सही मायनों में जो योगी होता है, उसके हृदय में सिवाय ईश्वर प्राप्ति के और कोई इच्छा नहीं होती, इसलिए आपके जीवन का उद्देश्य सिर्फ ईश्वर प्राप्ति होनी चाहिएः स्वामी अमरानन्द
रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में आज रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए अतिवरिष्ठ संन्यासी स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि जो सही मायनों में संन्यासी या योगी होता है, उसके हृदय में किसी प्रकार की इच्छा/चाहत नहीं होती, सिवाय ईश्वर प्राप्ति के, वो अपने अंदर की सारी बुराइयों जैसे अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, वैमनस्यता आदि को भस्मीभूत कर चुका होता है। वो सिर्फ अपनों के लिए ही नहीं, बल्कि उसके द्वारा की गई प्रार्थना में सभी के कल्याण की भावना छिपी होती हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं कि ऐसे संन्यासी/योगी अपने अंदर की सारी बुराइयों को निरग्नि में क्रियायोग के द्वारा भस्मीभूत कर देते हैं। स्वामी अमरानन्द गिरि के शब्दों में केवल योगी ही अपनी सारी इच्छाओं से स्वयं को मुक्त कर सकते हैं। ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर सकते हैं। परमसुख को प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे सुंदर भाव को केवल प्रेम से ही पाया जा सकता है, जैसा कि परमहंस योगानन्द जी कहा करते थे कि केवल प्रेम ही उनके स्थान को भर सकता है।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि जीवन में प्रेम, ज्ञान और शुद्धता का विशेष महत्व है। जीवन को जितना सरल बनाये रखेंगे, आप उतने ही आनन्द में रहेगे और जीवन को जितना आप जटिल बनायेंगे, उतना ही आप आनन्द से दूर होते चले जायेंगे। यदि अपने जीवन को सरल बनाना है, आनन्दमय बनाना है तो आप गुरु/ईश्वर की शरण में जाये, उनका अनुसरण करें, आध्यात्मिक पथ को अपनाये, इससे आप शत् प्रतिशत आनन्द का अनुभव करेंगे।
स्वामी अमरानन्द ने कहा कि कोई भी कर्म करें, उस कर्म को लेकर उसके परिणाम या फल की चिन्ता न करें। इसका त्याग करना सीखें।यही सही मायने में प्रत्याहार है। उन्होंने कहा कि जब आप योगदा से जुड़ते हैं। आश्रम में आते हैं, तो आप सही पथ को चुनते हैं। यहां आने से आप ध्यान के माध्यम से ईश्वर की ओर कदम बढ़ाते हैं। यहां आपका हृदय शुद्ध होता है। यही हृदय की शुद्धता आपको ईश्वर के निकट ले जाती है, क्योंकि बिना हृदय को शुद्ध किये ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि मन को कभी दुख, ईर्ष्या, अहंकार आदि से प्रदूषित नहीं होने दीजिये। इन सारे विकारों से मन को आप मुक्त रखें। मन को इन विकारों से मुक्त करना संभव है। योगदा की तकनीकें आपको इनसे मुक्त रहने में मार्ग पप्रदर्शित करेंगी। बेकार की बातों में मन को लगाने से अच्छा है कि अच्छी किताबें पढ़े, गुरुजी की पाठमालाओं में रुचि दिखायें। उन्होंने कहा कि आप हमेशा ईश्वर को प्रथम स्थान में रखिये, जीवन का उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति ही हैं और बाकी सारी चीजें बेकार हैं।
स्वामी अमरानन्द ने कहा कि वर्तमान में वंदे मातरम् गीत की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। उस वंदे मातरम में बंकिमचंद्र चटर्जी ने उस दिव्य शक्ति का आह्वान किया है। वो दुर्गा है। वो वंदे मातरम् के माध्यम से मां की आराधना कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं कि वो सारी अविद्या से सभी को मुक्त करें, इससे अच्छी राष्ट्र की आराधना और क्या हो सकती है?
उन्होंने बार-बार कहा कि जब आप किसी से घृणा कर रहे होते हैं तो आप स्वयं को विनाश की ओर ले जा रहे होते हैं और जैसे ही प्रेम करना सीखते हैं आप स्वयं को आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर कर रहे होते हैं। एक स्वच्छ व सुंदर मस्तिष्क ही जीवन के उद्देश्यों को पूरा कर सकता है। हमेशा ईश्वर प्राप्ति के लिए स्वयं को एक्टिव रखें, इस कार्य में कभी आलस्य को जन्म लेने न दें।
