कल का किंगमेकर शुद्ध धूर्त राजनीति का शिकार

याद करिये 1990 का समय। जो लालू प्रसाद बोले, वहीं होना है। जो लालू प्रसाद के खिलाफ बोले, उनकी राजनीतिक हैसियत भी खत्म, क्योंकि ये वह समय था, जब बिहार का एक बहुत बड़ा वर्ग लालू प्रसाद के पीछे मजबूती से खड़ा था। इसी मजबूती के आधार पर लालू प्रसाद ने कहा था कि वे बिहार में 20 वर्ष तक राज्य करेंगे, पर आज उनसे यह कोई सवाल पूछे कि क्या आपने बिहार में 20 वर्ष तक शासन किया? तो वे इधर-उधर गिन-गान करके 20 से ज्यादा पूरा देंगे, पर जो राजनीतिक पंडित है, वे जानते है कि कल का किंगमेकर आज बेचारा बन गया है,

वह बिहार की सत्ता में रहकर भी कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं है, नीतीश कुमार ने उनकी सारी हेकड़ी, या यों कहिये बोलती बंद कर दी है। आज का छोटा भाई नीतीश, आज के बड़े भाई लालू प्रसाद का यह बात मानने को तैयार ही नहीं कि मीरा कुमार जो महागठबंधन की राष्ट्रपति कैंडिडेट है, उसे समर्थन करें, हालांकि महागठबंधन ने बड़ी चालाकी से मीरा कुमार को राष्ट्रपति कैंडिडेट बनाकर नीतीश कुमार को धर्मसंकट में डालने की तैयारी की थी, पर नीतीश तो नीतीश है, वे जानते है कि राजनीति की इस दुधारी तलवार के बीच, इस वक्त कहा रहना ठीक रहेगा।

कभी लालू प्रसाद ने नीतीश को बाहर का रास्ता दिखाया था

याद करिये, 1990 से 2000 का समय, बिहार में लालू प्रसाद, देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा? कभी डिसाइड किया करते थे, और इसी अकड़ में वे बोल जाया करते थे कि वे किंग मेकर है, उनके इस डायलॉग के खिलाफ बोलने की हिम्मत उस वक्त के नीतीश कुमार में भी नहीं थे, जबकि दोनों उस वक्त एक ही दल में थे। जो लोग इस समय को जानते है, वह अच्छी तरह जानते है, जब बिहार में पहली बार नीतीश कुमार थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री बने थे, तब लालू प्रसाद ने उन्हें अपनी राजनीतिक कद से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया था। एक समय नीतीश, लालू को देखना तक पसंद नहीं करते थे और न ही लालू, नीतीश को, खूब जमकर व्यंग्य बाण और कटु आलोचना हुआ करती थी, पर समय की नजाकत देखिये,

शुद्ध धूर्त राजनीति और नीतीश कुमार

लालू के समर्थन पर ही नीतीश बिहार का सत्तासुख भोग रहे है और वे लालू को ही आंख दिखा रहे है, उनकी बात को हवा में उड़ाकर, रामनाथ कोंविद एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार को समर्थन दे रहे है। हम अच्छी तरह जानते है कि नीतीश के इस फैसले से लालू प्रसाद अंदर तक कितने हिले होंगे, ये अलग बात है कि वे समय की नजाकत समझते हुए, अपने बयानबीर नेताओं को थोड़ा संभल कर बोलने को कह रहे है, पर समय हमेशा ऐसा ही रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि नीतीश स्वहित में पलटी मारने में सबसे आगे है, कभी एनडीए में रहना, कभी यूपीए में रहना, कभी एनडीए में रहकर यूपीए कैंडिडेट को समर्थन करना और कभी यूपीए में रहकर एनडीए कैंडिडेट को समर्थन करना, ये राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं, शुद्ध धूर्त राजनीति है, जिसमें नीतीश पारंगत है।

असहज लालू प्रसाद

जैसे ही नीतीश कुमार ने एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की बात कही, लालू प्रसाद ने बड़े ही सुनियोजित ढंग से अपने बयानबीरों को नीतीश के खिलाफ बोलने की ढील दी, फिर क्या था?  लालू भक्त भाई वीरेन्द्र ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह तो नीतीश कुमार को फूटी आंखों देखना भी पसंद नहीं करते, उनके बोल में भी कड़वाहट आया, जिसका प्रतिवाद जदयू के नेताओं ने यह कहकर किया कि उन्होंने भी चुड़ियां नहीं पहन रखी है, ऐसे में लालू प्रसाद ने अपने पैतरे बदले और अपने बयानबीरों को जरा धीमे स्वर में समझाया कि अभी नीतीश पर वार करना ठीक नहीं, नहीं तो फायदा भाजपा उठा ले जायेगी और फिर वे रह जायेंगे, हाथ मलते, इसलिए लालू प्रसाद ने बड़ी ही चालाकी से अपने बयानबीरों को चुप कराया।

आश्चर्य यह है कि एक समय था, जब बिहार में लालू ही लालू थे, बिहार में रैलियों की बाढ़ में लालू। एक नारा चलता था, जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू। आज आलू भी है, लालू भी है, पर लालू की चलती नहीं, लालू बेचारा बन चुका है, जिसके हाथ में सत्ता है, पर सत्ता का स्वाद नहीं, सत्ता का स्वाद छोटा भाई नीतीश ले जा रहा है, दोनों बेटों में एक उपमुख्यमंत्री तो दूसरा मंत्री है, फिर भी हाय तौबा मच रहा है। इधर उनके बेटे सुशील मोदी को मजा चखाने के लिए घर में तंत्र-मंत्र सिद्धि कर रहे थे और हो गया ठीक उलटा। पूरा परिवार घोटाले की जद में आ चुका है, खुद लालू का एक पांव पटना और एक पांव रांची में है, क्योंकि चारा घोटाला का केस इन दिनों इनकी नींद उड़ाने में लगा है, ऐसे भी केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इन्हें राहत की सांस लेने देगी, ऐसा नहीं लगता और न ही नीतीश चाहेंगे कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लालू प्रसाद एवं उनके परिवार को कोई राहत मिलें, क्योंकि जितना लालू प्रसाद भ्रष्टाचार के दलदल में फंसेंगे, नीतीश बिहार में उतने ही मजबूत होंगे। ऐसे में किसी ने ठीक ही कहा है कि वक्त ही सबसे बड़ा बलवान है, जब वक्त लालू का था तो वे किंगमेकर हुआ करते थे, आज वक्त लालू का नहीं, इसलिए वे बेचारे बने हुए है।

One thought on “कल का किंगमेकर शुद्ध धूर्त राजनीति का शिकार

  • June 30, 2017 at 7:26 am
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    Bewaak..bol
    Rajesh. krishn

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