अगर जीवन संग्राम में विजयी होना है तो परमहंस योगानन्द जी की कालजयी रचना “ईश्वर-अर्जुन संवाद” से स्वयं को जोड़े – स्वामी ईश्वरानन्द

श्रीमद्भभगवद्गीता पर तो देश और विदेश के कई संतों/महानुभावों/आध्यात्मिक पुरुषों ने अपने काल खण्ड में उस काल खण्ड के अनुरुप

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जो इस कोरोना संक्रमण काल में किसी ने नहीं किया, वो जिंदगी मिलेगी दोबारा फाउंडेशन के अश्विनी ने रांची में कर दिखाया

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 2, श्लोक संख्या 22, कहता है – वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोsपराणि। तथा शरीराणि विहाय, जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर, दूसरे नये वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर, दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है। और श्रीमद्भगवद्गगीता के इस श्लोक को जमीन पर उतारने का सही प्रयास किया है, रांची की एक संस्था – “जिंदगी मिलेगी दोबारा फाउंडेशन” ने।

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वासांसि जीर्णानि यथा विहाय… मुझे विश्वास है कि सतीश नये रुप में अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने फिर लौटेंगे

पता नहीं क्यों? श्रीमद्भगवद्गगीता पर हमारा अटूट विश्वास या सतीश वर्मा के प्रति मेरी श्रद्धा, मेरा दिल कहता है कि सतीश वर्मा फिर लौटेंगे, वे अपने अधूरे कार्यों को नये सिरे से पूरा करने को। श्रीमद्भगवद्गीता जो लोग पढ़े हैं, वे जानते है कि प्रत्येक जीवात्मा शरीर न होकर एक आत्मा है, जो निरन्तर अपने आपको उच्चतर श्रेणी में ले जाने के लिए नये-नये रुपों में अवतरित होते रहते हैं और ये सिलसिला तब तक चलता रहता है,

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वास्तविक राजा वहीं जो अपने हृदय के साम्राज्य से कौरव रुपी बुराइयों को निकाल फेंके – ईश्वरानन्द

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, वास्तविक राजा वहीं, जो अपने हृदय के साम्राज्य से सारे कौरव रुपी बुराइयों को निकालकर पांडव रुपी सत्य के सदृश अपने हृदय में ईश्वर का साम्राज्य स्थापित कर लें। उक्त उद्गार आज योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के निदेशक मंडल के सदस्य एवं योगदा सत्संग मठ रांची के प्रशासक स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने भक्ति योग विषयक आध्यात्मिक व्याख्यान के क्रम में प्रकट किये।

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जिसने गीता का रसपान किया, उसने जीवन के कुरुक्षेत्र में सफलता पाई – स्वामी ईश्वरानन्द गिरि

सारा वेद गाय है, और इन गायों से दुध दूहनेवाले श्रीकृष्ण है, इस दुग्ध का पान करनेवाले गांडीवधारी अर्जुन है और जो दूध है वह स्वयं गीता है, जो इस गीतारुपी दुध का पान करता है, वह जीवन के कुरुक्षेत्र में सर्वदा विजयी रहता है, इसे समझने की जरुरत है। यह उद्गार आज रांची के योगदा सत्संग मठ में आयोजित आध्यात्मिक व्याख्यान के क्रम में योगदा सत्संग मठ के प्रशासक स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने व्यक्त किये।

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आईएएस नहीं हुआ, भगवान हो गया…

इस पुरी दुनिया में जितने भी बड़े-बड़े घोटाले हुए, वे घोटाले करनेवाले कोई अनपढ़ नहीं थे, सभी अव्वल दर्जें के पढ़ाकु थे। इनलोगों को पढ़ाकु, उन्हीं के परिवार के लोगों जैसे – उनके माता-पिता ने बनाया था, पर पढ़ने का मूल मकसद क्या होता है? वह नहीं बताया, क्योंकि उन्हें भी पता नहीं था कि पढ़ने का मतलब क्या होता है? चूंकि उनके माता-पिता ने पढ़ाया, पढ़ते-पढ़ते नौकरी मिल गयी

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