत्मा के क्रमिक विकास में युगों की भी भूमिका है। युग चार है। सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। उन्होंने कहा कि कलियुग में केवल भौतिक व तकनीक की महत्ता है। द्वापर में भौतिक व तकनीक की ओर लोग बढ़े। त्रेतायुग में धर्म की प्रधानता रही। पर सत्ययुग में तो केवल आध्यात्मिकता ही थी। उस समय में तो केवल देवत्व ही था। इसलिए आत्मा के क्रमिक विकास में युग, गुण और कोष इन तीनों की भूमिका है। लेकिन इन सभी पर ध्यान रखकर हम क्रियायोग की सहायता से ईश्वर को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। इसे हमें भूलना नहीं चाहिए। हम अगर आज से ही क्रियायोग को अपनाकर, निरन्तर अभ्यास करें तो हम आत्मा के क्रमिक विकास का सही फायदा और ईश्वर से एकाकार होने का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

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