मौन में जाइये, प्रतिज्ञापन करिये, स्वयं को शांत रखिये, ये सारे कदम आपको आनन्द और ईश्वर की ओर ले जायेंगेः शाम्भवानन्द
मौन में जाइये, प्रतिज्ञापन करिये, स्वयं को शांत रखिये – ये सारे कदम आपको आनन्द की ओर ले जायेंगे। आपको ईश्वरीय मार्ग की ओर प्रेरित करेंगे। अगर ईश्वर से वार्तालाप करना सीखना है, तो मौन में रहना सीखिए। व्यर्थ की बात करने से आप ईश्वर से दूर होते चले जायेंगे। आपका मन चंचलता की ओर बढ़ जायेगा। आप आनन्द से दूर होते चले जायेंगे। उक्त बातें आज रांची के योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी शाम्भवानन्द ने योगदा भक्तों के बीच कही।
उन्होंने कहा कि हमेशा अपने मन को ध्यान में लगाये, यही ध्यान आपको आपके मन को मजबूत बनायेगा। योगदा की सारी तकनीकें जैसे- ऊर्जान्वित करनेवाला व्यायाम, हं-सःतकनीक, ओम तकनीक, क्रिया योग ये सभी आपके मन को मजबूत बनाते हैं। आपके मन में उत्पन्न होनेवाली विभिन्न प्रकार की वृत्तियों को नियंत्रित करते हैं।
शाम्भवानन्द ने कहा कि आप हमेशा यह कहिये कि आप ईश्वर की संतान है। आपका कोई नुकसान नहीं कर सकता। ईश्वर सदैव आपके साथ हैं। – इस प्रकार के आप प्रतिज्ञापन को बार-बार दुहराइये। ये प्रतिज्ञापन आपको ईश्वर के पास लाकर खड़ा कर देगा। भजन, आध्यात्मिक पाठ व गुरु का मानसिक दर्शन भी आपके मन को शुद्ध करने में बड़ी भूमिका निभाता है। इसलिए भजन, आध्यात्मिक पाठ व गुरु का मानसिक दर्शन अवश्य करें। जो आपके हृदय को स्पर्श व पवित्र करता है। आप इन प्रक्रियाओं से स्वयं को आलोकित कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि ईश्वर के सान्निध्य का प्रयास व उनका जप आपके बाह्य व आंतरिक परिवेश सभी को प्रकाशमय कर देती हैं। अगर आप सचेत रुप से, सच्चे मन से नकारात्मक शक्तियों का काउंटर करें, तो नकारात्मक शक्तियां आपके ऊपर प्रभाव नहीं डाल पायेंगी। आप खुद को परिवर्तित करेंगे तो आप सामनेवाले को भी परिवर्तित कर सकेंगे।
उन्होंने कहा कि आंतरिक परिवेश को आध्यात्मिक तरीकों से आप परिवर्तित कर सकते हैं। वातावरण दो प्रकार के हैं एक-बाह्य और दूसरा आंतरिक। हमारा संस्कार, प्रवृत्तियां, विचार ये सब आंतरिक वातावरण में आते है। जबकि बाह्य वातावरण में हमारे आसपास का परिवेश और उससे उत्पन्न होनेवाली परिस्थितयां हैं। इन सब पर मन द्वारा विजयी पाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अगर मन को ज्ञान या ध्यान द्वारा आपने नियंत्रित कर लिया है। तो फिर क्या कहने। सकारात्मक हो या नकारात्मक विचारें, ये सभी स्पन्दन उत्पन्न करते हैं और इन्हीं स्पन्दनों के द्वारा ही हम नियंत्रित होते हैं। जब आप तीर्थ पर जाते हैं। तो यहां बाह्य परिस्थितियों को जानने के लिए यहां न जाये। आप स्वयं के अंदर में क्या महसूस कर रहे हैं। वहां बिखरी स्पन्दन को महसूस करने का प्रयास करें। आप योगदा आश्रम में भी आयें तो यहां के स्पन्दन को महसूस करिये। आपके आसपास के परिवेश आप पर ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इसलिए हमेशा बेहतर परिवेश में रहने का प्रयास करें।
उन्होंने कहा कि परिवेश ऐसा होना चाहिए, जो हमें ईश्वर की ओर ले जाए, ऐसा परिवेश कभी नहीं स्वीकार करें, जो आपको ईश्वर से दूर कर, आपके मन को अशान्त कर दें। ये तभी हो सकता है, जब आपका मन स्ट्रांग रहेगा। परमहंस योगानन्द जी कहा करते थे कि हमेशा ईश्वर के विचारों की चादर को ओढ़ने का प्रयास करें। ये आपको नकारात्मक शक्तियों से आपको दूर रखेगा।
