अपनी बात

2029 में भी हेमन्त सोरेन ही आयेंगे, वो भी और अधिक शक्तिशाली बनकर, भाजपा डबल डिजिट में भी दिखेंगी, इसकी संभावना अब बहुत कम

प्रदेश व केन्द्र के शीर्षस्थ भाजपा नेताओं को चाहिए कि वो राज्य के प्रथम बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी की सुध लें। वे आजकल बहुत कुछ लिख रहे हैं। कहा जाता है कि ज्ञान कहीं से मिलें, ले लेने में कोई बुराई नहीं हैं। नहीं तो जो होना है, उसे कौन रोक सकता है? विद्रोही24 का तो मानना है कि जो राज्य की वर्तमान स्थितियां हैं। 2029 में भी हेमन्त सोरेन ही आयेंगे, वो भी और अधिक शक्तिशाली बनकर और भाजपा डबल डिजिट में भी दिखेंगी, इसकी संभावना कम है।

क्योंकि भाजपा फिलहाल किसी की नहीं सुन रही और यहीं इसके लिए सबसे बड़ी बाधा के रूप में दिखाई बन रही है। इधर हेमन्त सोरेन ने मुख्यमंत्री के रूप में स्वयं को बार-बार सिद्ध किया है कि वे वर्तमान में झारखण्ड में किसी भी दल के नेताओं से बीस है। अब जरा देखिये नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी ने क्या लिखकर भाजपा को झकझोरने की कोशिश की है …

आत्ममंथन का समय: कश्ती, किनारे और जिम्मेदारी

“हमको तो अपनों ने लूटा, ग़ैरों में कहाँ दम था, मेरी कश्ती वहीं डूबी जहाँ पानी बहुत कम था…” केंद्र की सरकार एक वोट से गिरने के बाद बिहार के गोपालगंज में अपने भाषण की शुरुआत इन पंक्तियों से करने वाले आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने उस समय केवल राजनीतिक पीड़ा व्यक्त नहीं की थी, बल्कि लोकतंत्र में आत्ममंथन की आवश्यकता को भी रेखांकित किया था। उनका संकेत स्पष्ट था — बाहरी विरोध से अधिक खतरनाक आंतरिक असंतोष और समन्वय की कमी होती है।

आज जब झारखंड के नगर निकाय चुनावों में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, तो स्वाभाविक है कि राजनीतिक विश्लेषण शुरू हो। हर चुनाव परिणाम कई कारकों का समुच्चय होता है — स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशियों की स्वीकार्यता, संगठन की सक्रियता, और मतदाताओं की अपेक्षाएँ। नगर निकाय चुनाव विशेष रूप से स्थानीय नेतृत्व की विश्वसनीयता और संगठनात्मक मजबूती की परीक्षा माने जाते हैं।

इन परिणामों को केवल विपक्ष की रणनीति या परिस्थितिजन्य कारकों से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में पराजय भी एक संदेश लेकर आती है। यह संदेश हो सकता है कि जमीनी स्तर पर संवाद और समन्वय को और सशक्त करने की आवश्यकता है। यह संकेत भी हो सकता है कि स्थानीय मुद्दों और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को अधिक गंभीरता से समझने की जरूरत है।

अटल जी की पंक्तियाँ इस संदर्भ में प्रासंगिक प्रतीत होती हैं — कश्ती का डूबना हमेशा तूफ़ान का परिणाम नहीं होता; कभी-कभी संतुलन और दिशा की कमी भी कारण बनती है। राजनीतिक दलों के लिए यह आत्ममूल्यांकन का अवसर है कि संगठनात्मक ढाँचे, नेतृत्व और कार्यकर्ता-समन्वय को किस प्रकार और मजबूत किया जाए।

चुनावी राजनीति में जीत और हार दोनों अस्थायी हैं, परंतु उनसे मिलने वाले सबक स्थायी हो सकते हैं। झारखंड के नगर निकाय परिणामों को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए — न अतिरंजना, न निराशा; बल्कि संयमित समीक्षा और सुधार की प्रतिबद्धता। लोकतंत्र में जनता का निर्णय अंतिम होता है। उसे स्वीकार कर, संवाद और विश्वास की नई शुरुआत करना ही किसी भी राजनीतिक दल की परिपक्वता का संकेत है।

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