सत्तापक्ष व विपक्ष के नेताओं को राजभवन के ‘एट होम’ में शामिल होने का समय था, पर बोड़ेया के पीड़ित परिवार को ढांढ़स बंधाने का समय नहीं था

अरे मरनेवालों की संख्या कितना भी रहे, पर मरनेवाला का परिवार तो पंडित ही था न, अगर दलित-आदिवासी या पिछड़ा

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आईएएस नहीं हुआ, भगवान हो गया…

इस पुरी दुनिया में जितने भी बड़े-बड़े घोटाले हुए, वे घोटाले करनेवाले कोई अनपढ़ नहीं थे, सभी अव्वल दर्जें के पढ़ाकु थे। इनलोगों को पढ़ाकु, उन्हीं के परिवार के लोगों जैसे – उनके माता-पिता ने बनाया था, पर पढ़ने का मूल मकसद क्या होता है? वह नहीं बताया, क्योंकि उन्हें भी पता नहीं था कि पढ़ने का मतलब क्या होता है? चूंकि उनके माता-पिता ने पढ़ाया, पढ़ते-पढ़ते नौकरी मिल गयी

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