शर्मनाक, पलामू के एक स्कूल में बच्चों को एक साल से मिड-डे मील नहीं दे रही हैं रघुवर सरकार

जिस राज्य की सरकारें शराब बेचने की दुकाने खोलने-खुलवाने में लग जाती है, वहां के बच्चे मिड-डे मील खाने से वंचित हो ही जाते है और वह भी एक – दो दिन के लिए नहीं, बल्कि एक-एक साल तक मिड-डे भोजन उन्हें नहीं मिल पाता। ये हाल है – झारखण्ड का। यहां की सरकार का। यहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास का। जब इनलोगों को इस बात की जानकारी मिलती है तब वे बलि का बकरा ढूंढते है कि बलि का बकरा किसे बनाया जाये। चूंकि वे इसके लिए स्वयं को दोषी ठहरा नही सकते। विभागीय मंत्री को दोषी ठहरा नहीं सकते। किसी विभागीय आईएएस अधिकारी अथवा वहां के उपायुक्तों को दोषी ठहरा नहीं सकते, तब ऐसे हालात में कोई छोटा-मोटा अधिकारी-कर्मचारी को ढूंढा जाता है, और वह छोटा अधिकारी-कर्मचारी भी बड़ी आसानी से मिल जाता है। उसके खिलाफ अनाप-शनाप खुब बक दिया जाता है। डिसमिस करने तक की बात हो जाती है और लीजिये अखबार और चैनलवालों को मसाला मिल गया। खुब ब्रेंकिंग हो गई। सीएम की ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियां सीएम की जय-जय करने लगती है और मामला टाय-टाय फिस्स। फिर वहीं हाल, फिर वहीं व्यवस्था और फिर वहीं राग-रंग।

आज मंगलवार है, आज सीएम रघुवर दास मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की मासिक समीक्षा बैठक कर रहे थे। अखबारवालों और चैनलवालों को मसाला देना था, दिल्ली से आई उनकी ब्रांडिंग करनेवालों को मसाला देना था, इसलिए वे खुब तैयारी करके आये थे। मसाला भी जल्दी मिल गया। पलामू के छतरपुर प्रखंड के नव प्राथमिक विद्यालय पटसारा में पिछले एक साल से बच्चों को मिड-डे मील नहीं मिला। सीएम गुस्सानेवाले है, इसलिए जल्द गुस्सा गये, जल्द ही किसी को दंडित करना था, इसलिए स्वयं को दंडित कर नहीं सकते थे, अपनी मंत्री को इसके लिए जिम्मेवार नही ठहरा सकते, किसी आईएएस अधिकारी को इसके लिए दोषी ठहरा नहीं सकते, ऐसे में जल्द ही मिल गया जिला शिक्षा अधीक्षक, उन्होंने पलामू के जिला शिक्षा अधीक्षक पर दोष मढ़ दिया और उसे डिसमिस करने का आदेश दे दिया, मामला खत्म। जैसे ही ये सीएम के मुख से मौखिक आदेश जारी हुआ, पूरे शिक्षा विभाग में खलबली मच गयी।

अब सवाल है,

  • क्या बच्चों को एक साल तक मिड-डे मील का नहीं मिलना एक छोटा अपराध है?
  • क्या सीएम लगातार बिना मिड-डे मील के एक साल तक रह सकते है?
  • क्या उनकी सरकार में शामिल विभागीय मंत्री या आईएएस अधिकारी बिना मिड-डे मिल के एक साल तक रह सकता है?

उत्तर है – नहीं, तो फिर इस अपराध के लिए केवल जिला शिक्षा अधीक्षक ही जिम्मेवार क्यों?  वे सारे लोग क्यों नहीं जिम्मेवार है, जो इस व्यवस्था के प्रमुख अंग है?  रघुवर दास बताये, क्या उनकी यह नैतिक जिम्मेवारी नहीं बनती कि इस अपराध की जिम्मेवारी स्वयं ले और कहे कि ये बच्चे उनकी  गलतियों और लापरवाहियों के कारण पिछले एक साल से मिड-डे मिल से वंचित रह गये। दरअसल ऐसा वे लोग करते है, जिनके अंदर नैतिकता नाम की कोई चीज होती है, जो अनैतिक है, उसे इन सब से क्या फर्क पड़ता है?  केवल भाषण देना है और चल देना है।

कमाल है, पूरे राज्य में शराब पीने और पिलाने का दौर चल रहा है, एक बिहार है – जो शराब पर रोक लगा रहा है और एक हमारे मुख्यमंत्री है जो शराब की दुकान खोल रहे है। उन्हें शराबियों की चिंता है पर बच्चों की चिंता नहीं, जबकि पलामू, गढ़वा, डालटनगंज ऐसा इलाका है, जहां सूखा सर्वाधिक पड़ता है, जहां भूख से मौत की खबर बराबर आती रहती है, जहां कुपोषण एक बहुत बड़ी समस्या है, जहां पलायन एक बहुत बड़ी समस्या है, फिर भी उन इलाकों से ये खबर आये कि बच्चों को एक साल तक मिड-डे मील नही मिला तो इसके लिए सिर्फ दोषी जिला शिक्षा अधीक्षक है, कि वे सारे लोग है – जो इससे किसी न किसी रुप में जुड़े है। निर्णय जनता करें तो ठीक रहेगा।