धर्म

आध्यात्मिक उन्नति के लिए अब एक दिन का डिजिटल उपवास भी समय की मांगः स्वामी पवित्रानन्द

जिस प्रकार शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने के लिए विशेष पर्व-त्यौहारों, अनुष्ठानों पर उपवास करते हैं, ठीक उसी प्रकार समस्त बुराइयों से दूर होने के लिए, स्वयं को मानसिक व आध्यात्मिक रूप से शांत करने के लिए सप्ताह में आप एक दिन का डिजिटल उपवास भी रखें। इस डिजिटल उपवास में आप कोई एक दिन जैसे रविवार ही चुन लीजिये और उस दिन संडे को नो मोबाइल डे मनाइये, यानी उस दिन हम मोबाइल का यूज नहीं करेंगे। उस दिन को सिर्फ और सिर्फ ध्यान और साधना में लगायेंगे। ये आपके आध्यात्मिक उन्नति के लिए सर्वोत्तम होगा।

उक्त बातें आज योगदा सत्संग आश्रम में स्थित श्रवणालय में योगदा भक्तों के बीच रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी पवित्रानन्द ने कही। स्वामी पवित्रानन्द ने कहा कि आज की डिजिटल युग में हमारी जिंदगी को सर्वाधिक किसी ने प्रभावित किया है, तो वह है मोबाइल और नाना प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट। हमें लगता है कि इसके बिना हमारी जिंदगी अधूरी है, लेकिन सर्वाधिक जिंदगी को इसी ने प्रभावित कर दिया है।

उन्होंने कहा कि ध्यान के समय हमेशा मोबाइल से दूर रहे। अच्छा रहेगा कि ध्यान के समय मोबाइल का स्विच ऑफ रखे या उसे साइलेंट मोड में डाल दें। इससे आपका ध्यान प्रभावित नहीं होगा। क्योंकि ज्यादातर देखा गया कि ध्यान के समय जब आपका मोबाइल ऑन रहता है, आप तुरन्त एक्स, वाई, जेड के चक्कर में पड़कर, बेकार में आप ध्यान का समय गंवा दिये होते हैं।

उन्होंने इसी पर एक सुंदर दृष्टांत सुनाया कि एक बार जब उन्होंने एक मकड़ी को जाल में पड़े देखा। तब उन्होंने उसकी जाल में एक कागज के छोटे टुकड़े फेंके। उन्होंने देखा कि जाल में फंसे कागज की ओर मकड़ी दौड़ी और जब उसे अपने लिए ठीक नहीं पाया। तब उसने जल्द ही उक्त कागज के टुकड़े को अपनी जाल से अलग कर दिया। उन्होंने यह प्रक्रिया बार-बार अपनाई। मकड़ी ने बार-बार ऐसा ही किया। उन्होंने इस दृष्टांत से यह बताया कि जब मकड़ी जैसी जीव, जो उसके लिए बेकार की चीजें हैं, उससे खुद को अलग कर रही होती है, तो हम और आप बेकार की चीजों में फंसने को क्यों तैयार हैं? आप क्यों नहीं सोचते कि ये मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट वर्तमान में हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बड़ी बाधाएं साबित हो रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि आत्मानुशासन, अच्छे आचरण, ध्यान, परमहंस योगानन्द जी द्वारा बताई गई वैज्ञानिक प्रविधियां, क्रिया योग व गुरु द्वारा दी गई पाठमाला का निरन्तर अभ्यास आपकी सारी बुराइयों का अंत करने में प्रमुख भूमिका निभाती और साथ ही हमें ईश्वर की ओर आसानी से ले जाने में हमारा मार्ग प्रशस्त करती है।

उन्होंने कहा कि आप कभी अपनी बुरी आदतों के वशीभूत न हो। बल्कि अच्छी आदतों को अपनाने में समय लगाएं। ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, प्रलोभन में आना, नाना प्रकार की इच्छाओं में मन लगाना ये सभी बुरी आदतें आपको ईश्वर से दूर करती है। नकारात्मकता तो कभी आपका भला कर ही नहीं सकती। अगर कोई बुराई आपके जीवन को तबाह करने में लगी है। तो उससे दूर रहने की प्रतिज्ञापन करिये और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से उससे दूरी बनाएं।

उन्होंने कहा कि आप एक अच्छा वातावरण चुने। अच्छा वातावरण आपके दृढ़ इच्छाशक्ति से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि जैसा आपका वातावरण होगा, वो वातावरण न चाहकर भी आपको प्रभावित करके ही रहेगा। इसलिए हमेशा अपने आस-पास अच्छा वातावरण बनायें या अच्छे वातावरण में रहना सीखें।

उन्होंने कहा कि जैसे आपके लिए सुबह का नाश्ता, दोपहर व रात्रि का भोजन आपके शरीर के पोषण के लिए जरुरी है। ठीक, उसी प्रकार सुबह का व्यायाम, निरन्तर ध्यान और क्रियायोग भी आध्यात्मिक उन्नति के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है। ध्यान की महत्ता को लेकर, स्वामी पवित्रानन्द ने एक अपने जीवन से जुड़ी एक सुंदर कहानी सुनाई।

उन्होंने कहा कि एक बार रांची स्थित योगदा आश्रम में वे जब सुबह टहल रहे थे। तभी एक कॉलेज स्टूडेंट उनके पास पहुंचा और सवाल पूछा। स्वामी जी, आप कब से ध्यान करते रहे हैं। उन्होंने, उत्तर दिया – करीब 36 वर्ष हो गये। कॉलेज स्टूडेंट ने दूसरा सवाल दागा, तो क्या आप इससे आपने स्वयं को मुक्त कर लिया है? उन्होंने उत्तर दिया कि हां, मैंने स्वयं को मुक्त कर लिया है। कॉलेज स्टूडेंट ने फिर पूछा कि मैं कैसे मान लूं कि आपने स्वयं को मुक्त कर लिया है? पवित्रानन्द ने कहा कि चूंकि हमारे अंदर ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि नहीं हैं। कोई किसी प्रकार की इच्छा नहीं हैं। इसलिए मैं कह सकता हूं कि मैंने खुद को मुक्त कर लिया है और ये सब लगातार निरन्तर ध्यान से ही हुआ है। कॉलेज स्टूडेंट प्रसन्न होकर, उनसे उत्तर पाकर विदा लिया।

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