अपनी बात

बेचारे रघुवर, न राष्ट्रीय अध्यक्ष, न प्रदेश अध्यक्ष, मीडिया के चिरकुट पत्रकारों और कनफूंकवों ने उनकी ऐसी इमेज बनाई कि बेचारे के पास मुंह लटकाने के सिवा कुछ नहीं बचा

बेचारे रघुवर! रांची के अखबारों, विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करनेवाले कुछ चिरकुट टाइप के पत्रकारों, यू-ट्यूबरों और उनके संग रहनेवाले कनफूंकवों ने एक साल पहले ऐसा माहौल बनाया कि ये सब रघुवर दास को एक साल पहले ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने पर तूल गये थे। रघुवर दास को भी इन चिरकुट टाइप के पत्रकारों और कनफूंकवों द्वारा बनाये जा रहे माहौल से विश्वास हो गया था कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी मिलने जा रही हैं।

लेकिन ये क्या, ये तो वहीं बात हो गई – माया में दोनों गये, माया मिली न राम अर्थात् बेचारे को सभी ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सब्जबाग दिखाया और बेचारे से इधर प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी हाथ से निकल गई। बेचारे रघुवर हाथ मलते रह गये। अब मीडिया के लोग और रघुवर दास के संग रहनेवाले कनफूंकवों की हालत खराब है कि वे अपने आका के पास कौन सा मुंह लेकर जाये। अगर आका ने पूछ दिया कि तुमलोग तो हमें झाड़ी पर चढ़ा दिये थे, आज की स्थिति क्या कह रही हैं, बताओ, तो क्या कहेंगे।

बेचारे रघुवर दास की तो हालत तो ये सब देखकर, इतनी खराब हो गई है कि वे अंदर ही अंदर घुटते जा रहे हैं। उनके घुटन की तस्वीर तो अब उनके ही पार्टी के लोग बड़े प्रेम से बड़ा-बड़ा कर वायरल कर रहे हैं। आप खुद देखिये। ये तस्वीर आज की है। जब नितिन नवीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ वे सभी का हाथ जोड़कर अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं और इसी तस्वीर में नीचे भाजपा के अन्य नेताओं के बीच रघुवर दास मुंह लटकाये खड़े हैं। रघुवर दास का मुंह लटकाये खड़े रहना ही बता देता है कि उनकी मनःस्थिति क्या है?

याद करिये वो दिन, जब रघुवर दास ओडिशा के राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर रांची पहुंचे थे। कैसे उनके चाहनेवाले, उन्हीं के पार्टी के एक धन्नासेठ ने देखते ही देखते पूरे रांची को रघुवर दास की होर्डिंग से पाट दिया था। ऐसा लगा था कि रघुवर दास को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी मिलने जा रही है। एक साल पहले इसी घटना पर रांची के कई पत्रकारों ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद मिलने तक की खबरें तक छाप दी थी। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतता गया, उन्हें बड़े पद मिलने की भूत भी धीरे-धीरे उतरता चला गया।

जैसे-जैसे समय बीता, रघुवर दास की लोकप्रियता का मीटर भी डाउन होता चला गया। अब चूंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष दोनों हाथ से निकल गया तो बेचारे के पास अब विकल्प ही क्या बचा? जीरो बटा सन्नाटा। राजनीतिक पंडितों की मानें तो रघुवर दास का विकेट तो उसी वक्त डाउन हो गया था। जब नवीन जायसवाल को विधानसभा में मुख्य सचेतक का पद थमा दिया गया। ऐसे में जातिवाद को भी प्रमुखता देनेवाली भाजपा के पास रघुवर दास को देने के लिए कुछ भी नहीं बचा। अब चूंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नवीन और प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू बन गये तो अब इनके लिए कुछ बचा भी नहीं।

शायद यही कारण रहा कि जब आदित्य साहू ने प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाला तो उसके बाद उनके द्वारा बुलाई गई बैठक में रघुवर दास ने जाना उचित नहीं समझा। शायद रघुवर दास को खटक रहा था कि जो व्यक्ति उनके आगे-पीछे करता रहता था, आज उसकी अध्यक्षता को वे कैसे मंजूर कर लें। राजनीतिक पंडित तो ये भी बताते है कि आदित्य साहू ने कई बार रघुवर दास को फोन लगाये। लेकिन, अंत-अंत तक रघुवर दास आदित्य साहू द्वारा बुलाई गये बैठक में न पहुंच कर, अपनी मन-स्थिति को उजाकर कर दिया।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो वे कहते है कि रघुवर दास को अब ज्यादा उछलना नहीं चाहिए। पार्टी ने उन्हें जरुरत से ज्यादा थमा दिया। वे मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक के पद तक पहुंच गये। उनका बेटा इस योग्य हैं नहीं कि वो कुछ कर सकें। ऐसे में योग्यता के आधार पर उनकी बहू पूर्णिमा साहू राजनीतिक तौर पर पटु है। रघुवर दास को चाहिए कि वे अपनी बहू पर ध्यान केन्द्रित कर, उसके लिए मार्ग प्रशस्त करें और स्वयं राजनीति से दूरियां बनाकर, एक अच्छे राजनीतज्ञ के रूप में राजनीति से संन्यास ले लें।

नहीं तो जो भी वे राजनीतिक रूप से कमाएं हैं, उनके हाथ से निकलते देर नहीं लगेगी। क्योंकि बतौर मुख्यमंत्री जो उनका राज्य की जनता के प्रति जो व्यवहार रहा हैं। लोग भूले नहीं हैं और न उन्हें पसन्द करते हैं और इसके लिए कोई जिम्मेदार हैं तो वे कनफूंकवें हैं, जिन्होंने रघुवर दास की इमेज को उनके मुख्यमंत्रित्व काल में सर्वाधिक क्षति पहुंचाई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *