अपनी बात

प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान के खिलाफ विस्थापितों ने आयोजित किया प्रेस कांफ्रेस, लगाये गंभीर आरोप

ये कितने शर्म की बात है। पत्रकारों के लिए तो डूब मरने की बात है। लेकिन क्या उन पत्रकारों, उन संपादकों या उन अखबारों को शर्म आयेगी। जिन्होंने इस प्रकार के कुकर्म में भाग लिया। आप किसी इलाके में घटी घटना, जिसमें सैकड़ों लोग उपस्थित हैं। किसी थाना क्षेत्र के मेन चौक पर उस थाना प्रभारी का पुतला दहन कर देते हैं और आप उस समाचार को ही पूरी तरह से डकार जाते हैं, क्योंकि आपके थाना प्रभारी से मधुर संबंध हैं, क्योंकि आपके मनोरथ उससे सिद्ध होते हैं।

ऐसे में वे आंदोलनकारी लोग तो आपके (उन अखबारों, जिन्होंने समाचार को अपने अखबारों में जगह नहीं दी) खिलाफ आक्रोशित होंगे ही, आंदोलित होंगे ही, जिन्होंने इस प्रकार का आंदोलन किया और आप अखबार होकर, पत्रकार होकर उनके समाचार को ही पूरी तरह से डकार गये। दूसरे दिन अपने अखबार में उनके समाचार को जगह ही नहीं दिया, एक शब्द नहीं लिखा।

शायद इन्हीं बातों को लेकर बोकारो के कथारा में बड़ी घटना घट गई। जहां कथारा कोलियरी के स्थानीय विस्थापितों ने आज शनिवार को कृष्ण चेतना क्लब कथारा में झारखण्ड के प्रमुख अखबारों प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान व दैनिक जागरण के खिलाफ ही प्रेस कांफ्रेस आयोजित कर दिया और इन अखबारों पर आरोप लगाया कि गत गुरुवार अर्थात् 22 जनवरी को कथारा चौक पर थाना प्रभारी राजेश प्रजापति का पुतला दहन किया गया था।

जिसमें काफी तादाद में ग्रामीणों और विस्थापितों की मौजूदगी थी। लोगों ने राजेश प्रजापति के खिलाफ नारे भी लगाये। लेकिन इन अखबारों के लोगों ने पत्रकारिता धर्म का निर्वहण नहीं किया। एक प्रमुख समाचार को एक थाना प्रभारी के हित में दबा दिया गया और जनहित से जुड़े समाचार को स्थान नहीं दिया गया।

प्रेस कांफ्रेस में शामिल नेताओं का कहना था कि अखबार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, अगर अखबार समाचार को दबाने लगे, तो फिर आम जनता तो तबाह हो जायेगी। अखबारों से ही तो आशा बंधती है कि वे जनहित में कार्य करेंगे। लेकिन अखबार व पत्रकार अगर थाना प्रभारी के हितों पर बलिहारी जायेंगे तो आम जनता को दिक्कते आयेंगी ही।

प्रेस कांफ्रेस में उपस्थित नेताओं ने कहा कि कथारा सीसीएल प्रबंधन एवं कथारा ओपी प्रभारी की उदासीनता एवं हठधर्मिता के कारण विस्थापित एवं स्थानीय मजदूर आक्रोशित है, अगर प्रबंधन द्वारा विस्थापितों को उचित सम्मान एवं रोजगार के लिए हक अधिकार नहीं दिया गया, तो जल्द ही चक्का जाम व उग्र आंदोलन कर हक और अधिकार की लंबी लड़ाई लड़ी जायेगी।