इस बार का झारखण्ड विधानसभा का बजट सत्र सदन के विलम्ब से चलने का रिकार्ड बनने व प्रश्नकाल में माननीयों की अनुपस्थिति के लिए जाना जायेगा
झारखण्ड विधानसभा के बजट सत्र का पहला दिन 13 मिनट, दूसरा दिन आठ मिनट, तीसरा दिन पौने दस मिनट, चौथा दिन साढ़े सात मिनट, पाँचवाँ दिन नौ मिनट, छठा दिन सात मिनट, सातवां दिन चार मिनट, आठवां दिन पांच मिनट, नौवां दिन 14 मिनट, दसवां दिन साढ़े आठ मिनट, ग्यारहवां दिन साढ़े आठ मिनट, बारहवां दिन नौ मिनट, तेरहवां दिन पांच मिनट, चौदहवां दिन साढ़े पांच मिनट, पन्द्रहवां दिन छह मिनट, सोलहवां दिन छह मिनट और सत्रहवां दिन पांच मिनट विलम्ब से प्रारंभ हुआ।
अर्थात् सत्रह दिन तक चले विधानसभा के इस बजट सत्र में एक भी दिन ऐसा देखने को नहीं मिला, जो समय पर प्रारंभ हुआ हो। अब प्रत्येक दिन इतना विलम्ब होना, नौवें दिन तो 14 मिनट के विलम्ब का रिकार्ड बना देना बताता है कि झारखण्ड विधानसभा संविधान, समय और जनता के प्रति कितनी वफादार है? सत्रह दिनों तक चले विलम्ब से सदन की कुल मिनटों को जोड़ लें तो यह पूरे 130 मिनट होता है।
जो बताता है कि इतने मिनटों में तो एक दिन का प्रश्नकाल ही पूरा समाप्त हो गया। आखिर इसके लिए दोषी कौन है? कहा जाता है कि जो समय को नहीं पहचानता, समय उसे नष्ट कर डालता है। आखिर झारखण्ड विधानसभा में कोई भी सत्र का कोई भी दिन कब समय पर प्रारंभ होगा? सवाल यह है। आप लोकसभा या राज्यसभा को देखिये अथवा अपने पड़ोस के ही किसी भी विधानसभा को देखिये। आप आश्चर्य करेंगे कि सदन समय पर प्रारंभ होता है और आसन पर अध्यक्ष हो या सभापति समय पर विराजमान हो जाते हैं और सदन समय पर शुरु हो जाता है। लेकिन झारखण्ड विधानसभा में ऐसा परिदृश्य देखने को मिले, अब आंखे तरस रही है।
इस बार के बजट सत्र में पहली बार बड़ी संख्या में देखने को मिला कि ज्यादातर विधायक (इनमें सर्वाधिक विधायक भाजपा के थे, हालांकि इसमें कई कांग्रेसी विधायक भी दिखे) सदन के प्रति ईमानदार नहीं थे। उन्होंने अपने प्रश्न अल्पसूचित व तारांकित में डाले तो थे। लेकिन उन प्रश्नों का जवाब सुनने या पूरक प्रश्न करने के लिए सदन में मौजूद नहीं थे। आसन कई बार इनके नामों को पुकारता और विवश होकर, बाद में दूसरे माननीय का नाम पुकारता और इस प्रकार प्रश्नकाल आगे की ओर बढ़ता। आश्चर्य की बात तो यह भी है कि अनुपस्थित होनेवालों में वे विधायक भी शामिल थे, जिन्हें इस बार सर्वश्रेष्ठ विधायक का पुरस्कार भी झारखण्ड विधानसभा द्वारा दिया गया है।
कई बार तो यह भी देखने को मिला कि जब कोई महत्वपूर्ण बातें चल रही होती तो माननीयों के माइक जवाब दे देते। माइक ठीक से काम नहीं करता और इतना शोर होता कि पता ही नहीं चलता कि माननीय कह क्या रहे हैं? यह तकनीकी खामियां कई बार इस बार के विधानसभा में देखने को मिली। जबकि इन खामियों को दुरुस्त करने की जिम्मेवारी सदन को देख रहे विद्युत व तकनीकी कर्मियों की हैं।
एक दिन तो विद्रोही24 ने देखा कि झारखण्ड विधानसभा टीवी में कार्यरत एक फोटोग्राफर छह मिनटों से भी ज्यादा सदन में रहकर विभिन्न माननीयों को फोटो खींचता रहा। कभी वो वेल में जाता तो कभी माननीयों के नजदीक जाकर फोटो खींचता। हद तो तब हो गई कि विद्रोही24 ने देखा कि भाजपा के आलोक चौरसिया उस फोटोग्राफर को अपने पास बुलाकर उसे बातचीत की और कागज के छोटे टूकड़े पर कुछ लिखकर दे दिया और वो फोटोग्राफर उक्त कागज को अपने पॉकेट में रख लिया। क्या एक फोटोग्राफर को इस प्रकार के कार्य करने की अनुमति वह भी चलते सदन में दी जा सकती है?
इसी बजट सत्र के समापन दिन के दिन विद्रोही24 ने देखा कि तारांकित प्रश्न के दौरान प्रदीप प्रसाद जैसे ही प्रश्न किये। उनका उत्तर देने के लिए मंत्री सदन में नहीं थे। आसन ने प्रदीप प्रसाद को कहा कि चिन्ता न करें। वे उनका उत्तर दिलवाने का कोशिश करेंगे। बाद में आसन ने प्रदीप प्रसाद को उत्तर दिलवाई।
आज विद्रोही 24 ने यह भी देखा। दर्शक दीर्घा में बैठकर आक्सफोर्ड स्कूल के छात्र-छात्रा सदन की कार्यवाही देख रहे थे। जिसे देखकर स्पीकर रबीन्द्र नाथ महतो ने कहा कि आक्सफोर्ड स्कूल के छात्र-छात्राएं सदन की कार्यवाही देख रहे हैं। देखने में आ रहा है कि पिछले कई दिनों से कई स्कूलों व संस्थानों से जुड़े लोगों में सदन की कार्यवाही देखने की ललक बढ़ी हैं। इसी क्रम में आक्सफोर्ड स्कूल के विद्यार्थी सदन की कार्यवाही देख रहे हैं। मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं।

ये पहला मौका था कि जब आसन ने दर्शक दीर्घा में बैठे किसी स्कूल में पढ़नेवाले विद्यार्थियों की चर्चा की और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। बच्चे भी रबीन्द्र नाथ महतो के इस उदारता का सहर्ष स्वागत किया और दर्शक दीर्घा में ही खड़े होकर उनका आभार प्रकट किया। जब अध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो ऐसा बोल रहे थे, तब उस वक्त स्कूल के मालिक भाजपा विधायक कुशवाहा शशि भूषण मेहता सदन में मौजूद थे और इस घटना से अभिभूत थे।
स्पीकर के इस वक्तव्य पर कई लोगों ने कहा कि इन सत्रह दिनों में कई स्कूल व कई संस्थान के बच्चे यहां आये। सदन की कार्यवाही देखी और चलते बने। ऐसा नहीं कि ये पहली बार हुआ है। सदन की कार्यवाही जब भी चलती है। तो निजी स्कूलों, भाजपा व अन्य दलों के विधायकों द्वारा चलाई जा रही स्कूलों के लोग अपने-अपने संस्थानों के बच्चों को यहां लाते हैं। लेकिन सभी स्कूलों को आक्सफोर्ड स्कूल जैसा सौभाग्य नहीं मिला, साथ ही उस स्कूल के मालिक व पांकी के भाजपा विधायक शशि भूषण मेहता को सदन में रहते मिल गया।
अंत में, झामुमो विधायक समीर मोहंती द्वारा सदन में किये गये असंसदीय भाषा का प्रयोग और इसके लिए भाजपा विधायक नीरा यादव द्वारा दूसरे दिन किया गया हंगामा तथा संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा मांगी गयी माफी को लोग भूल नहीं पायेंगे। किसी भी विधायक को कोई भी वक्तव्य देने के पहले सोच-समझकर कोई बात बोलना चाहिए कि इसका प्रभाव क्या पड़ेगा? किसी ने ऐसे ही नहीं कह दिया – बोली एक अमोल है, जो कोई बोले जानि। हिय तराजू तौलिके तब मुख बाहर आनि।।
