लगभग दो सालों के अंतराल के बाद रांची योगदा सत्संग मठ में शुरु हुआ साप्ताहिक रविवारीय सत्संग, ब्रह्मानन्दं…के श्लोकों से फिर गूंजायमान हुआ ध्यान केन्द्र

योगदा सत्संग मठ से जुड़े रांची के समस्त सत्संगियों के लिए आज का दिन, विशेष दिन बनकर आया। पिछले दो

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परमहंस योगानन्द को क्रियायोग की प्राचीन वैज्ञानिक प्रविधि के प्रचार-प्रसार के लिए प्रशिक्षित करनेवाले एकमात्र गुरु युक्तेश्वर गिरि

“हिमालय के अमर संत महावतार बाबाजी के आदेश पर, स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि ने प्रसिद्ध आध्यात्मिक गौरव ग्रंथ, योगी कथामृत के

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परमहंस योगानन्द व स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि का महासमाधि दिवस 7 व 9 मार्च को

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया (वाईएसएस)/सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) के संस्थापक परमहंस योगानन्दजी का महासमाधि दिवस 7 मार्च को और

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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योगदा सत्संग के साथ 19-21 जून तक ऑनलाइन जुड़िये और स्वयं को करिये अनुप्राणित

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया (वाईएसएस) द्वारा विशेष रुप से बताया गया है कि अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में संस्था द्वारा योग-ध्यान पर कई विशेष कार्यक्रम तैयार किये गये हैं। अलग-अलग सत्रों में ये कार्यक्रम 19 से 21 जून तक आयोजित किये जायेंगे। वैश्विक कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए ये कार्यक्रम फिलहाल ऑनलाइन माध्यम से आयोजित किये जायेंगे।

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नहीं रहे अपने भावों से सभी के हृदय को गुदगुदा कर आध्यात्मिक रसपान करानेवाले स्वामी हितेषानन्द

आज सबेरे-सबेरे हृदय को वेध देनेवाली समाचार का सामना हुआ, जब हमको चाहनेवाले बिन्दु झा जी का फोन आया और उन्होंने सबेरे-सबेरे यह समाचार दिया कि स्वामी हितेषानन्द जी नहीं रहे। योगदा सत्संग मठ में उन्होंने बीती रात अंतिम सांस ली। यह समाचार सुनते ही मैं अवाक् रह गया। अवाक् इसलिए कि अब कभी भी स्वामी हितेषानन्द जी के वे भाव देखने को नहीं मिलेंगे और न ही वो आध्यात्मिक सुख प्राप्त होगा, जो उनके मुख से निकलनेवाले शब्दों-वाक्यों से सभी को प्राप्त होते थे।

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परमहंस योगानन्द ने बताया- जीवन क्यों और किसके लिए?

जब मैं रांची के योगानन्द पथ के आस –पास प्रतिदिन लाखों वाहनों व उनमें सवार लोगों को योगदा सत्संग मठ के समीप से गुजरते देखता हूं, तो मुझे आश्चर्य होता है कि ये कितने नादान है, जो उनके इतनी नजदीक बह रही आध्यात्मिक गंगा में डूबकी लगाने से वंचित हैं और जहां इस प्रकार की आध्यात्मिक गंगा नहीं हैं, वहां के लोगों का समूह बड़ी संख्या में यहां आकर इस आध्यात्मिक गंगा में स्नान कर स्वयं को प्रकाशित कर धन्य हो रहा हैं।

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योगदा संन्यासियों ने स्वच्छता मानकों का अनुपालन कर तैयार किये राहत सामग्रियों के पैकेटों को जन-जन तक पहुंचाया

कोविड लॉकडाउन के तीसरे हफ्ते में योगदा सत्संग शाखा मठ ने अपने सहायता भरे हाथ राजधानी रांची के निकटवर्ती गांवों तक बढ़ाया। ज्ञातव्य है कि योगदा संन्यासियों ने गरीबों और जरूरतमंदों तक सूखे खाद्यान्न और अन्य जीवनोपयोगी सामग्री पहुंचाने के अपने अभियान की शुरूआत राजधानी क्षेत्र से की थी। जो जरूरतमंद इस संस्थान से राहत सामग्रियां पाते हैं, उन्हें पता है कि राहत सामग्रियों के पैकेट आश्रम परिसर में स्वच्छता मानकों का अनुपालन करते हुए खुद संन्यासियों और स्वयंसेवकों द्वारा तैयार किये जाते हैं।

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रांची योगदा मठ के स्मृति मंदिर में ध्यान कर रही विदेशी महिला, जो सभी के आकर्षण का केन्द्र बन गई

पांच जनवरी। योगदा सत्संग मठ। मैं अपनी धर्मपत्नी के साथ योगदा सत्संग मठ पहुंचा, क्योंकि वहां परमहंस योगानन्द जी का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था। ऐसे भी मुझ पर परमहंस योगानन्द जी की बहुत बड़ी कृपा रही हैं। मैं मानता हूं कि पूरा भारत ही संतों, महात्माओं का देश हैं। मेरी तो महत्वाकांक्षा है कि भारत में जितने भी ऋषि-महर्षि या संत-महात्माओं से जुड़े जो स्थल है, उनका दर्शन करुं और स्वयं को धन्य करुं। देखते हैं, ईश्वर हमें इसमें कहां तक सहायता पहुंचाते हैं?

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योगदा सत्संग मठ में मना परमहंस योगानन्द का जन्मोत्सव, भक्ति रसधारा में डूबे श्रद्धालु

आज परमहंस योगानन्द जी की जयन्ती हैं। रांची के योगदा सत्संग मठ में आज परमहंस योगानन्द जी का जन्मोत्सव धूम-धाम से मनाया गया। बड़ी संख्या में देश-विदेश से परमहंस योगानन्द पर श्रद्धा लुटानेवालों की भीड़ यहां जुटी और भक्ति रसधारा में खुद को डूबोने में इन्होंने अपना ज्यादा समय बिताया। आज सुबह से ही योगदा सत्संग मठ का नजारा देखने लायक था।

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गुरु पूर्णिमा के अवसर पर परमहंस योगानन्द के प्रति भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत समन्वय दिखने को मिला योगदा सत्संग मठ रांची में

आषाढ़ पूर्णिमा यानी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर योगदा सत्संग मठ में अपने गुरु परमहंस योगानन्द के प्रति भक्ति और श्रद्धा निवेदित करने के लिए भक्तों में अद्भुत समन्वय दिखने को मिला। इस  दौरान सभी ने एकताबद्ध होकर, अपने गुरु के चित्र के समक्ष भक्ति और श्रद्धा निवेदित कर, उनके बताये गये मार्गों पर आजीवन चलने का संकल्प भी लिया।

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