अपनी बात

थेथरई, लबरई व अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की कला में पारंगत ‘प्रभात खबर’ अखबार पढ़ अपने दिमाग का दही करवाना न भूलें

भाई आज मकर संक्रांति है। ऐसे में, थेथरई, लबरई व अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की कला में पारंगत रांची से प्रकाशित आज का ‘प्रभात खबर’ अखबार पढ़ अपने दिमाग का दही करवाना न भूलें। वो इसलिए मैं लिख रहा हूं, वो भी डंके की चोट पर कह रहा हूं कि इस अखबार ने पत्रकारिता की धज्जियां उड़ा दी है। वो थेथरई, वो लबरई, की है, कि जिसकी जितनी आलोचना की जाय कम है।

प्रभात खबर की थेथरई व लबरई को सिद्ध करने के लिए कहीं भी जाने की जरुरत नहीं। बस उसका अखबार हाथ में लीजिये। उसकी थेथरई व लबरई सब आपके सामने आ जायेगा। फिर आप अपना माथा पकड़ लेंगे और कहेंगे कि ऐसी थेथरई और लबरई आज के युग में कोई कैसे कर सकता है और ऐसा करके कोई एक नंबर का अखबार कैसे बन सकता है। लेकिन सच्चाई तो यही हैं।

अब जरा आज का फ्रंट पेज इसका देखिये। अखबार लिखता है – कामयाबी। दो जनवरी को रांची से अपहृत भाई-बहन अंश-अंशिका रामगढ़ के चितरपुर से बरामद, फिर ठीक इसके नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखता है – प्रभात खबर एसआइटी का 13 दिन चला अभियान, हम जहां पहुंचे, वहीं मिले बच्चे। अब आप सीधे इसी अखबार के पृष्ठ संख्या 6 पर पहुंचिये। अखबार लिखता है – प्रभात खबर ने छेड़ी मुहिम, जिसमें वो सही का चिह्न लगाकर बता रहा है कि 07 जनवरी को प्रभात खबर ने अंश-अंशिका की सकुशल बरामदगी को लेकर एसआइटी गठित की।

अब सवाल उठता है कि अखबार खुद कह रहा है कि उसने 07 जनवरी को एसआइटी गठित की और फिर खुद ही फ्रंट पेज पर दावा कर रहा है कि प्रभात खबर एसआइटी का 13 दिन चला अभियान। आप खुद 07 जनवरी से बच्चे के मिलने यानी 14 जनवरी तक का दिन गिनिये, तो सात दिन से ज्यादा नहीं होता। अब ऐसे में प्रभात खबर जो फ्रंट पेज पर दावा कर रहा है कि उसने 13 दिन तक एसआइटी अभियान चलाया। क्या ये प्रभात खबर के प्रधान संपादक/स्थानीय संपादक द्वारा झारखण्ड की जनता को मूर्ख नहीं बनाया जा रहा, उनके दिमाग का दही नहीं बनाया जा रहा, पाठकों के बीच झूठ नहीं परोसा जा रहा, जो काम प्रभात खबर ने किया ही नहीं, उसका झूठा श्रेय लेने के लिए झूठ नहीं परोसा जा रहा।

अब दूसरा सवाल, ये अखबार 13 जनवरी को अपने अखबार में इस हेडिंग से दावा करता है कि ‘भुरकुंडा बाजार के दो लोगों का दावा, हमने अंश-अंशिका जैसे बच्चे देखे’ जिसने देखने का दावा किया, उसका अखबार फोटो भी छापता है। आपकी सुविधा के लिए हम अखबार की कटिंग आपके सामने दे दिये हैं। आप खुद देखिये और अनुमान लगाने की कोशिश कीजिये।

14 जनवरी को ये अखबार लिखता है कि प्रभात खबर की एसआइटी रामगढ़ के लारीकलां में गुलगुलिया टोला पहुंची। इसका मतलब है कि प्रभात खबर की एसआइटी टीम 13 जनवरी को लारीकलां पहुंची होगी और बच्चा मिलता है 14 जनवरी को चितरपुर में रौशन आरा के घर से, जहां बच्चा चोर किराये पर रह रहे थे। जहां डब्लू साहू, सचिन कुमार और सन्नी कुमार जैसे युवाओं ने अपना रोल निभाया और अपहृत बच्चों को उनके माता-पिता से मिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा दी।

इन्हीं युवाओं ने पुलिस प्रशासन से संपर्क किया और बच्चा वहां पहुंचा, जहां होना चाहिए था। लेकिन प्रभात खबर ने क्या किया, बच्चा ढूंढने से लेकर मिलवाने तक सारा श्रेय खुद लेने की कोशिश की और फ्रंट पेज पर क्या लिख दिया – हम जहां पहुंचे, वहां मिले बच्चे। अरे आप तो लारीकला में ही जाकर सिमट गये। आप तो खुद ही पृष्ठ संख्या छः पर प्रभात खबर ने छेड़ी मुहिम के माध्यम से अपनी बातें रख रहे हो कि हम लारीकलां से आगे नहीं जा सकें। ऐसे में इस पूरे प्रकरण का श्रेय लेने की आपको हिम्मत कैसे हो गई?

सच्चाई तो यही है कि जिस खबर को प्रभात खबर ने पृष्ठ संख्या 6 पर सिंगल कॉलम में डालकर इतिश्री कर ली। उस खबर को उसे फ्रंट पेज पर देना चाहिए था। खबर थी – चितरपुर के युवाओं की सतर्कता ने बचायी जिंदगियां। ‘दैनिक भास्कर’ अखबार ने भी इस समाचार से न्याय नहीं किया और उसने झारखण्ड पुलिस की आरती उतारी और इन युवाओं के पक्ष में कुछ भी नहीं लिखा। लेकिन बधाई दीजिये रांची से ही प्रकाशित ‘दैनिक जागरण’ और ‘हिन्दुस्तान’ को जिसने इस समाचार के साथ न्याय किया, ईमानदारी दिखाई और इन युवाओं को इस पूरे प्रकरण का श्रेय दिया। उन्हें शाबाशी दी और सारे राज्य के नागरिकों को बताया कि इस पूरे प्रकरण के असली नायक ये तीनों युवा हैं, न कि झारखण्ड पुलिस या प्रभात खबर।

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