परमहंस योगानन्द को क्रियायोग की प्राचीन वैज्ञानिक प्रविधि के प्रचार-प्रसार के लिए प्रशिक्षित करनेवाले एकमात्र गुरु युक्तेश्वर गिरि

“हिमालय के अमर संत महावतार बाबाजी के आदेश पर, स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि ने प्रसिद्ध आध्यात्मिक गौरव ग्रंथ, योगी कथामृत के

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महावतार बाबाजी स्मृति दिवस पर विशेषः जब बाबा जी ने अपने लाहिड़ी महाशय के लिए देखते ही देखते बना दिया सोने का अद्वितीय महल

परमहंस योगानन्द जी ने अपने गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि व संस्कृत शिक्षक स्वामी केवलानन्द जी से एक बाकया सुना था,

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गुरु पूर्णिमा पर विशेषः महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय के महान गुरु, जो अनादि काल से आज भी जीवित है, जिन्होंने कितने ही महान आत्माओं को क्रिया योग की दीक्षा दी

आप माने या न माने, पर ये शाश्वत सत्य है कि जिन्होंने भी महान आध्यात्मिक संत परमहंस योगानन्द जी द्वारा

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आधुनिक भारत के महान अवतार महावतार बाबाजी जो ईश्वरीय कार्य के लिए सहस्राब्दियों से आज भी जीवित हैं

आपको आश्चर्य होगा कि इस पृथ्वी पर और खासकर भारत के उत्तर में हिमालय में स्थित बद्रीनाथ की गुफाओं में पिछले सहस्राब्दियों से एक महामानव आज भी स्थूल शरीर के रुप में हमारे बीच विद्यमान है, जो महावतार बाबाजी के नाम से जाने जाते हैं। महावतार बाबाजी का सबसे पहला परिचय महान आध्यात्मिक गुरु परमहंस योगानन्द जी ने 1946 ई. कराया था, जब उन्होंने इसकी सबसे पहली चर्चा “ ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी” में की।

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प्रयागराज का कुम्भ मेला यानी भारत को देखने का एक अलग नजरिया, एक संन्यासी के शब्दों में, पार्ट-2

संन्यासी बोले जा रहे थे, सभी के साथ मैं भी बड़े भाव से सुनता जा रहा था, उनका बोलना, बोलने की तारतम्यता, सभी श्रोताओं को बांधे हुए था, सभी को बड़ा आनन्द आ रहा था, ऐसे भी कुम्भ मेला है ही ऐसा, कि जब उसके बारे में कोई कुछ कहना चाहे, तो लोग सुनना पसन्द ही करते हैं, और जब मंजा हुआ संन्यासी इस पर कुछ कहें तो उसका आनन्द कुछ और ही बढ़ जाता है।

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परमहंस योगानन्द लिखित पुस्तक ‘एक योगी की आत्मकथा’ ने मेरी जिंदगी ही बदल डाली – रजनीकांत

दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध सुपर स्टार और हिन्दी फिल्मों में भी अपनी गहरी पकड़ रखनेवाले सुप्रसिद्ध अभिनेता रजनीकांत का कहना है कि उनके जीवन में एक पुस्तक ने ऐसी उधम मचाई कि उनके जीवन को ही पूरी तरह से पलट कर रख दिया, वो पुस्तक थी “परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित पुस्तक – एक योगी की आत्मकथा”। उनका कहना है कि 1978 में इन्होंने पहली बार इस पुस्तक को खरीदा और करीब 25 वर्षों तक वे इस पुस्तक के सम्पर्क में रहे,

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