अपनी बात

झारखण्ड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता की व्यथाः जब एक स्कूल में भ्रष्टाचार रोकने पर 75 झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं, तो सोचिए देश में मोदी सरकार व मोदी जी पर क्या-क्या षड्यंत्र होता होगा?

अभय कुमार मिश्रा, रांची स्थित झारखण्ड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। विवेकानन्द विद्या मंदिर के सचिव भी हैं। जब वे 2015 में विवेकानन्द विद्या मंदिर के सचिव बने, तब से लेकर आज तक उन पर 75 झूठे मुकदमे ठोक दिये गये। ये मुकदमे इसलिए नहीं ठोके गये कि वे भ्रष्टाचारी थे। बल्कि इसलिए ठोके गये, क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ तगड़ा एक्शन लेना शुरु कर दिया। एक छोटे से विद्यालय में भ्रष्टाचार रोकने का प्रयास शुरु किया। फिर क्या था, सारे भ्रष्टाचारी एक हो गये और शुरु हो गई, उनके खिलाफ मुकदमेबाजी।

लेकिन उसके बावजूद भी ये बंदा शांत नहीं बैठा। आज भी अपने ऊपर मुकदमा करनेवालों के खिलाफ हिमालय की तरह शान से खड़ा है और अपने विरोधियों की हर मुकदमे की हवा निकाल दे रहा है। अभय कुमार मिश्रा अपने फेसबुक पर लिखते है कि उन्होंने एक छोटे से विद्यालय में 2015 से भ्रष्ट्राचार रोकने का प्रयास किया, नतीजा ये निकला कि उन पर 75 झूठे मुकदमे दर्ज कर दिये गये। वे आगे कहते है कि लोग कहते हैं कि मोदी जी भ्रष्टाचार नहीं रोक पाते। पर उन्होंने (अभय मिश्रा ने) तो विवेकानंद विद्या मंदिर में भ्रष्ट्राचार रोकने का अथक प्रयास किया, रोक भी दिया बहुत हद तक, मगर बदले में उन्हें बहुत परेशान भी होना पड़ा।

अभय कुमार मिश्रा लिखते है कि केस सिर्फ उन्हीं के ऊपर नहीं हुआ। उनकी पत्नी, बुजुर्ग अध्यक्ष, सभी के सभी कार्यकारी सदस्यों और प्रधानाचार्य पर भी मुकदमे ठोक दिये गये। वो भी मिथ्या, कपोल कल्पित मुकदमा। वे आगे लिखते है कि अरे इस राष्ट्र में भ्रष्ट्राचार व्यक्ति के खून में सम्मिलित हो चुका है। यह हर व्यक्ति के खून में शामिल हैं, तो कैसे अलग होगा?

बमुश्किल सैकड़ों में दो चार व्यक्ति होते हैं, जो नैतिकता पर खड़े होते हैं, ईमानदार होते हैं, निःस्वार्थ भाव से समाज सेवा, पूजा पाठ, भजन में, भक्ति में खुद को शामिल कर अपनी जीवनशैली बना ली है। बाकी तो 97% बेईमान, अकर्मण्य, कामचोर, भ्रष्टाचारी, अनैतिक आचरण व अवगुणों के खान वाले लोग है।

वे आगे लिखते हैं कि वे विवेकानंद विद्या मंदिर का सचिव 2015 में निर्वाचित हुए। उसके बाद उनके पास 2014 की एक संचिका आई। कर्मचारी द्वारा बताया गया, यह कार्य आपके पूर्व की समिति ने कार्यादेश जारी किया था। आज कार्य पूर्ण हुआ है। आपको कार्य पूर्ण होने का अनापत्ति प्रमाण-पत्र और बचे हुए भुगतान का चेक साइन करना है। अभय मिश्रा ने कर्मचारी को कहा कि वे क्यों साइन करेंगे? पहले एक समिति गठित करें। वो मुझे जांच प्रतिवेदन दे, सभी कार्य पूर्ण है। बाजार भाव कितना है? विद्यालय कितने में खरीदा है? आदि।

अभय मिश्रा ने उक्त कर्मचारी से पूछा कि आपका पद क्या है? उसने जवाब दिया कि सर मैं कार्यालय प्रमुख हूं। उन्होंने कार्यालय प्रमुख से पूछा कि क्या आपको डिक्टेशन लेना आता है? कार्यालय प्रमुख ने कहा कि जी सर मेरी पहली नियुक्ति ही,स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर हुई थी। मगर इस विद्यालय में कभी किसी ने विगत 20 वर्षों में मुझे डिक्टेशन दिया नहीं है, इसलिए वो भूल गया है। अभय मिश्रा ने कहा कि कोई बात नहीं, चलिए लिखते हैं। आप भी सिख जायेंगे फिर से। कार्यालय प्रमुख ने कहा कि आज सादे पन्नों में लिख लेता हूं। कल स्टेनो पैड ले आऊंगा। अभय मिश्रा ने तुरंत सारी बातों को लिखवाया।

इधर जांच समिति गठित कर दिया गया। बाजार भाव क्या था, विद्यालय में कितने में खरीदा गया जांच प्रतिवेदन दे। बाद में पता चला, दस हजार रुपए का एक सामान 34,000 रुपए में खरीदा गया। 970 रूपए का स्पीकर 1600 रुपए में खरीदा गया। 2015 में दाम था 1160 रुपए, 2014 में 970 रूपए। जांच प्रतिवेदन में मूल्य के अलावा, सब कुछ लगा हुआ मिला।

जांच समिति के प्रतिवेदन के उपरांत अभय मिश्रा ने कार्यालय प्रमुख को फिर बुलाया तुरंत कंपनी को पत्र लिखकर दिलवाया कि यह कम्पनी विद्यालय को इतना मंहगा सामान क्यों दिया? जबकि बाजार मूल्य कम है। अभय मिश्रा कहते है कि जैसे ही सब को पता चला कि कंपनी से सवाल पूछे जा रहे हैं। भ्रष्टाचारियों के बीच हाय-तौबा मच गई। सभी अभय मिश्रा के पास आ गये और बोले – नहीं नहीं दुकान को पत्र नहीं लिखे। यानी गजब तमाशा, गजब निवेदन, पूर्व कार्यसमिति के सदस्यों का।

अभय मिश्रा कहते है कि वे ये सब देखकर भौचक्के रह गये। फिर भी वे नहीं माने और कहा कि वे कंपनी से पूछेंगे कि वो इतना महंगा क्यों दिया और उससे पैसा भी वापस लिया जायेगा। नहीं तो मुकदमा दर्ज किया जायेगा। अभय मिश्रा आगे लिखते है कि जैसे ही मुकदमा की बात आई, ये सारे लोग अध्यक्ष के पास दौड़ पड़े। अध्यक्ष ने कहा कि छोड़ दीजिये पैसा वापस लेने के चक्कर में विवेकानन्द विद्या मंदिर बदनाम हो जायेगा। अध्यक्ष के यह कहने पर अभय मिश्रा ने बात टाल दी और छोड़ दिया।

अभय मिश्रा कहते है कि दरअसल उन्होंने ही उन्हें सचिव का दायित्व सौंपा था। इसलिए त्याग पत्र देकर तीन बार इस संस्था से वे चल दिये। इसी दिन से उनका विरोध होना शुरु हुआ। जो आज भी चल रहा है। वो विरोध करते रहे वे (अभय मिश्रा) विकास करते रहे। अभय मिश्रा आगे लिखते है कि जब एक मात्र स्कूल में भ्रष्ट्राचार रोकने पर 75 झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं। तो सोचिए देश में मोदी सरकार व मोदी जी पर क्या क्या षड्यंत्र होता होगा? वे कहते है कि यह घटनाक्रम सन् 2015 के अगस्त महीने की है।

अभय मिश्रा कहते है कि आज के उन्होंने कभी भी पूर्व क्रय समिति के उपर लेख नहीं लिखा था, बार बार अध्यक्ष की बात याद कर। गर वे लिखना शुरू करें, साक्ष्य लगाना शुरू करें, तो यह जो मिथ्या, कपोल-कल्पित, पुलिस के सहयोग से, प्रशासनिक पदाधिकारी व एक नेता के गठबंधन से, विगत 20 वर्ष से विवेकानंद विद्या मंदिर से अर्थ दोहन के लिए लड़ रहे है ना, उसका तेल का तेलंगाना निकल जाएगा।

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