CONG व JMM द्वारा एड़ी-चोटी लगाने के बावजूद अग्निपथ योजना के खिलाफ बुलाया गया भारत बंद झारखण्ड में टांय-टांय फिस्स

कांग्रेस और उनके सहयोगियों तथा वामदलों से जुड़े कई छात्र संगठनों ने मिलकर नरेन्द्र मोदी सरकार की बहुप्रशंसित अग्निपथ योजना

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रांची के अखबारों-चैनलों के पास कुछ भी नहीं हैं, सही जानकारी के लिए सीधे निशिकांत और सरयू के ट्विट से जुड़िये, “एक-एक कर सबका नाम सामने आयेगा, विधानसभा में सत्तापक्ष के सारे कुर्सी खाली होंगे”

सही कह रहा हूं, आप कहां और किस चक्कर में पड़े हैं, अगर ईडी या अंदर की खबरों को सही

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अखबारों-चैनलों की चुप्पी के बावजूद CM हेमन्त के मगही-भोजपुरी भाषियों के खिलाफ दिये गये बयान से भड़का जनाक्रोश, भोजपुरी/मगही भाषियों ने कहा – हेमन्त मांगे माफी, साथ में आंदोलन की भी दी धमकी

एक लोकोक्ति है – खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा आठ आना, ठीक यही लोकोक्ति राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन पर

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MLA बनो तो बन्ना गुप्ता या इरफान अंसारी जैसा, सरयू राय या बिनोद सिंह जैसा विधायक कभी मत बनना, क्या समझे?

खुब, वो भी बेमतलब का हल्ला-गुदाल करिये, विधानसभा के बाहर ठुमके लगाइये, अपने घर या किसी दुकान से झाल-करताल-ढोल लाकर

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मीडिया संस्थानों के मालिकों/संपादकों के खिलाफ भूख हड़ताल भी करियेगा और उनसे ये आशा भी रखियेगा कि वे आपकी समाचारों को अपने यहां स्थान भी दें, ऐसा कभी हुआ हैं क्या?

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ोगे और ये चाहत भी रखोगे कि वो तुम्हे ‘सर’ या ‘राय बहादुर’ की उपाधि दे दें, तुम्हें दौलत से मालामाल कर दें, तुम्हें हर प्रकार की विशेष व्यवस्था कर दें, तो ये नहीं न होगा भाई। इस सब के लिए आपको ब्रिटिश हुकूमत का जासूस या एक शब्द में कह दें तो आपको उसका ‘पिछलग्गू’ या ‘चाटूकार’ बनना पड़ेगा, और जब इनके खिलाफ आप सड़क पर उतरियेगा तो फिर आपको भगत सिंह बनना पड़ेगा और भगत सिंह के साथ क्या होता हैं, हमें नहीं लगता है कि आपको इसके बारे में भी बताना पड़ेगा।

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धिक्कार है, उन राजनीतिक दलों, चैनलों-अखबारों को जो लाशों में भी जाति व धर्म देख, अपना उल्लू सीधा करते हैं

 

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि कुछ दिनों पहले जैसे कांग्रेस समर्थित शासित महाराष्ट्र में साधुओं की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई, और अब शत प्रतिशत कांग्रेस शासित राजस्थान में एक ब्राह्मण को जिन्दा जला दिया गया, इन दोनों जगहों पर अगर भाजपा का शासन होता और मरनेवालों में कोई दलित या अल्पसंख्यक होता तो क्या देश के अखबारों, चैनलों, पोर्टलों, कांग्रेसियों, वामदलों, जनसंगठनों, तथाकथित स्वयं को सेक्यूलर बतानेवाले लोग इसी तरह चुप्पी साधे रहते?  

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हेमन्त सरकार के आते ही बेकार व फालतू के विज्ञापनों पर लगी रोक, जनहित विज्ञापन बनी प्राथमिकता

कोई ज्यादा दिनों की बात नहीं, झारखण्ड में एक मुख्यमंत्री थे, नाम था – रघुवर दास। उनको छपास की बहुत ही भयंकर बीमारी लग गई थी। ऐसे नेताओं को छपास की बीमारी होती ही है, यह कोई नई बात भी नहीं, पर इनको ऐसी लगी कि पूछिये मत। ये अखबारों में, चैनलों में, पोर्टलों में, बिना अखबारों के भी अखबारों में स्वयं को देखना चाहते थे।

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लानत है ऐसी पत्रकारिता पर, अपने को मनुष्य कहने पर, बचाने की जगह पत्रकार प्रश्न पूछता रहा

जिस राज्य में पत्रकारिता के शीर्ष पर अथवा पत्रकारिता को जीवन देनेवाले प्राणदाताओं वाले स्थान पर चरित्रहीनों, बेशर्मों और जाहिलों का कब्जा होता है, वहां ऐसे ही भस्मासुर रुपी पत्रकारों का जन्म होता है, जो किसी के प्राण बचाने के बजाय, उससे ये पूछ रहे होते हैं कि आप मर रहे हो, बताओ कैसा लग रहा है? जो लोग अभी पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे हैं या जो अभी हैं, जरा बताओ कि उनमें कौन सा चारित्रिक गुण है, जिससे हम ये समझे कि

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